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Wednesday, August 17, 2022

डाकिया डाक लाया

 सफर जारी है...९९०

११.०७.२०२२

डाकिया डाक लाया ......

चिठिया हो तो सब कोई बांचे भाग्य न बांचो जाए पर अब तो बांचने को चिठ्ठी पत्री ही नहीं आती , डाकिया ही नहीं आता, तो चिठ्ठी कहां से आती जिसे बांचा जा सकता था।, भाग्य बांचना तो दूर की बात है । चिठ्ठी आए न आए पर फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर संदेश थोक के भाव आते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि वे भी चोरी के हैं, खुद नहीं लिखे जाते इसलिए दूसरों के घर से आई मिठाई की माफिक इधर से उधर फारवर्ड कर दिए जाते हैं। यही सोच कर खुश होते रहते हैं कि आज हमने इतने अधिक संदेश फॉरवर्ड कर दिए यानी अपनी गांठ से कुछ नहीं गया और वाहवाही भी मिल गई। टेक्नोलॉजी ने लाल रंग के डाक बक्सौ लेटर बाक्स और डाकिए की छुट्टी कर दी। डाकिए बेचारे का कोई अता पता नहीं तो उस पर निबंध कौन लिखे। निबंध की तो छोड़ो, चिठ्ठी पत्री तक कोई नहीं लिखता कि उन्हे पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे की जानकारी हो। जब लिफाफा ही नहीं जानते तो उस पर टिकट चिपकाने का संदर्भ तो और नहीं जानते होंगे। पोस्टकार्ड का प्रयोग मरे गिरे के समाचार के लिए होता था कि कोना फटा देखकर दूर से ही पता चल जाए कि कहीं कुछ गड़बड़ है। ऐसे पोस्टकार्ड सूचना पढ़ने के बाद घर से बहर ही रख दिए जाते , उनका प्रवेश घर के अन्दर नहीं था। अब इन पोस्ट कार्डों की जगह फोन ने ले ली है और कहीं कहीं तो फोन से संदेश देकर, लिखकर उसे सार्वजनिक कर दिया जाया है कि जिसकी मर्जी हो पढ़े और सांत्वना बधाने और सामाजिकता निभाने चला आए नहीं तो कोई बात नहीं।

        मौत के अवसर पर भी शोक प्रकट करने आये लोगों को चाय पानी बिस्किता की व्यवस्था का भला क्या औचित्य, पर अब सब बदल सा गया है। ब्याह शादी,जन्मोत्सव के निमंत्रण पत्र को छपवाने की आवश्यकता पर अब प्रश्नचिह्न लगने लगा है अरे जब सब वर्चुअल ही भेजना है तो कार्ड को भी वर्चुअल ही डिजायन कर उसे सार्वजनिक कर दो, प्रेस वाले के चक्कर काटने की जरुरत अब नहीं रही। चिठ्ठी न कोई संदेश, चिट्ठियां हो तो सब कोई बांचे, डाकिया डाक लाया, कबूतर जा जा जा मेरे प्यार की पहली चिठ्ठी साजन को दे आ , संदेशे आते हैं जैसे गाने बहुत पीछे छूट गये। अब इनकी आवश्यकता ही कहां रही। ये सब तो पिछले जमाने की यादें जैसी हैं। हालांकि ये दौर बीत चुका है लेकिन पाती की आवश्यकता तो आज भी अनुभव की जा रही है, न की जा रही होती तो राजस्थान से पाती लिखो की जबरदस्त मुहिम क्यों छेड़ी जाती। बिटिया तो आज भी अपने माता पिता को, माता पिता अपने बाल गोपालों को, भाई अपनी बहिन को बहिनें अपने भाइयों को और हम सभी पाती तो लिखते ही हैं फिर भले ही तकनीक ने उसके मोड बदल दिए हों। क्या वाकई फोन और आधुनिक उपकरणों ने पाती की जगह ले ली है या इन की तुरत फुरत सुविधा और यातायात के तेजी से बदलते साधनों ने पाती लिखने की आवश्यकता को लगभग खत्म सा कर दिया है। पहले सात समंदर पार से गुड़ियों के बाजार से गुड़िया लाने और पापा जल्दी आए जाने जैसे गाने का अब कोई औचित्य रहा नहीं। जैसी मर्जी गुड़िया चाहो ऑनलाइन मंगा सकते हो और सात समंदर पार बैठे पापा भैया से वीडियो काल से बात कर सकते हो, अब दूर रहा ही कौन जिसे चिठ्ठी पत्री लिखने की नौबत आ पड़े। अब तो सब आपके हाथ में जो छोटा सा फोन सेल नाम का यंत्र है उससे दुनिया मुठ्ठी में कर सकते हो।

        चिठ्ठी पत्री की जो शुरुआत यहां सब ठीक है आशा है वहां भी सब कुशल से होती थी, जो संबोधन और अभिवादन दिए जाते थे, वे तो सब हवा हवाई हो गए, अब तो पिता भी डीयर फादर हो गए, पति पत्नी हाय हनी और डार्लिंग में सिमट गए, आपका आज्ञाकारी, विनीत पूछ दबा कर भाग गए।अनौपचारिकता रही ही कहां। वे ज़माने लद गए जब केवल अपनी बात ही नहीं लिखी जाती थी, आस पड़ोस की दादी चाची ताई मौसी जैसे रिश्तों की कुशलता बताने और पूछने का रिवाज था। अरे ये तो छोड़ो, मानुष की बात थी, घर के गाय कुत्ते घोड़े भैंस तोता भी चिठ्ठी के विषय होते थे। पर ये सब पुरानी बात और नोस्टोलीजिया कह कर छोड़ दिया जायेगा। अब इन्हें कौन समझाए कि तकनीक मोड भर बदलती है, विषय वस्तु तो आप क्रिएट करते हो, भावनाओं पर किसी का पहरा कहां होता है, कोई भी नई खोज उन्हें थोड़े ही रोक सकती है। सच तो यह है कि अब आप के इतने इतने आभासी मित्र हो गए हैं, इतनों इतनों से जानपहचान हो गई है, आपको किसी दूसरे की जरुरत ही महसूस नहीं होती। पर ध्यान रखिएगा कि अपने तो अपने होते हैं बाकी सब सपने होते हैं। तो मिलते रहिए अपनो से, लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, लेते रहिए उनकी राजी खुशी। कहीं दुनियावी भीड़ में आपके सारे रिश्ते अपनी पहचान न खो दें। आप आभासी दुनिया में मस्त रह आएं और वे रिश्ते आपके संबंधी कहीं भीड़ में बिल्ट जाए और फिर खोजे से भी न मिलें। जो चीजें आउट ऑफ साइट हो जाती है वो आउट आफ माइंड भी हो जाती है। वैसे भी आपने इन्हें दूर के रिश्ते मान लिया है, ममेरे,तयेरे, मौसेरे, चचेरे, फुफेरे रिश्तों को कजिन में निबटा दिया है। आपके सब से कनसर्न ही खत्म होते जा रहे हैं। आप ग्लोबल होने की बात जरुर करते हों पर दिल पर हाथ रख कर सोचिएगा करा आप अपनों के कितने करीब हैं, ऐसा न हो कि आधी छोड़ पूरी को धाबे, आधी मिले न पूरी पावे का हाल हो जाए। तो जुड़े रहिए अपनो से, अपने के अपनो से लिखते रहिए उन्हें चिठ्ठी पत्री, खोलते रहिए अपने मन और लेते रहिए उनकी राजी खुशी।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...