सफर जारी है...849
16.02.2022
नवना नम्रता का प्रतीक है।कहा भी गया कि विद्या विनयी बनाती है।विद्या ददाति विनयम ,विनयात याति पात्रत्वतां, पात्रत्वाताम धनम आप्नोति ,धनात धर्म: तत: सुखम।फिर ये भी पढ़ा कि जो जितना अधिक बड़ा होता है वह उतना ही अधिक विनयी होता है।रहीम ने लिखा नल की अरु नल नीर की गति एकहि कर जोई, ज्यों ज्यों नीचे ह्वे चले त्यों त्यों ऊंचो होई।ये भी सिखाया गया कि फलों से लदी डाली ही नवती है।कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये निकलता है कि व्यक्ति को विनम्र होना चाहिए, बड़ों के आगे झुक कर चलना चाहिए।नमस्ते, प्रणाम, नमस्कार करते, चरण स्पर्श करते सिर झुकाने की परंपरा तो भारतीय संस्कृति में
है ही।अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविनः, चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयु विद्या यशो बलम।कोई लठ्ठमार भाषा में नमस्ते करे तो उसे टोका जाता है समझाया जाता है कि भाई थोड़े विनम्र बनो।अकड़ते तो सूखे लोग है।देखा है हरी टहनी कैसे लचक जाती है।फिर घास का उदाहरण भी दिया गया कि भयंकर तूफान आने पर बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं, जमींदोज हो जाते हैं लेकिन मुलायम हरी घास कैसे जमीन पर बिछ जाती है और जैसे ही तूफान गुजर जाता है फिर सिर उठा कर खड़ी हो जाती है।तो इतनी पढाई से यह ही समझ आया था कि विनम्रता व्यक्ति का बड़ा गुण है।
रामचन्द्र जी समुद्र से रास्ता मांगने के लिए पहले विनय ही करते हैं, तीन दिन तक निवेदन करते हैं ,पूजा अभ्यर्थना करते हैं और जब समुद्र बिल्कुल ही ढीठता दिखाता है,बात ही नहीं सुनता, तब धनुष पर वाण चढ़ाते हैं।विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।
अर्थात विनय का रास्ता पहला रास्ता है।पर अरण्य कांड में मारीच रावण के प्रसंग की जब जब ये चौपाई पढ़ी जाती है कि नवन नीच की अति दुखदायी, अंकुस धनु उरग बिलाई।भयदायक खल के प्रिय बानी, जिमि अकाल के कुसुम भवानी। तो विनम्रता के सारे पाठ तेल बेचने चले जाते हैं भले ही सन्दर्भ पात्र अपात्र का हो।नीच जब झुके तो समझ लो कोई बड़ा संकट आने वाला है, उसका झुकना उसी तरह दुखदायी है जैसे अंकुस, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना।रावण मामा मारीच के पास जाते हैं ,सादर अभिवादन करते हैं, कोमल स्वर में बात करते हैं तो मारीच उनकी विनम्रता से प्रभावित होना तो दूर, उल्टे धर्म संकट में पड़ जाता है।दरअसल वह अपने भांजे रावण की दुष्टता को भली भांति जानता है।उसे मालूम है कि रावण यूं ही नहीं आया होगा, उसकी प्रकृति ऐसी नहीं है कि वह बिना मतलब के बिना किसी स्वार्थ के ऐसा विनम्र आचरण करे।ऐसे लोग यदि आपको नमस्ते करें, स्वयम से आगे बढ़कर बात करें तो सजग हो जाइए।नीच लोग जब भी हमारे सामने झुकते हैं ,किसी स्वार्थ की वजह से झुकते हैं।ऐसे लोगों की इच्छा पूरा करने के बाद केवल आपको ही नहीं, बल्कि कई लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।रावण जो बिना वजह किसी के आगे नहीं झुकता, वह भला मारीच के आगे क्यों झुकेगा।अंकुश झुके तो हाथी को वश में करे, धनुष झुकता है तो किसी की मौत का कारण बनता है, कोई सांप झुकता है तो डसने के लिए और बिल्ली झुकती है तो शिकार पर हमला करने के लिए।ऐसे ही रावण मारीच के आगे झुका था उनसे अपनी लक्ष्य सिद्धि के लिए।दुष्ट व्यक्ति यदि मीठी बोली बोले,नव नव के बात करे तो तुरंत सतर्क हो जाओ।
फिर मन प्रश्न करता है कि जब मारीच जानता था नवन नीच की अति दुखदायी होती है तो भी उसने रावण की बात क्यों मान ली।सीधे सीधे स्वर्ण मृग का भेष रचने से मना क्यों नहीं कर दिया।ये गुत्थी मन को बहुत उलझाती है पर गोस्वामी तुलसीदास इसका भी समाधान कर देते हैं....तब मारीच ह्रदय अनुमाना, नवहि विरोधे नहि कल्याना।सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी,वैद बन्दि कवि भानस गुनी।शस्त्र धारी,मर्म को समझने वाला, समर्थ स्वामी, दुष्ट, धनवान, वैद्य, चारण/भाट, कवि और रसोइया की बात सदैव मान लेनी चाहिए।अन्यथा प्राण संकट में आ जाते हैं।इनसे विरोध का कोई फायदा नहीं।यदि मारीच रावण की बात नहीं मानता तो उसका मरण निश्चित है पर कम से कम प्रभु राम के हाथ मरेगा तो उसकी मुक्ति जरूर हो जाएगी।
ये केवल रामचरित मानस के ही प्रसंग भर नहीं हैं, हम सबके जीवन के प्रसंग है।दैनिक जीवन में कमोवेश यही सब तो घटता है।नीच का नवना दुखदायी होता है,यह सब जानते बूझते समझते हैं लेकिन कई कई बार मारीच की सी मनस्थिति में होते हैं, नवहि विरोधे नहि कल्याना।तो पढ़ते गुनते रहिये इन प्रसंगों को, बड़ी बड़ी मुसीबतों से बाहर निकाल लेते हैं, लाइट हाउस का काम करते हैं।ये धार्मिक ग्रन्थ और पोथी केवल लाल कपड़े में बांध पूजा घर की शोभा बढाने के लिए नहीं, पढ़ने गुनने और कंठस्थ करने के लिए हैं।जीवन जीने के गहरे सूत्र छिपे हैं इनमें, तो बिना समझे केवल इसका अखंड पाठ ही मत करते रहिये, इसके दोहे चौपाई सोरठे के मर्म को भी समझिए, निहित गूढ़ अर्थ को पकड़े रखिये,जीवन जीना आसान हो जाएगा।