Showing posts with label जरा ध्यान से. Show all posts
Showing posts with label जरा ध्यान से. Show all posts

Monday, October 3, 2022

जरा ध्यान से

 सफर जारी है....1081

03.10.2022d

 जरा ध्यान से.....

जिसे देखो वही अक्ल बताता चला आ रहा है, बचपन से सुनते ही आ रहे है ध्यान से पढ़ो, ध्यान से सुनो, ध्यान से सीखो, ध्यान से उठो,बैठो, चलो, खाओ, पीओ मतलब सब काम ध्यान से करो। ध्यान से ध्यान से तो सब चिल्लाते रहे फिर चाहे घर हो, स्कूल हो या बाहर हो पर आज तक किसी ने ये बता के नही दिया कि आख़िर ध्यान कहते किसे हैं? ये है किस चिड़िया का नाम। आंख बंद किए साधु संत की तस्वीर देख के पूछते कि इन्होंने आंखें बंद क्यों की है तो कहा जाता ये बड़े ज्ञानी ध्यानी हैं, ध्यान लगा कर बैठे है। किसके ध्यान में बैठे हैं तो ज़बाब मिला भगवान जी के।तो सीखा आंख बंद कर चुपचाप बैठने को ध्यान लगाना कहते हैं। जब खुद आंख बंद कर ध्यान में बैठे तो आंख मुंदती गई और ध्यानावस्था की जगह निद्रावस्था में चले गए। आंख बंद की तो मन जाने कहां कहां नहीं डोल आया, विचार कल्पना लोक में यात्रा करते रहे और तो और जो स्थान आंख खुली होने पर भी नहीं दिखते थे, जिन्हें देखने पर बैन लगा था, वे सब भी इधर उधर से आकर आस पास ही मंडराने लगे । सो समझ आया कि केवल आंखो के पलक बंद कर लेने से तो ध्यान कम से कम नहीं ही लगा करता।

             ध्यान तो जब लगता तब लगता, अभी तो किसी काम में मन भी लगना नहीं शुरू हुआ था। जिस जिस बात को मना किया जाता, मन सबसे अधिक दौड़ वहीं की लगाता और जो जो काम करने को सौंपे जाते, उनमें दीदा बिल्कुल नहीं लगता। मतलब पाठ्यक्रम की किताबें छोड़ किस्से कहानी में बहुत मन रुचता और जैसे ही पढाई करने को कहा जाता,दादी नानी सब याद आ  जाती। बेबात की बात खूब करवा लो पर जैसे ही काम की बात होती, मन लाख लगाओ, लगता ही नहीं, दौड़ा छूटा खेल में भागता। अब मन ही मनमानी करे तो ध्यान बेचारे की क्या बिसात जो घड़ी दो घड़ी लग जाए। एक बार प्यार से समझाया भी गया जब कोई बात कान खोलकर सुनी जाती है और कोई वस्तु  आंख खोलकर, बड़ी बड़ी भट्टा सी आंख फाड़कर पलक झपकाए बिना देखी जाती है तब उसे ध्यान से सुनना और देखना कहते हैं ।अब हम तो किताब खोल कर खूब आंखें गड़ाए रहते फिर भी परीक्षा में गोल गोल बड़ा सा अंडा ही मिलता यानी खूब कान के पर्दे खोलकर बात सुनो फिर भी बात अनसुनी रह जाती है और खूब आंख खोल खोल कर देखो फिर भी बहुत सा अनदेखा रह जाता है।

तो फिर कैसे ध्यान से सुना, पढा और देखा जाता है, कैसे काम में ध्यान लगाया जाता है, कैसे ध्यान से बात सुनी जाती है,प्रश्न तो वहीं का वहीं अटका रह गया। स्नातक में मनोविज्ञान और शिक्षा विषय में रूचि और ध्यान का पाठ पढ़ते जाना कि जब आपकी चेतना किसी व्यक्ति, वस्तु, भाव या स्थान में केंद्रित हो जाती है, उसे ध्यान कहा जाता है। ध्यान और रूचि एक सिक्के के दो पहलू हैं। जिस काम को ध्यान से किया जाता है उसमें रूचि पैदा होती है और जिन कामों में रूचि होती है उनमें खूब ध्यान लगता है। ध्यान को अवधान भी कहा जाता है। किसी वस्तु व्यक्ति भाव और स्थान में चेतना का केंद्रित होना ही ध्यान है। अभी तक तो ध्यान  में ही उलझे पड़े थे, अब एक नया शिगूफा और छोड़ दिया चेतना।अब चेतना को पढ़ने समझने बैठे तो अचेतन और अवचेतन दो शब्दो का झुनझुना और पकड़ा दिया। यानी ध्यान की ढेर सारी परिभाषा तो रटने को दे दी, रूचि का छौंका लगा दिया, चेतन अवचेतन में उलझा दिया पर दो टूक शब्दों में ध्यान का अर्थ ही नहीं समझा सके।

        तो हमें कौन ध्यान में पीएच डी करनी है, हम भी ध्यान को ध्यान से सुनकर समझने की कोशिश करते रहेंगे। तुम कहते रहना ध्यान से सुनो ,ध्यान से करो, हमें जो ध्यान समझ आ गया तो भली नहीं तो काक चेष्टा वको ध्यानम, श्वान निद्रा तथैव च, अल्पाहारी गृहत्यागी बने विद्यार्थी के पांच लक्षणों को पकड़े बैठे रहेंगे, तुम कान पे खूब किल्लाते रहना ए भाई तेरा ध्यान किधर है, ए भाई जरा देख के चलो आगे भी नहीं पीछे भी ऊपर ही नहीं नीचे भी और हम कानो में तेल दिए बैठे रहेंगे कि कान पे  हो के टाल जायेंगे, कान ही नहीं देंगे। तू डाल डाल मैं पात पात।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...