सफर जारी है....846
12.02.2022
सुनते तो यही आ रहे हैं कि सत्य की सदा जीत होती है, सत्य को कितने भी आवरण में क्यों न रखो ,एक न एक दिन सारे अन्धकार को चीर कर अपने पूरे प्रकाश के साथ सबके समक्ष उपस्थित हो जाता है, बादल कुछ देर के लिए उसे ढक भले ही लें पर घोर घटाटोप भी उसे अधिक लम्बे समय तक नहीं छिपा पाता।सत्य उद्घाटित होता ही है सारी कालिमा को काई सा फाड़ता हुआ।बचपन से यही तो इमला और सुलेख में लिखते चले आ रहे हैं कि सदा सच बोलो।बड़ों का आदर करो।उन्हें सम्मान दो, छोटो को प्यार करो, चोरी मत करो,न वस्तु की न व्यवहार की ।किसी की चुगली मत करो आदि आदि।फिर घर में बडे बूढों से सुना कि सूधे का सदा भला।पूजा अग्निहोत्र करते देखा कि भूल चूक के लिए अंत में क्षमा याचना कर ली जाती है कि भगवान जी हम तो अज्ञानी है, जैसे भी बस तेरे हैं, जो गलती बनी हो उसके लिए साष्टांग दण्डवत प्रणाम कर लिया जाता है और बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय कह कर आगे बढ़ लिया जाता है।आगे भले ही बढ़ जाओ पर किये का फल तो भोगना ही पड़ता है ,इसी जन्म में भोग लो तो ठीक नहीं तो फिर दुनिया में आना पड़ेगा,भोगे बिना मुक्ति तो नहीं है।
जैसी करनी वैसी भरनी ऐसे ही थोड़े कहा गया।सच की लड़ाई लंबी होती हैIउसके फैसले तुरत फुरत नहीं हुआ करते।कभी कभी तो यह युगों तक चलती है बस पात्र बदलते रहते हैं।सतयुग में प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह रूप धर कर आये तो द्वापर में आततायी कंस के लिए कृष्ण बन अवतार लिया और त्रेता में रावण के लिए राम को प्रकट होना पड़ा।गीता उद्घोष करती है यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थान अधर्मस्य संभवामि युगे युगे तो तुलसी बाबा लिख देते हैं जब जब होहिं धर्म की हानि, बाढहि असुर महाअभिमानी ,तब तब धरि प्रभु मनुज शरीरा, हरहि दयानिधि सज्जन पीरा। राम जन्मते हैं ....भये प्रकट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी ,हर्षित महतारी मुनिमन हारी अद्भुत रूप बिचारी, लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी, भूषण वन माला नयन विशाला शोभा सिंधु खरारी।और जब भादों की आधी रात कान्हा जन्मते हैं तब पहरेदार गहरी नींद सो जाते हैं, जेल के ताले स्वत: खुल जाते हैं, वसुदेव नवजात को सूप में रखकर जमुना पार करते हैं, मूसलाधार बारिश है शेषनाग स्वयम छत्र बन जाते हैं, जमुना मैया अपने आराध्य के चरण छूकर उतर जाती हैं ।वसुदेव गोकुल पहुंचते हैं जशोदा के पार्श्व में लेती कन्या को उठा उसके स्थान पर कान्हा को लिटाते हैं और कन्या को ले उल्टे पैर लौट जाते हैं।इतने पल के लिए पूरी सृष्टि थम जाती है ।कन्या का रोदन सुनकर कंस को और लाला की किलकारी सुन जशोदा को पता लगता है कि कान्हा जन्म ले चुके हैं, कान्हा जन्म सुन आई जशोदा तुम्हें लाखों बधाई।
ये तो इतिहास प्रसिद्ध साक्ष्य हैं कि जब जब अन्याय बढ़ता है तब तब ईश्वर या तो स्वयम दुष्टों के संहार के लिए अवतार धारण कर लेते हैं या किसी को सहायता के लिए भेज देते हैं।अब कलियुग में वे स्वयम नहीं आते पर सच की रक्षा के लिए किसी को अपना प्रतिनिधि अवश्य नियुक्त कर देते हैं।उसे आपकी सहायता के लिए भेज देते हैं।सच की लड़ाई लंबी तो चलती ही है ,सत्यधारी को इतना तोड़ती है कि अक्सर उसका विश्वास डोल जाता है।करे भी क्या जब झूठ फलता फूलता दिखे और सत्य दबा कुचला फाइलों के ढेर में नीचे दबा दिया जाए तो अच्छे से धैर्यवान का धैर्य भी जबाब दे जाता है।उसका विश्वास डगमगाने लगता है।मन पर निराशा हावी होती जाती है।साहस चुकता प्रतीत होता है।जो ऊर्जा किसी सद्कार्य में लगनी चाहिए थी वह बेकार के झंझटों में चुक जाती है।आस्था कमजोर पड़ती है, भय सिर उठाने लगता है।प्रभु, आप सच धारी को इतने कष्ट क्यों देते हो, उसकी इतनी परीक्षा क्यों लेते हो।हर युग में यही करते आये हो।आते तो जरूर हो पर तब जब व्यक्ति निराशा के चरम पर पहुंच जाता है।अपना करतब भी दिखाते हो पर तब तक बहुत पानी बह गया होता है।प्रभु इतनी कठिन परीक्षा मत लिया करो।एक तो खूब सताते हो उस पर डायलॉग और मारते हो कि जितने कष्ट कंटको में जिनका जीवन सुमन खिला, गौरव गन्ध उन्हें उतना ही यत्र तत्र सर्वत्र मिला, मेंहदी रंग लाती है पिसने के बाद और देखो कुंती भी भगवान से दुख ही मांगती है जबकि वह कृष्ण की बुआ है,जो चाहे मांग सकती है पर जानती है कि सुख के माथे सिल पड़े जो भगवद नाम भुलाये, बलिहारी वा दुक्ख कू जो पल पल नाम रटाय।फिर कबीर वाणी सुना देते हो दुख में सुमिरन सब करें दुख में करे न कोई, जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे होय।हम तो दुख सुख नें तुम्हें ही सुमिरते हैं, कहाँ जाएंगे भला।
प्रभु लाज राखो अपने वचन की सांचे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला कर दो।नहीं तो डर है कि कहीं झूठ अपने पैर लम्बे न पसार दे और सत्य को मुंह छिपाना पड़े।