सफर जारी है.…942
23.05.2022
अब क्या होगा
भविष्य को लेकर एक अकेली चिंता बहुत सारे सुखों पर भारी पड़ जाती है।आप लाख सिर झटकते रहें और कहते रहें कि सब ठीक होगा, अभी वर्तमान में रहो, उसे एन्जॉय करो पर मन में पड़ा खटका कहां सहज रहने देता है।कुछ न कुछ चलता ही रहता है।मन की चंचलता अपना प्रभाव दिखाती है औ समझदारी अपनी ओर खींचती हैं।दोनों में से जो प्रभावी हो जीत उसी के खाते में चली जाती है।लाख बार सुनते पढ़ते रहो कि वर्तमान में जीना सीखो, चार्वाक दर्शन अपनाओ, ऋणम कृत्वा घृतं पिबेत का सिद्धांत बना लो पर अपनी चिंता की प्रकृति को कहां ले जाओगे, उस पर विजय कैसे पाओगे।व्यक्ति ऊपर से लादा तो उतार फैंक सकता है पर बुनाबट ही ऐसी है तो उससे सहज छुटकारा पाना असंभव नहीं तो कठिन तो अवश्य होता है।
अब देखो कुत्ते को उसकी पूंछ को लम्बे समय तक सीधी कर पत्थर के नीचे रखो पर जैसे ही दबाब हटा, वह झट से अपने मूल रूप में आ जाती है।
तो बदलाब तो अंदर से आता है, जब तक चिंता बनी रहेगी और चिंतन की प्रवृत्ति विकसित नहीं होगी तब तक अब क्या होगा राम जी करते ही रहेंगे।अतीत पर एक बार को धूल भले से डाल भी दो पर जो होने वाला है, भविष्य है उसके विषय में तो सोचना होता ही है।जो गलतियां अनजाने में या जान बूझकर हो गई उनका दण्ड अब तक भोग रहे हैं तो आगे के लिए सतर्क होना जरूरी है।यदि अब भी नहीं सुधरें तो जो बचा खुचा है उससे भी हाथ धो बैठेंगे।तो सोचना तो होगा कि अब क्या करणीय है और किससे दूरी बरतनी है।सब पेट में नहीं भरा जा सकता तो अपनी प्राथमिकताएं तय करना जरूरी है, अपनी दिशा निर्धारित करना जरूरी है, अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना जरूरी है।अब क्या होगा के स्थान पर अब क्या किया जा सकता है पर सोचना जरूरी है, जो पास है जिसे अर्जित करने में खून पसीना एक किया उसका सही वितरण जरूरी है।
तो जब तक नहीं सोचेंगे कि अब क्या होगा तब तक कुछ नहीं होने का।तो जो होना है वह होकर रहेगा, तुम उसमें क्या हथेली लगा लोगे पर जो भी हो उसके विषय में चिंतन अपेक्षित है।छत गिरासू हो तो यह सोच कर नहीं बैठा रहा जा सकता कि होय सो राम, अरे उसकी मरम्मत कराएंगे, बल्ली आदि से उसे टिकाने की व्यवस्था करेंगे, उसके उपाय सोचेंगे, वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखेंगे, कुछ तो करेंगे ही।हाथ पर हाथ धरे बैठे ये ही नहीं दुहराते रहेंगे कि हाय राम अब क्या होगा।जो होगा अचानक तो नहीं होगा, आप भी सब देख समझ रहे होंगे पर उस ओर से पीठ किये बैठे होंगे कि मुझे क्या जब दीवाल गिर जाएगी तब का तब देखा जाएगा।बस यही गलती हम हर बार दुहराते हैं।समय रहते चेतते नहीं, और बाद में दुनिया भर की रोना पीटना मचाते हैं कि हाय राम अब क्या होगा।होगा वह जिसकी आपने पूर्व भूमिका पूर्व पीठिका तैयार कर रखी है, जीवन भर जिम्मेदारियों से किनारा किये रहे, पीठ दिए बैठे रहे, सब दूसरा कर करा दे, हम तो बस परोस कर रखी को खाने आ जाएंगे और वह भी अहसान के साथ, बस तुम बहुत कह रहे हो तो खा लेते हैं।कुछ भी अचानक घटित नहीं होता, रोज थोड़ी थोड़ी टूटफूट होती है, रोज थोड़ा थोड़ा रिसाव होता है पर उसकी हम लगातार उपेक्षा करते रहते हैं,उसे इग्नोर करते हैं और जब बात बढ़ जाती है, फोड़ा फूट जाता है, छत ढह जाती है तब हम बुक्का फाड़ कररोते हैं हाय राम ये क्या हो गया, अब क्या होगा।
तो दिनप्रतिदिन सावधानी रखना जरूरी है, छोटी से छोटी बात का संज्ञान लेना जरूरी है, उसके प्रति आपकी प्रतिबद्धता कटिबद्धता जरूरी है, आपका चिंतन जरूरी है सही प्रयास किये जाने जरूरी है।खाली यह कहने से बात नहीं बनने की कि अब क्या होगा।