सफर जारी है....1531
11 06.2024
मुक्ति के मायने....
सा विद्या या विमुक्तये से प्रारम्भ होकर वित्त से मुक्ति नहीं होती पढते समझ में भरता है कि हम सभी जीवन में कभी न कभी मुक्ति के अभिलाषी होते हैं.अब ये अलग बात है कि हम जीवन मुक्ति की कल्पना न कर कभी दायित्वों से मुक्ति चाहते हैं तो कभी पद विशेष और रिश्तों से.यानी जो जो मन मुताबिक न हो,हमारे कंफर्ट जोन में न आता हो,काम करते नानी मरती हो,छठी का दूध याद आता हो ,दायित्व निभाने में श्रम लगता हो वहां से हम कन्नी काटते हैं और उससे मुक्त होना चाहते हैं. यह जानते हुए भी कि जब तकजीवन है हमें कुछ न कुछ करते रहना चाहिए, हाथ पैर चलते रहने चाहिए.ठाली बैठे दिमाग को जंग लग जाती है,हाथ पैर जाम हो जाते हैं और खाली मस्तिष्क शैतान का घर हो जाता है.खाली पडे खेत में कुछ बोया न जाये तो खर पतवार उग आती है.
रोजी रोटी और आजीविका कमाने के लिए हर व्यक्ति कुछ न कुछ तो करता ही है.वृद्धावस्था के लिए कुछ जोड बचाकर भी रखता है कि जब हाथ पैर नहीं चलेंगे तब भी पेट की आग तो शांत करनी होगी.हारी बीमारी में औषधि पथ्य भी जरुरी होगा.इस सबकी भरपूर व्यवस्था हो तो भी दिमाग को व्यस्त रखने के लि दिमागी खुराक बहुत जरुरी होती है.सेवा मुक्ति जीवन का आवश्यक पडाव है पर इसके आगे भी यात्रा चलती रहती है.आप अपने को केवल एक कार्य से दूसरे में स्विच ओवर करते हैं.आपकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं.अब आप किसी सरकारी ,गैर सरकारी तंत्र के बाशिंदे नहीं होते.आपको किसी बाॅस को हर शाम रिपोर्ट नहीं करना होता .भले ही आप स्वतंत्र हो किसी कार्य दायित्व के सीमा घेरे में न आते हों पर जिस घर के आप स्वामी हैं जहां आपके जीवन का चौथापन बीतना है उसकी प्रतिबद्धता से मुक्त नहीं हो सकते.आपको और सजग होकर जीवन बिताना होता है.अपने को सहेजना होता है.अब किसी दूसरे को स्पष्टीकरण नहीं देना होता पर अपने मन को दिल को जबाब देने के दायित्व से आपको मुक्ति कभी नहीं मिला करती.सेवाकाल में आपका अपने सहयोगियों के साथ किया गया व्यवहार और आचरण ही आपकी साख बनता है.
मास्टरी का प्रशिक्षण लेते बार बार रेखांकित किया गया कि कक्षा में पढाने जाने से पूर्व पाठ योजना का न केवल निर्माण आवश्यक है बल्कि उसका अक्षरश:पालन भी आवश्यक है.इसके बिना शिक्षण पूर्ण नहीं होता.बिना ब्लू प्रिन्ट के कच्चे खाके के नक्शे के कोई इमारत खडी नहीं होती .आप दुकान जमीन प्लाॅट खरीदते और उस पर भवन ,आवास या काम्प्लेक्स बनबाते अपनी जमा पूंजी और अपनी भविष्य गत आवश्यकताओ का ध्यान रखते हैं .तो सेवा निवृति के बाद की योजना का खाका बनाने में क्यों चूक जाते। हैं.दिन भर के भोजन तक की व्यवस्था के मीनू। और। सामान्य से दिन के कार्यों की रुपरेखा तय करने तक में जिसका। दिमाग कंप्यूटर की गति सा तेज चलता हो जो अपने सहयोगियों और अधीनस्थों को अल्सुबह ही दिन भर के कार्यक्रम का ब्यौरा व्हाट्सएप कर देता हो क्या उसने अपने जीवन के तीसरे प्रहर की कोई योजना परिकल्पित नहीं की होगी.हां अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति बाहर दीपक जलाता घर की देहरी ही भूल बैठता है.उसे याद ही नहीं रहता कि घर की देहरी रोशन कर ही बाहर दीया जलाया जाता है.
मुक्ति की चाह सबको होती है पर जब तक जीवन है उसके दायित्वों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता.हां दायित्व निभाते निस्पृह और निर्लिप्त रहने की कला को सीखा जा सकता है,जल में कमलवत रहने की विद्या सीखी जा सकती है.रहो संसार में ऐसे कमल रहता है पानी में.काम सब करो पर निर्लिप्त भाव से.छोडने में एक क्षण भी न लगे.बस तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा कहते ही मुक्त हो जावे.मुक्ति की चाह सबको भले हो पर सब मुक्त होने की कला में प्रवीण नहीं हुआ करते.अब यदि मुक्त ही होते तो किसी से बात पद नाम का पुछल्ला बात बात में क्यों लगाते.इतना ही क्यों, आवास के मुख्य द्वार पर टंगी नाम पट्टिका में उस सबका बाकायदा उल्लेख होता है.एक तरह से वही परिचय होता है हम सबका.
सच तो यह है कि मुक्त होने के मायने ही बदल गये हैं.विद्या की जो परिभाषा हमें सौंपी गई थी सा विद्या या विमुक्तये उसके गहरे निहितार्थों की घोर उपेक्षा की गई।जैसे जैसे उपाधियों के अंबार बढे हम और बंधनों में जकडते चले गये.डिग्री डिप्लोमा केवल आजीविका के साधन बन कर रह गये.वित्त से मुक्त नहीें होती, जानते हुए भी जीवन भर धन संचय के प्रयास ही तो किये जाते हैं.बडी जल्दी चिपक पैदा हो जाती है और उससे उबरते पूरा जीवन ही बीत जाता है.बस मुक्ति के जो मापने ही समझ आ जाएं तो काहे का झंझट..हाथ हिलाते आएं,अपना काम करें और फिर मुक्त भाव से अपने अपने स्थान लौट लें. आ अब लौट चले