Showing posts with label फल तो रितु पर होय. Show all posts
Showing posts with label फल तो रितु पर होय. Show all posts

Friday, August 26, 2022

फल तो रितु पर होय

 सफर जारी है ......1038

28.08.2022

फल तो रितु पर होय.......

पता नहीं कितनी कितनी पंक्तियां है जो सालों के अनुभवों का निचोड़ है, देखने में मात्र दो लाइन का छोटा सा दोहा लगता है पर अपने अंदर अर्थ विस्तार की ढेरों छटाएं समाए रहता है। छोटा बालक जब प्रश्न का उत्तर लिखता है तो वह जो जो जानता है सब लिख मारता है। उसे इस बात का बिल्कुल भी बोध नहीं होता कि क्या क्या पूछा गया है, उसे तो जो आता है लिखना सिद्ध। और जिन्हें कुछ नहीं आता, वे पूरी वर्णमाला ही लिख डालते हैं कि हमने तो सब आखर लिख दिए, जो पसंद हो उस शब्द, पदबंध,वाक्य, अनुच्छेद की रचना करते जाओ, जितना मर्ज़ी पेज रंगने हो रंगते जाओ, मना किसने की है। वे तो बालक हैं अबोध हैं पर हम बड़े भी तो बिना सोचे समझे यही सब करते हैं। कह तो अंधाधुंध अंट संट कुछ भी बकते जाते हैं नहीं तो मुंह सिल के बैठ जाते हैं कि लो कर लो, जो करना हो, हम कुछ बोलेंगे ही नहीं। दोनों ही अति के छोर है के तो उल्टा सीधा करना और नहीं तो करना ही नहीं।

कुछ ऐसे हैं जो मगते की तरह चौबीस घंटे हाथ ही फैलाए रहते हैं, उन्हें तो बस मिलना चाहिए। उन्होंने पढा ही नहीं होता कि सहज मिले सो दूध सम, मांग मिले सो पान, कह कबीर वह रक्त सम जामे खींचा तान। ऐसा तो समझदार सोचता है। वह पहले तो मांगेगा ही नहीं और यदि मांगने की नौबत आ ही गई तो अपने लिए नहीं सर्व जन हिताय मांगता है। मर जाऊ मांगू नहीं अपने तन के काज, परमारथ के कारने मोहि न आबे लाज। महामना ने सर्वजन हिताय मांगा और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बन गया। प्रकृति तक देने में विश्वास करती है लेने में नहीं। प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें। न बाबन न, हमसे देने की नहीं, बात ही करनी है तो लेने की करो। देने के हमारे अपने नियम धरम है। देंगे तो अपनो को देंगे। अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर अपनो को देय। जब घुटने तक पेट को नवते हैं तो हम क्यों नहीं नवेंगे। हमें नहीं बनना सूरज और हवा कि मार सुना सुना के मारे डालते हो... सूरज हमें रोशनी देता हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है। दूजों का भी हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें। क्यों सीखें हम देना। हम तो लेने में विश्वास रखते हैं

हमें नहीं बनना वृक्ष, नदी और साधु जैसा। मार सुना सुना के आती किए देते हो कि वृक्ष कबहू नही फल भखै, नदी न संचे नीर, परमाथ के कारने साधून धरा शरीर। हां तो वृक्ष के दांत ही नहीं थे कहां से फल खा लेता, नदी पे कौन भंडार धरे थे जो जल इकठ्ठा कर लेती और साधुओं की तो पूछो ही मत, वे तो जन्मते ही ऐसे हैं। हम तो असाधु ही भले। कम से कम अपने भंडार तो भरे रहते हैं। अरे दूसरों को तो जब बांटे जब अपने से बचे, यहां तो अपने के ही लाले पड़ रहे हैं। अरे हमपे से बचेगा तो अपने बाल बच्चों के लिए नहीं भर  लेंगे। फिर सात पीढ़ियां बैठ कर खा सकें, इतना तो करना बनता ही है। हमें क्या मूरख समझ रखा है कि दोऊ हाथ उलीच उलीच कर खुद ठनठन गोपाल बन जाएं और फिर दूसरों के आगे हाथ फैलाने की नौबत आ जाएं। न बाबा न। हम तो पहले अपने घर में दीया जलाएंगे ता पीछे सोचिंगे बाहर की। ऐसे तो कबीर ही थे कि जो बीच बाजार में लुकाठी लेकर खडे हो गए और आने जाने बालो को और बुला रहे हैं कि जो घर फूंके आपनो चले हमारे साथ। खुद तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे।

एक और हैं जो पहले तो हाथ नहीं हिलाएंगे कि अपनी पे आ गए तो एक ही दिन में सौ दिन का पानी पिला देंगे और फिर लम्बी डुबकी मार जायेंगे। इन्हें तो इतनी भी समझ नहीं कि धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो रितु पे होय। के तो हिल के नहीं देंगे कि बिना स्पीड ब्रेकर के दौड़ते ही चले जायेंगे और कहीं टीचरी में गलती से घुस गए तो साल भर के ग्यारह महीने तान के लंबी सोएंगे और इम्तिहान बिलकुल सिर पर आ गए तो दस दिन में तीन सौ पचपन दिन की कसर पूरी करेंगे। ऐसे थोड़े ही होता है। रोज पढ़ाओ थोडा थोडा तो बालकों के भेजे में भी भरे कुछ, उन्हें कुछ समझ आए, तुम तो के सौ की स्पीड में चलते हो कि बिलकुल थम जाते हो। रोज रोज करो तो काम का पहाड़ ऊंचा नहीं होगा। उसे देख के भय भी नहीं लगेगा। रोज का रोज करना आसान भी होता है।

तो भाई मत बनो कबीर, सबके बूते का होता भी नहीं कबीर जैसा हो पाना। तुम तो उनका लिखा समझ लो उतना ही बहुत है। और समझ में न भरे तो रट ही लो। मोंठ का पानी गुन नहीं करेगा तो औगुन भी नहीं करेगा। मत सोचो दूसरों के लिए, अपना तो देखो, तुम तो खुद के लिए ही सावधान नहीं हो दूसरे का क्या कर पाओगे। तो बहुत फूली फूली चर ली, अब भी चेत जाओ। रोज रोज करोगे  तभी सफलता मिलेगी। फल रितु आने पर ही आयेगा

 सो धैर्य बनाए रखो। माली सींचे सौ घड़ा फल तो रितु पर होय। धैर्य।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...