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Thursday, April 28, 2022

मोहे न आबे लाज

 सफर जारी है....850

18.02.2022

लज्जा नारी का पहला आभूषण कहा गया है।बड़ों का सम्मान करने हेतु सिर पर पल्ला रखना ,दुपट्टा लेना,अवगुंठन और इन सबसे भी जरूरी आंखों की शर्म की बात कही गयी।लाज संकोच है ,लाज शर्म है ,इसमें  गाल गुलाबी हो जाते हैं, आंखें नत हो जाती हैं, वदन सिकुड़ सिमट जाता है।प्रसाद ने तो कामायनी में इस लज्जा के उपलक्ष्य में पूरा का पूरा सर्ग ही रच डाला।नारी को श्रद्धा के रूप में परिभाषित कर दिया नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पग तल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।लाज की जिस स्मित रेखा की बात प्रसाद करते हैं, वह आज आउटडेटेड हो चुकी है।सब खुले खजाने हैं।प्रथम मिलन रात्रि में जो लाज की गठरी बनी रहती थी, अब वह चटर पटर में करती नजर आती है।लाज जो दुलहिन का पहला श्रंगार था ,वह आज ऐसे गायब हो चुका है जैसे गधे के सिर से सींग।

    अब कपड़ों की लाज की बात तो छोड़ो,गलत काम करने में ही लाज नहीं आती।अब अधिकांशतः तो ढीठनुमा सांचे ही बनते हैं जिसके मॉडल निर्द्वन्द हैं, वे स्वयम्भू हैं, किसी को स्वीकारते नहीं।अब लाज के मायने ही बदल गए।पल्ले कंधे से भी नीचे उतर गए, आंखों की लाज न जाने कहाँ बिला गई।उसे तो टोर्च लेकर खोजो फिर भी नहीं मिलेगी।खैर जो हुआ सो हुआ ।पहले मांगने में लाज आती थी।सुदामा की तिरिया से पूछो पड़ोसन से थोड़े से तन्दुल मांगने के लिए उसने अपने को कैसे तैयार किया होगा कितनी लाज लगी होगी उसे।मांगने में सबको लाज लगती ही है।कोई बात करो,रहीम पता नहीं हर प्रसंग में चुपके से कैसे घुसे चले आते हैं, दोहा रच देते हैं...रहिमन वे नर मर चुके जो कहूँ माँगन जाए, उनसे पहले वे मुए जिन मुंह निकसत नाहि।जो मांगते हैं वे तो छोटे हो जाते हैं, उन्हें लाज लगती है,  पर उनसे भी गए बीते वे हैं जो किसी के मांगने पर मना कर देते हैं।मांगने वाले तो भिखमंगो की श्रेणी में आते ही हैं पर मांगने पर न देने वाले उनसे भी अधिक निकृष्ट कहे जाते हैं।माँगना भी कई प्रकार का होता है एक वे जो अपनी जरूरत के लिए ,अपना पेट भरने के लिए मांगते है जैसे वह आता दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता दूसरे वे जो  अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए मांगते है।फिर कबीर यादों में चले आते हैं ।वे साईं से मांगते है, किसी व्यक्ति से नहीं।साईं इतना दीजिये जामे कुटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु भी न भूखा जाए।वे ईश्वर से ही मांगते हैं,उनसे मांगने में कैसी शर्म।वे दाता हैं सबको ही देते हैं।दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया।

    अपने लिए मांगने में भले ही लाज लगे पर बड़े कार्य के लिए, देश समाज के लिए मांगने में भला कैसी शर्म।विनोबा जी ने तो भूदान के लिए घर घर जाकर जमीन मांगी, काशी विश्व विद्यालय के लिए मालवीय जी ने सबके आगे झोली फैला दी।उन्होंने तो सोच लिया .....मर जाऊ मांगू नहीं,अपने तन के काज ,परमारथ के कारने मोहे न आबत लाज।सच में यदि सब ऐसा सोच लें तो सब की मांग पूरी हो जाये।जहां

    लाज जहां आनी चाहिए, वहां नहीं आती और जहां बोलना, कहना, करना होता है वहां हमें सकुच और शर्म लगती  है।जिन कार्यो को करने में आगे आना चाहिए ,वहां हम बैक बेचर्स होते है।तो ये सीखना बहुत जरूरी है कि कहां लाज का पर्दा चाहिए और कहां खुलापन जरूरी है।तो मुझे भी सत्कार्य के लिए, अपने प्रयास के जरूरतमंद बच्चों के लिए समाज से सहयोग लेने में बिल्कुल लाज नहीं आती।बिडंबना है सबके पास देने के लिए भौतिक वस्तुए हैं, पैसों की कमी नहीं है पर सहयोग समन्वय के लिए बहुत कम हाथ उठते हैं, लोग आगे ही नहीं आते।और जब विरले ऐसे सहयोग के लिए अपनी सेवा देने का प्रस्ताव देते हैं तो मेरी बांछे खिल जाती है, मन बाग बाग हो जाता है।जब कैप्टन प्रवीर भारती,सुधीर,श्री निरंजन लाल सारस्वत,श्री मखीजा, डाक्टर अनुपम ,डाक्टर जसमीन और मेरे बहुत से विद्यार्थी जब बिना मांगे अपना अमूल्य समय देते हैं तो मुझे लगता है बिन मांगे मोती मिल गए। यदि स्वयम जाके मांगती तो आज तस्वीर कुछ अलग ही होती।तो मुझे बिल्कुल भी लाज नहीं आएगी कि मैं घर घर जाकर मांगू और बार बार दुहराऊं कि परमारथ के कारने मोहे न आबत लाज।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...