सफर जारी है......928
06.05.2022
वे जो जीवन भर इधर से उधर किसी न किसी काम से घूमते रहते हैँ, बनजारे कहलाते हैँ. ऐसों के लिए ही कहा गया होगा कि इनके पैर में चक्कर है, कभी एक जगह टिक कर नहीं बैठ पाते. आज यहां तो कल वहां.बनजारे ऐसा करते हैँ तो कोइई नई बात नहीं है क्योंकि उनका पूरा का पूरा जीवन संसार के सब जीवधारियों के लिए होता है. वह सबका होता है औऱ सब उसके होते हैँ. कविता की पंक्तियाँ याद कीजिये जरा... कौन कह रहा बनजारों सा ये जीवन बेकार है, मैं सबका हूँ सब मेरे हैँ सबसे मुझको प्यार है.कोई निश्चित घर द्वार नहीं, जहां बैठ गये वहीँ घर हो गया. चाँद औऱ तारों की छत है दिशा दिशा दीवार है सारा आँगन मेरी धरती पूरब पश्चिम द्वार हैँ. इतने मिठबोले हैँ कि सबसे संबंध गाँठ लेते हैँ. सबको अपनी परिधि में ले आते हैँ या उनके दायरे में फिट हो जाते हैँ. कोई ईगो नहीं पालते. जो मिल गया उसी में खुश. दरअसल उनके पास दुःखी होने का समय ही नहीं है. ज़ब कभी समय मिले तो भी कोई कारण नहीं खोज पाते कि चलो इस बात पर बहस कर लें कि किसी भी बात पर रायता फैला दें कि अगले की बेबात पर ही टांग खिंचाई कर दें कि फूफा की तरह रूठ कर ही बैठ जाएं औऱ तब तक नहीं माने ज़ब तक अगला नाक नहीं रगड दें, अगले की आपकी देहरी के चककर लगाते चप्पल न घिस जाए कि अगला अपनी शान अपनी पगड़ी आपके चरणों में न रख दे. न जी, ये बनजारे इन सब बातों से कोसों दूर होते हैँ. उन्हें तो आदमी छोडो जीव जंतुओं से भी स्नेह हो जाता है. भोजन करने बैठते हैँ अभ्यागत के साथ साथ चिड़िया चीटी, कौआ, गाय, कुत्ता सब का भाग निकाल देते हैँ. सबके सर पर वरद हस्त रख देते हैँ, सबकी पीठ
सहला देते हैँ. उन्हें कोई पराया नहीं लगता, सब उनके अपने हैँ. जिस घर में जन्म लेते हैँ उनके प्रति अपने दायित्व तो जरूर निभाते हैँ पर गलत सलत में हाँ में हाँ नहीं मिलाते. अपनी समबाई सा खूब समझाते हैँ कहते हैँऔऱ जो न माने तो उसके भाग्य पर छोड़ देते हैँ कि न माने तो कर ले मन की सी, फिर मत रोइयो कि अब का करूं.अब बनजारे ऐसा करें तो एक बार को समझ भी आता है कि आगे नाथ न पीछे पगहा, कहाँ ले जायेगा बेचारा जोड़ जोड़ के, सब यहीँ तो रह जाना है. औऱ जिनके आगे पीछे हैँ जो आस औलाद वाले हैँ उन्हें जे सोच लेनी चहिये कि पूत सपूत तो का धन संचय औऱ पूत कपूत तो का धन संचय. ढंग को निकल गयो तो इतने रेज को कमायेगो कि घर भर देगो,अपने परिवार के साथ साथ 🥰औऱ दस कू पाल लेयगो औऱ जो भगवान ने बिगार ही दई तो धरे भये ही ए उड़ाय डालेगो.
तो कान खोल के सुन लेयो अपनो धर्म मत बिगाडो.जो बन पड़े जरूर कर देयो. जितनो तिहारो दायित्व है बाये जरूर निभाओ पर अपने पराये में ऐसो भेद मत कर दीयों कि कल कू पछताते फिरो कि जे तो हमसे गनती है गयी, हमें ऐसो नाय करनो चहिये तो भैया मरे पीछे खूब रोबो करो साँप निकलबे पीछे खूब लकीर पीटबो करो, बा ते कछु नाय होत.गिरधर कह गये कि नाय बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय, काम बिगाड़े आपनो औऱ जग में होत हंसाय, जग में होत हंसाय चित्त में चैन न पाबे.तो भैया हम जे न कह रहे कि तुम सब घर बार छोड़ z