सफर जारी है....1018
08.08.2022
झुकना /रुकना मना है ......
जहां गलती न हो वहां झुके क्यों और जहां इज्जत न हों वहां रुके क्यों, कहने में बड़ा अच्छा लगता है और बड़े बड़े अक्षरों में लिखकर पोस्टर बना कर लगा दो तो शोभा और बढ़ जाती है पर ये सब यदि जीवन में शामिल करते उठा पटक शुरू हो जाती है। सदियों से घर बनाए रखने के लिए यही सिखाबन दी जाती रही है कि जैसे भी हो, चार बात सुन लो, थोड़ा गम खाओ थोड़ा कम खाओ पर घर किसी भी कीमत पर बचना ही चाहिए। नानी दादी की पीढ़ियों को ये सब ही तो करते देखा है। गलती न होने पर भी पैर पूज लेना और खूब बेइज्जती होने और उल्टी सीधी सुनकर भी मुंह में कपड़ा ठूंस रो लेना, किसी बड़े के आवाज़ देने पर जल्दी से मुंह धो कर उपस्थित हो जाना, और आंख गीली क्यों है पूछने पर तिनका जाने का बहाना बना देना , किसी के बुरे व्यवहार के प्रति में जितना भी गुस्सा क्यों न हो ,जी कारे के साथ बोलना जरुरी होता है नहीं तो समाजिक व्यवहार प्रतिमान टूटने का खतरा उपस्थित हो जाता है।
क्षमा वीरस्य भूषणम कहा जाता जरूर है पर जब दिल का हर कोना वाणों से छिदा पड़ा हो तो चाह कर भी वीर नहीं बना जाता। सारा सारा दिन उस घटे हुए को याद कर के ही निकल जाता है, क्षमा के विषय में सोचने का समय ही नहीं मिलता। दिल निर्मल हो, सांसारिकता हावी न हो, दुनियां भर के छल छंद से दूरी हो तो कहीं क्षमा के विषय में सोचा जाए।जो शख्स स्वयं से ही सवाल जबाज कर रहा हो , जिसे अपने प्रश्नों के उत्तर न मिल रहे हों, जो स्वयं दबाब में जी रहा हो ,उसे क्षमा जैसे विशाल शब्द का अर्थ खोजने को सही सही डिक्शनरी भी नहीं मिलती। क्षमा बड़ेन को चाहिए छोटन को उत्पात रचने वाले खुद जानते होंगे कि बड़े बड़े अपराधों पर केवल क्षमा करने से ही काम चल जाता तो ये न्यायालय क्यों बने होते, अपराधी के लिए दंड की व्यवस्था क्यों होती , यदि सब कर करा कर एक सॉरी कह देना काफी होता तो दुनियां पूरी तरह से बदली बदली होती। फिर तो बच्चे जी भर के उत्पात करते , घर पड़ोस क्लास नाते रिश्तेदार से जैसा चाहे व्यवहार करते, किसी को चिढ़ाते खिझाते ,,किसी पर दो चार हाथ आजमाते और बाद में एक सॉरी बोलकर सारे अपराधों से मुक्ति पा जाते, उनकी हिम्मत बढ़ती जाती। बस एक सिद्धांत स्थापित हो जाता जो मर्ज़ी चाहे करो और बाद में सॉरी का लेवल चस्पा कर दो।
दूसरी तरह वह प्रजाति है जो हर वक्त गुस्से से लैस रहती है, ऐंठ के मारे पैंठ को जाती है, किसी भी बात का सीधे मुंह ज़बाब नहीं देती । पता ही नहीं चल पाता कि ये चिर स्थाई गुस्सा आखिर है किस बात पर और है किस किस पर। घर परिवार समाज सभी तो इसके आये दिन शिकार बनते हैं।और गुस्सा है भी तो एक दिन तसल्ली से बैठकर उसे रिलीज कर दो लेकिन मन में पाले मत रहो। ये जमा हुआ आक्रोश जब कभी भी पिघलेगा तो गर्म लावा जैसे फूटेगा। और फूटेगा ही नहीं, बहुतों को अपनी चपेट में ले लेगा तो जिस किसी भी कारण से मन पर दबाब हो तो उसे रोज का रोज रिलीज कर देना ज्यादा अच्छा होता है वनस्पत उसे सालों पालने और उसका पहाड़ बना लेने के। बहुत अच्छी लगती हैं ये बडी बडी बातें पर तभी तक जब तक वे पढ़ने पढ़ाने और दूसरे को उपदेश देने के लिए होती हैं पर जैसे ही इन्हें रोजमर्रा के व्यवहार में लाना होता है ,सारी ठसक धरी रह जाती है। आल गिल्टर्स देट आर नॉट गोल्ड, ऐसे ही थोड़े रच दिया गया होगा। तो जो दूर से देखने में अच्छा लगता है, व्यवहार में लाते ही उसके प्रतिमान बदलने लगते हैं, मेरा तेरा शुरू हो जाता है। सारे फसाद की जड़ तो ये ही है। अपने अपने अंश को रोते बिलखते परेशान होते और निराशा में जकड़ते भी तो नहीं देखा जाता। तराजू के पलड़े में रखें तो दो पक्षों की गलतियों में आनुपातिक अंतर भले हो, गलतियों के वर्गीकरण में वैविध्य भले से हो पर सच तो यह भी है न कि ताली एक हाथ से नहीं बजा करती और जब पानी सिर के ऊपर बहने लगता है तभी बिखरता है, अपने बांध अपनी सीमाएं तोड़ बाहर आने को बेतरतीब मचलता है, किसी के रोके नहीं रुकता ।
जब कुछ हाथ में है ही नहीं तो कोरी बातें करने का भी भला क्या लाभ, अब तो जो करेगा, ईश्वर ही करेगा। तो प्रभु जी तुम्हारे आसरे हैं, दंड सजा माफी जो देना हो दो । सब तुम्हारे ही आसरे हैं। जो जो जब जब हुआ, हुआ तो आपकी प्रेरणा से ही होगा तो भगवन दया बनाए रखना। बस हम बालक तो प्रार्थना ही कर सकते हैं। बहुत परीक्षाएं ले ली भगवन, अब धैर्य और हिम्मत का साहस भी चुकने को है। मेरी लाज रखो गिरधारी, मैं आई शरण तिहारी।