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Thursday, April 28, 2022

जो जीता वही सिकन्दर........

 सफर जारी है.....845

12.02.2022

बात प्रेम की हो, युद्ध की हो या दोस्ती की हो जो विजयी हो जाते हैं ,वही श्रेष्ठ ठहरते हैं,दुनिया में वही मान पाते हैं,उन्हीं का नाम होता है,वही नम्बर वन कहे जाते हैं,वही पुरस्कृत और सम्मानित होते हैं, उन्हें ही संसार पूजता है।शेष वक्त की धूल में खो जाते हैं।कहते भले अवश्य हो कि जिंदगी में सुख दुख अंधेरे उजाले की तरह जीत हार लगी रहती है पर व्यक्ति हार को आसानी से पचा नहीं पाता।जबकि कई कई मामलों में ये हार और असफलता आपको जीवन के महत्वपूर्ण पाठ पढ़ा जाती है, जरूरी सबक दे जाती है।जो खेल की भावना से नहीं खेलते उन्हें हार बहुत सालती है, तोड़ कर रख देती है, जीवन के प्रति उनका नजरिया ही बदल जाता है।कुछ तो जो भी करते हों पढाई लिखाई ,खेल या परीक्षा, सब जीत के लिए ही करते हैं।कर्तव्य समझ कर कर के छोड़ नहीं देते कि जो भी परिणाम होगा स्वीकार होगा।उन्होंने सम्भवतः यह सीखा ही नहीं होता कि जब किसी मार्ग पर आगे बढ़ते हैं तो गिरते भी हैं ठोकर भी लगती हैं कांटे भी चुभते हैं पैर लहूलुहान हो जाते हैं,अंधेरा हो जाता है मार्ग सूझता नहीं ,मंजिल तक पहुंच नहीं पाते लेकिन हार कर बैठ नहीं जाते, उसे पकड़े नहीं रहते,रोते झींकते नहीं रहते ,दिन रात भाग्य को कोसते नहीं रहते कि हमारे भाग्य में यही लिखा है, वे उस हार से सबक लेते हैं नया सीखते हैं और पूरी ताकत और जोश से आगे बढ़ते हैं।

         किसी को एक ही प्रयास में सफलता मिल जाती है और किसी को बार बार लगातार प्रयास करना होता है।यह कार्य की प्रकृति और आपकी क्षमता योग्यता कार्यशैली पर भी निर्भर करता है।निश्चित ही बड़े लक्ष्य अधिक मेहनत और धैर्य मांगते हैं।तो जो कार्य हाथ में लो उसे पूरे मन से करो।उसकी योजना बनाओ, अपनी शक्ति और संसाधन तौलो, यूं ही किसी के कहने मात्र से नहीं, दूसरों की देखा दाखी नहीं, दूसरों का मन रखने को नहीं।जो काम हम किसी दूसरे को खुश करने के लिए करते हैं उसमें स्वत: प्रेरणा नहीं होती।और जैसे ही दबाब कम होता है हम पुरानी स्थिति में लौट आते हैं।कभी कभी हार में भी जीत छिपी होती है।अपनो से हार जाने का आनन्द ही अलग है।झूठी जिद और खोखले अहम के चलते आत्मीय रिश्ते खो देने से तो हार जाना सौ बट अच्छा है।कम से कम घर परिवार तो बने रहते हैं, दो बात किसी ने ज्यादा कह भी लीं तो कौन हम नीचे हो जाते हैं पर दम्भ सामान्य कहां रहने देता है, वह तो हर समय सेहरा अपने ही सिर बांधना चाहता है।कुछ का मैँ पन इतना प्रधान होता है कि उसके आगे सब मक्खी मच्छर, भेड़ बकरी से नजर आते हैं जिनकी जान की कोई कीमत नहीं होती, उन्हें पैर तले मसल दिया जाता है।

         मुझे सुदर्शन की हार की जीत कहानी अक्सर याद आती है कि किस तरह बाबा भारती हार कर भी जीत जाते हैं।खड़गसिंह सुल्तान को प्राप्त करने के लिए चाल चलता है, बीमार रोगी बन मार्ग में पड़ जाता है, बाबा भारती उस पर दया कर घोड़े पर बिठा लेते हैं और वह चीते की फुर्ती से बाबा के हाथ से लगाम छुड़ा घोड़े को सरपट भगा ले जाता है।बाबा भौंचक्के से रह जाते हैं।खड़गसिंह को आवाज देते हैं सुनो भाई घोड़ा भले ही ले जाओ पर किसी से ये प्रसंग भूल कर भी मत कहना नहीं तो लोग गरीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे।खड़गसिंह के मन में बाबा की बात घर कर जाती है और वह नीम अंधेरे में सुल्तान को अस्तबल में बांध जाता है।बाबा भारती घोड़े सुल्तान को देख कर खुशी से फूले नहीं समाते, वह हार कर भी जीत जाते हैं ,उनकी सदाशयता खड़गसिंह जैसे क्रूर की मानसिकता बदल देती है।फिर बुद्ध याद आते हैं वे भी तो अंगुलिमाल डाकू का ह्र्दयपरिवर्तन कर देते हैं, साधु वाल्मीकि से केवल इतना ही कहते हैं न कि एक बार घर जाकर परिवारीजनों से पूछ तो लो कि पाप की कमाई में उनका कितना हिस्सा होगा और वाल्मीकि सच जानकर उनके पैरों में गिर जाते हैं उनके बन्धन खोल देते हैं मरा मरा जप राम को पा लेते हैं।सम्राट अशोक कलिंग युद्ध जीत जाते हैंपर युद्ध के बाद लोगों का करुण क्रंदन लाशों का ढेर उन्हें सहज कब रहने देता है, वे शस्त्र ही त्याग देते हैं ,हिंसा छोड़ देते हैं चन्ड अशोक से सर्वप्रिय अशोक बन जाते हैं।अशोक लाट आज भी याद दिलाती है कि सब कुछ हार कर भी मन जीत लिए जाए तो इससे बड़ी जीत और क्या होगी।

         सिकन्दर जिसे इतिहास विश्व विजेता कहता हैं उसने जीत कर कौन से तारे तोड़ लिये, जब दुनिया से गया तो सब यहीं छोड़ गया,उसे समझ आ गया कि चाहे जितना मर्जी जीत लो साथ में तो सुईं की नोंक तक नहीं जाती।इतिहास गवाह है असली जीत वही है जब आप लोगों का दिल जीत लेते हैं।तो सारी कोशिश दिलों को जीतने की होनी चाहिए, बाकी जीत तो दिखाबे की जीत है।जीत में जो भी जीतते हो सब यहीं छूट जाता है तो दूसरों को जीतने से पहले खुद को जीतना जरूरी होता है।दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें, हमको मन की शक्ति देना जय विजय करे।सच स्वयम को जीतना ही कठिन होता है, इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना कठिन है।दूसरों को तो छल बल से जीता जा सकता है पर जो स्वयम को नहीं जीत पाते, अपनी इच्छाओं का नियमन नहीं कर पाते, इंद्रियों के दास बने रहते हैं, मन रूपी घोड़े की बलगा नहीं थाम पाते, उस पर अंकुश नहीं लगा पाते वे जीत कर भी हार जाते हैं।सो जिंदगी में हार जीत तो लगी रहती है पर हार जीवन के कुछ जरूरी सबक सीखा जाए तो ये हार जीत से सौगुना अच्छी है।तो दूसरों को जीत जीत कर खुश मत होते रहिये, अपने को जीतने की कोशिश कीजिये, दूसरों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...