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Tuesday, September 13, 2022

हिंदी हूं हिंदी

 सफर जारी है ....1055

13.09.2022

हिंदी हूं हिंदी....... 

हां, मैं हिंदी हूं हिंदी ,हिंद की हिंदी, हिंदुस्तान की हिंदी। सितम्बर की चौदह तारीख मेरे नाम है सो आज का दिन मेरा है, दिन ही क्या, सप्ताह, पखवारा, माह सब मेरा ही है। देखा नहीं क्या, हर स्कूल , कालेज, संस्था में इस महीने तो मैं ही मैं छाई रहूंगी। मेरे नाम पर गुजरात के सूरत में एक बड़ा मेला लगा है, क्या कहते हैं उसे राजभाषा सम्मेलन, हां, तो राजभाषा हूं तो मुझे खूब मान मिलता है, बड़े बड़े लोग मंच पर बैठ मेरा गुणगान करेंगे, मेरे विकास, मेरे प्रचार प्रसार के लिए योजना बनाएंगे, विद्वान भाषण देंगे , कुछ से लेख लिखेंगे, कुछ प्रपत्र का वाचन करेंगे, स्कूली स्तर पर गीत संगीत, अंत्याक्षरी, नाटक, कविता प्रतियोगिता होगी। कुल मिलाकर मेरे खूब चर्चे होंगे, जगत हिंदीमय हो जाएगा, मैं फूली नहीं समाऊंगी, मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं होगी।

पर ये दिन बीतते, सप्ताह बीतते, माह बीतते मेरी खुशी काफूर हो जाएगी, मेरे मस्तिष्क पर चिंता की लकीरें गहरा जायेंगी, मैं फाइलों और दस्तावेज में बंद कर दी जाऊंगी, जो आज मुझे केंद्र में रख ताली बजा गोल गोल घूम और नाच रहे हैं, वे सब मुझे अकेला छोड़ अन्य अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाएंगे। मेरी ओर मुंह उठा के देखेंगे भी नहीं, मैं अपनी दुर्दशा पर अकेली ही रोती और सुबकती रहूंगी। जो आज मेरे नाम का जप सा कर रहे हैं ,हिंदी हिंदी जप रहे हैं, मैं उनके ह्रदय में बसी होती तो वे एक माह बाद मुझे भुला थोड़े ही देते। वे आडंबरी ज्यादा है, करते कम गाते अधिक हैं, उनका हिंदी जप ठीक वैसा ही है जैसा माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिश फिरे यह तो सुमिरन नाहि। ये बड़बोले मेरे कार्यक्रमों के नाम पर ही एक बड़ी राशि फूंक देते हैं और मेरे हाथ कुछ नहीं आता।

तो सुनो मेरा निवास स्थान कहां है, मैं रहती कहां हूं, पनपती कहां हूं। लक्ष्मी धन की देवी के आगमन के लिए आप घर में खूब सफाई रखते हो न, कोना कोना साफ करते हो न तो मेरे लिए भी अपने मन के कोनो में स्थान बनाओ, मुझे मन से सीखो, मेरा रोज प्रयोग करो, मुझे व्यवहार में लाओ। मैं तो रोज़ रोज़ सीखते तुम्हारे अनुभव की विषय वस्तु बनती हूं। तो जो सीखो उसे रोज रोज दोहराओ, लिखो, सुनाओ, बोलो तब तो मुझे सीख पाओगे।

हां, मैं बहुत सरल हूं, जलेबी जैसी गोल गोल घुमावदार और उलझी हुई नहीं। जैसी बोली जाती हूं वैसी ही लिखी जाती हूं। पी यू टी पुट और सी यू टी कट जैसा मेरा उच्चारण नहीं हूं, जो हूं जैसी हूं वैसा ही बोले जाने में यकीन रखती हूं। मुझे सीखना जानना बहुत सरल हैं, मुझे ही क्या सारी भारतीय भाषाओं को सीखना आसान है। जो अपना होता है उसे जानने समझने में भला कहां समय लगता है। तो पहले वर्णमाला लिखना और उच्चरित करना सीखो, फिर वर्तनी को सीखने को हर व्यंजन का मात्रा सहित अभ्यास करो, बारह खड़ी की प्रेक्टिस ज्ञान में बहुत इजाफा करती है। जानते तो होगे बारहखड़ी है क्या, क का कि की कु कू के कै को कौ कं क:, गिनो कितने हो गए बारह ही न, तो हर व्यंजन के साथ इस क्रम को बार बार दोहरा लो, खूब लिख लिख के देख लो, बोलने की खूब प्रेक्टिस कर लो। फिर संयुक्त अक्षर लिखने सीख लो कि खड़ी पाई अंत में हो तो उसे हटाकर दूसरा व्यंजन जोड़ दो म्यामार, म की खड़ी पाई हटा दी न और या लिख दिया। बिल्कुल ठीक। अब मध्य में खड़ी पाई हो तो घुमावदार हिस्से, हुक को हटाकर अगला व्यंजन जोड़ दो, उदाहरण भी दें क्या, लो इस क्या को देख लो। आ गया न समझ। जो व्यंजन गोलाकार आकृति के हैं उनके नीचे हलांत लगा दो, मतलब दो व्यंजनों को जोड़ते एक में से कुछ मायनस करके ही दूसरा जोड़ा जाता है । र के रेफ को विशेष रुप से जान लो। ये कभी ऊपर उड़ाया जाता है तो कभी व्यंजन के साथ अपनी दोस्ती कर लेता है। जो संयुक्त व्यंजन लिखना सीख गए तो अनुस्वार अनुनासिकता का अभ्यास कर लो। बस अब तो विरामादि चिह्न सीखना शेष है। कहां अल्प विराम लगेगा और कहां पूर्ण विराम, कहां प्रश्नवाचक चिह्न लगेगा और कहां संबोधन चिह्न। अब  दो व्यंजनों को मिलाकर शब्द गढ़ना शुरू करो धीरे धीरे तीन चार पांच छह तक के अभ्यास में भी निपुण हो जाओगे। सरल सरल वाक्य लिखो, ये लिखना आ जाए तो संयुक्त वाक्य बनाओ, अनुच्छेद लिखो, पृष्ठ दर पृष्ठ लिखते जाओ। पहले देख कर लिखो, टीपो, उतारो फिर खुद सोच सोच के लिखो। जो मन में है सब लिख डालो, गुरुजी को दिखा दो, जो गलत हो उसे दुबारा सीख लो, बहुत होगा तो डांटेंगे, हो सकता है दो थाप लगा दें पर सीख तो जाओगे न ।बस तो सीखना जरुरी होता है। जो एक बार लिखना बोलना पढ़ना सुनना समझ आ गया तो दूसरे को भी सिखा सकोगे। बस दूसरा तीसरे को तीसरा चौथे को और ये क्रम बढ़ता ही जाएगा, मैं विस्तृत होती जाऊंगी, मेरा प्रसार क्षेत्र बढ़ता ही जाएगा, पूरे हिन्द में क्या पूरे विश्व में मेरा परचम लहरेगा। बस तुम कर्मयोगी से लगे रहना। नित साधना करना। लोगों तक मुझे पहुंचाना। मुझे मौन साधक बहुत पसंद है जो अनवरत मेरे प्रचार प्रसार में लगे रहते हैं।

     तो तुम भी बनो मौन साधक, करो खूब गाओ कम, मुझे पालो पोसो,दुलराओ, अंक में भरो, मैं तो भाव की भूखी हूं जो मुझे भाव से भजता है, मुझे ध्यान से सीखता है, परिश्रम से पोसता है, उसके पास तो मैं दौड़ी दौड़ी आती हूं। मैं हिंदी हूं हिंदी, करोड़ों की कंठहार, अपनी सहोदराओं के साथ प्रेम से रहती हूं, मेरा किसी से विद्वेष, वैर भाव नहीं, मैं तो सबसे लेकर अपने में समाहित कर लेती हूं। तो बोलो जय हिंद जय हिंदी।

इत्ते उलायती हू मत बनो

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