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Thursday, April 28, 2022

कभी धूप कभी छांह

 सफर जारी है....847

14.02.2022

जीवन सुख दुख, हानि लाभ, धूप छांह, खुशी गम, प्रसन्नता उदग्विनता की मिली जुली खिचड़ी है।समझदार लोग इसमें समत्व बनाना जानते हैं और अनसमझ इससे विचलित हो जाते हैं।और कहें तो प्रसन्नता में फूल जाते हैं दमक जाते हैं और दुख कष्ट विप्पति में पिचक जाते हैं, सुन्न काले पड़ जाते हैं।उन्हें सुख दुख दोनों प्रभावित करते हैं, एक उन्हें उछालता है तो दूसरा सालता है।ये जानते हुए भी गहरी अंधेरी रात के बाद पौ फटती है, सवेरा होता है, सूरज अपना प्रकाश फैलाता ही है।पर जब तक घुप्प अंधेरा रहता है तब तक मन चिंताग्रस्त बना रहता है।ये सब दिनन का फेर है।सब दिन जात न एक समाना।रहीम समझाते हैं रहिमन चुप ह्वे बैठिए देख दिनन को फिर, फिर नीके दिन आइहे तनिक न लगिहैं देर।हां,जब अच्छा समय ही नहीं रहा तो भला बुरा क्यों टिका रहेगा, वह भी बीत ही जायेगा पर जब तक बीतेगा तब तक व्यक्ति कई कई बार मर चुकेगा।

        ये गाते गुनगुनाते भजन और लोक सन्दर्भ भी मन को बहुत बल देते है। सुख दुख दोनों रहते जिसमें जीवन है वह गांव, कभी धूप कभी छांव।ऊपर वाला पासा फैंके नीचे चलते दांव, कभी धूप तो कभी छांव।सच ही कभी कभी डोर आपके हाथ नहीं हुआ करती, आप बस नाचते भर हैं और नचाता कोई और है।सबहिं नचावत राम गुसाईं।अब जग में आये हैं तो भला बुरा कडबा मीठा सब चखना ही पड़ता है।भले भी दिन आते जगत में बुरे भी दिन आते,कड़बे मीठे फल करम के सभी यहां पाते,कभी उल्टे कभी सीधे पड़ते अजब समय के पांव, कभी धूप तो कभी छांव।सच कभी कभी सही दांव भी उल्टे पड़ जाते हैं और आप समझ ही नहीं पाते आखिर गलती कहां हुई।बस सोच सोच कर परेशान होते रहते, विकल्प नहीं खोज पाते।बिल्कुल याद ही नहीं रहता कि क्या खुशियां क्या गम सभी मिलते बारी बारी,मालिक की दुनिया पे चलती यह दुनिया सारी,ध्यान से खेना जग नदियां में बन्दे अपनी नाव, कभी धूप कभी छांव।सच यह दुनिया तो हमने आपने बनाई नहीं, सब ऊपर वाले की करामात है, उसी की चलती है, हम तो प्यादे हैं उसके, चाहे जहां फिट कर दे,मर्जी तो एक मात्र उस की ही चलती है।होता तो वही है जो निर्धारित होता है, सारी गोट भी वही फिट करता है, हमें तो जग नदिया में अपनी नाव खेने में सावधानी रखनी होती है, चप्पू ध्यान से चलाना होता है, पानी की गहराई और अपनी लम्बाई देख कर उतरना होता है नहीं तो डूबने की आशंका बनी रहती है।यही जीवन है जो सुख दुख दोनों से मिलकर बना है पर कभी कभी इसका अनुपात बिगड़ जाता है तो जीवन की धज भी बिगड़ जाती है।

        दिन तो दिन हैं समय समय है,उसमें अच्छे बुरे विशेषण जुड़ते ही रहते है।ऐसा न होता तो राजा नल पर विपत्ति क्यों आती, क्यों मरे पक्षी उड़ जाते, मछलियां पानी में बह जाती, खूंटी हार निगल जाती और क्यों उन्हें नलुआ बन किसी तेली की चाकरी करनी पड़ती।ऐसा न होता तो राम को चौदह वर्ष का वनवास क्यों मिलता, सीता का अपहरण क्यों होता, राम वन वन क्यों भटकते, कृष्ण के जन्म से पूर्व ही शत्रु क्यों पैदा हो जाते, उन्हें यहां वहां क्यों भटकना पड़ता, उनका नाम रणछोड़ क्यों पड़ता, पांडव कौन से गलत थे पर कौरव उन्हें सुईं की नोंक के बराबर भी जमीन देने के लिए कब तैयार हुए, द्रोपदी दुर्योधन को अंधे के अंधे होते हैं न कहती तो महाभारत की नींव क्यों पड़ती।पांडव बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास क्यों भोगते, क्यों वन में भटके भटके डोलते।ये अलग बात है कि अंत में जीते पांडव ही, पर भोगा तो उन्होंने सबसे अधिक ही न।कंस और रावण भले ही मारे गए हों पर भटकना तो  राम और कृष्ण को भी पड़ा न।वक्त की मार से वे भी नहीं बच सके।

        द्रौपदी तो के सखा तो साक्षात कृष्ण भगवान थे पर दुशासन ने भरी सभा में उनकी लाज खींचने का प्रयास तो किया ही न ये अलग बात है कि उनकी करुण पुकार पर कृष्ण दौड़े चले आये, पल्लू को इतना इतना बढ़ा दिया कि उसका ओर छोर दुशासन नहीं पा सका और थक कर चकनाचूर होकर गिर पड़ा।गज ग्राह की लड़ाई में एक बार तो ग्राह ने गज को अपनी चपेट में ले ही लिया, वह तो भला हो भगवान का जो पुकार सुनते ही नंगे पैर दौड़े चले आये और गज की रक्षा की।सुदामा तो कृष्ण के बाल्यकाल के परम मित्र थे पर उन्होंने दरिद्रता का दुख तो भोगा ही, ये अलग बात है कि भामिनी के बार बार टोकने पर कि जा घर से कबहू ना गयो पति टूटो तवा और फूटी कठौती, और द्वारिका जाहु जी द्वारिका जाहु जी आठों याम पुकारने पर सुदामा को जबरन पड़ोसन से मांगे हुए तन्दुल की पोटरी लेकर दीनदयाल के धाम जाना पड़ा और प्रभु ने तीन मुट्ठी तन्दुल खाने के ब्याज से उन्हें त्रिलोक के सारे सुख दे दिए।भगवान तो प्रेम के भूखे हैं ।न होते तो दुर्योधन की मेवा छोड़ विदुर का शाक पात खाने क्यों पहुंच जाते, शबरी के झूठे बेर क्यों चाव से खा लेते।

        समय तो बदलता रहता है, ये घटाटोप हमेशा रहने वाला नहीं है, दिन का उजास फैलेगा ही पर तब तक सकारात्मक बने रहना जरूरी है।सब आपके हाथ होता भी नहीं तो जैसे वक्त का पहिया घूमे घूमते जाओ, दुनिया के सब रंग देख लो, ये भी जरूरी है।गाते गवाते रहो सब दिन जात न एक समाना, सुख दुख जिसमें दोनो रहते जीवन है एक गांव, कभी धूप तो कभी छांव।बीत ही जायेंगे ये दिन भी और आप गा उठेंगे दुख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया छायो रे।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...