सफर जारी है....835
02.02.2022
जीवन में कितना कुछ पीछे छूट जाता है, सब भुला बिसरा दिया जाता है पर कुछ घटनाएं लम्बे समय बल्कि कहें अरसा बीत जाने के बाद ही ऐसी ताजा बनी रहती हैं जैसे कल परसों की बात हो।एक एक दृश्य ज्यों का त्यों पिक्चर की रील सा आंखों के आगे खुलता जाता है ।जीवन के कुछ प्रसंग लाइट हाउस बन जाते हैं, माइल स्टोन बन जाते हैं और ताजिंदगी आपकी दीर्घकालीन स्मृति में सुरक्षित हो जाते हैं।आपके जीवन में ऐसे ट्विस्ट ले आते हैं कि जीवन की धारा ही बदल जाती है।
80 के दशक में बीएड प्रायोगिक परीक्षा के लिए हिंदी
पाठ शिक्षण में रामधारी सिंह दिनकर की कविता लोहे के पेड़ हरे होंगे और संस्कृत पाठ शिक्षण के लिए भगवद गीता के दो श्लोक वासांसि जीर्णानि यथा विहाय और नैनम छिन्दन्ति शस्त्राणि श्लोक का चयन किया।पूरी तैयारी और भावमुद्रा के साथ खूब मन पूर्वक पढाया बिल्कुल वैसे ही जैसा घर पर माताजी ने अभ्यास करवाया था और गुरुजी ने निर्देशित किया था।खूब खूब आत्मविश्वास से वाचन किया, प्रश्न पूछे ,विद्यार्थियों को संस्कृत कक्षा में संस्कृत में निर्देश दिये, शब्दों के अर्थ बताए ।कुल मिलाकर पाठ योजना में जैसा सिखाया गया था एक भी स्टेप छोड़े बिना उसे ज्यों का त्यों निभाया।पिताजी माताजी गुरुजनों से खूब शाबासी पाई।परीक्षा में अच्छे अंक मिलने ही थे, मिले भी।किस्सा वहीं खत्म हो जाना चाहिए था पर हुआ नहीं।वह कविता और श्लोक चालीस बयालीस साल तक साये की तरह पीछे लगे रहे। बार बार लोहे के पेड़ हरे होंगे की पंक्ति दिमाग में हथौड़े से ठक ठक करती रही।जब मर्जी चाहे ये पंक्तियां रात विरात गूंजती रही कि लोहे के पेड़ भला कैसे हरे हो सकते हैं, लोहे में तो पानी भर से जंग लग जाती है,फिर पौधों को पनपने के लिए पेड़ बनने के लिए खूब सींचना होगा, खाद पानी देना होगा,प्रकाश भी चाहियेगा और खूब गुड़ाई भी तब कहीं जाकर बीज अंकुरित होगा, धरती की छाती फाड़कर नवागत छोटी छोटी कोपलों के साथ सबकी निगाहों में आएगा, फिर घेरा लगाकर उसकी सुरक्षा की जाएगी, उसे काटा छांटा जाएगा तब जाकर कहीं तना मजबूत होगा, जड़ें मिट्टी पकड़ेंगी और वह पेड़ का रूप लेगा।ये तो सामान्य बीज की बात है और कहीं लोहे का बीज हुआ तो पता नहीं कितने साल और लग जाएं। फिर भी कोई गारंटी नहीं कि लोहे का पेड़ उगने की कोई संभावना होगी और मान लो कहीं जादू टोने से ऐसा हो भी गया तो वह हरा होगा, इस पर विश्वास करना तो बिल्कुल टेढी खीर है पर कवि कह रहा है तो मानना ही पड़ेगा।माने बिना कोई चारा भी तो नहीं।फिर कबीर याद आये कि वह भी कहते हैं कि पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोई, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।तो भाई प्रेम का असर होता होगा तभी तो कहा गया लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गीत प्रेम के गाता चल, नम होगी यह मिट्टी जरूर आंसू के कण बरसाता चल।तो समझ में आया कि प्रेम और करुणा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है।
तब से सब पर खूब प्रेम और करुणा बरसा रहे हैं पर लोहे के पेड़ हरे तो दूर की बात, अभी तक वे काले से सांबरे भी नहीं हुए ।उनकी कठोरता ज्यों की त्यों है ,रेशा रत्ती कम नहीं हुई।बल्कि उन्हें लगने लगा कि प्रेम करूणा बरसाने वाले बेबकूफों से तो जितना लाभ ले लिया जाए उतना ही कम है।मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नन्दन की तर्ज पर बस अपने लाभ पर चौबीस घण्टे गिद्ध दृष्टि लगाए रहते हैं।फिर याद आया कविता में तो ये भी लिखा था रंगों के सातों घट उड़ेल ये अंधियारी रंग जाएगी, ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।ओह तो सातों रंग भी उड़ेलने थे तभी अंधेरा छंटता नजर आता और लाल लाल महावर भी तो नभ पर छिटकाने को बोला था।हां,तो पूरी कोशिश की थी, सारे रंग उड़ेल दिए थे पर अगला सूरदास की कारी कांबर चढ़े न दूजो रंग पहन कर बैठा था तो क्या करते, कहाँ जाते तो जब तब दिनकर को दुहराते रहते हैं...आंसू के कण बरसाता चल और गीत प्रेम के गाता चल।फिर याद आया एक संवाद सुनाने की बात भी लिखी थी ...शीतलता की है राह ह्रदय तू यह संवाद सुनाता चल।समझाया था और खूब समझाया था कि अकेले मस्तिष्क से कुछ नहीं होता दिल की बात ध्यान से सुनो पर सुनते तो तब जब दिल होता, वह तो दिमाग के नीचे पहले ही दबा के कुचल दिया गया था।रोशनी जगत को देने को अपनी अस्थियां जलाता चल ठीक वैसे ही जैसे दधीचि ने दे दी थी।बिल्कुल ठीक ये भी मंजूर कर लिया कि जगत में प्रकाश बना रहे हम भले ही अंधेरे में रह लेंगे।रह क्या लेंगे अपने को बिल्कुल शून्य कर लिया लेकिन अगला चिकना घड़ा बना बैठा रहा, पूरा का पूरा पानी फिसल कर बह गया।ऐसों पर फर्क पड़ता भी नहीं, वे सामने वाले को टेकिन फार ग्रांटेड लेते हैं।
बस अंतिम अनुच्छेद मन को ढाढस बंधाता है, आशा बनी रहती है कि सब बदलेगा।धरती के भाग हरे होंगे भारती अमृत बरसाएगी,दिन की कराल दाहकता पर चांदनी सुशीतल छाएगी,ज्वालामुखियों के कण्ठों में कलकंठी का आसन होगा, जलदो से लदा गगन होगा,फूलों से भरा भुवन होगा, बेजान यंत्रविरचित गूंगी मूर्तियां एक दिन बोलेंगी।मुंह खोल खोल सबके भीतर शिल्पी तू जीभ बिठाता चल, लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गीत प्रेम के गाता चल, नम होगी ये मिट्टी जरूर आंसू के कण बरसाता चल।तो हम सबको शिल्पी बनना होगा, बेजान गूंगी यंत्र विरचित मूर्तियों के मुंह में जीभ बिठानी होगी।सच सब गूंगे बहरे जैसे ही तो हैं जिन्हें कुछ सुनाई नहीं देता।बस वे उतना भर सुन लेते हैं उतना भर बोलते हैं जितने से उनका काम बन जाये।तो कविता पढ़ने से कुछ नहीं होता, उसे जीना होता है, अनुभूति का विषय बनाना होता है, खुद शिल्पी बनना होता है, संवाद सुनाना होता है, जावक बिखराना होता है, अस्थियां जलानी होती हैं,तब जाकर जलदो से भरा गगन होता है, फूलों से भरा भुवन होता है, मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा होती है,प्रेम के गीत गाने होते हैं, आंसू के कण बरसाने होते हैं तब कहीं जाकर लोहे के पेड़ हरे होते हैंऔर यह मिट्टी नम हो पाती है।