सफर जारी है....926
04.05.2022
ये ओटना क्या होता है और कपास किस चिड़िया का नाम है।और बने रहो विलायती बाबू ,कभी कपास ओटी हो तो जानोगे।बस रेडीमेड जब सब कुछ उपलब्ध है तो किसी को कुछ और जानने की जरूरत भी कहाँ रही।पानी बोतलों में ,चीनी पैकिटों में, सब्जी कटी हुई और अंकुरित तक सब बड़े बड़े मॉल में मिल जाती हो तो लोगों को भला कैसे पता चलेगा कि इनकी उपज कहां होती है और ये हम तक कितनी प्रक्रियाओं से गुजर तक पहुंचती है।वैसे भी सबको आम खाने से मतलब होता है गिनने के चक्कर में कौन पड़े।अब जीवन की आपाधापी ,भागदौड़ और व्यस्तता इतनी अधिक बढ़ गई है कि किसी को किसी से कोई लेना देना नहीं है।कोई कुछ जानना समझना नहीं चाहता, बस कैसे भी उसका काम हो जाना चाहिए।उसे शब्दों के फेर में पड़ना पसन्द भी नहीं।और तुम हो कि उसे रोज मुहावरेदार भाषा सुना सुना के पकाए जा रहे हो।कभी कहते हो दो और दो हमेशा चार नहीं होते तो कभी कहते फिरते हो चार दिन की चांदनी है।अरे भाई बिजली की ऐसी ऐसी व्यवस्थाएं है कि रात भी जगमगाती रहती है तो फिर चांदनी को चार दिन में क्यों बांधते हो।और बिजली गुल हो जाये तो हमारे पास ढेरो ढेरों वैकल्पिक व्यवस्थाएं हैं।प्यासा कुए के पास जाता है क्यों जाए भई,उसके पास इतनी पावर है कि बेचारा कुआ खुद उसके पास दौड़ा चला आता है।एक और एक ग्यारह नहीं होते,अब तो अकेला ही हजार के बराबर होता है।आज किसी को किसी की दरकार कहां रही, सब अपने में भरे पूरे है।अब लँगोटिये यार नहीं हुआ करते, उनके लिए कोई और उपमा खोजो।आदमी आसमान पर पहुंच गया और तुम अभी तक भाड़ ही झोंकने में लगे रहे।कम से कम भाड़ में जाओ को अब तो सिलेबस से बाहर करो।पता नहीं कहां कहां से चुन चुन के मुहावरे और कहावते जबरन कोर्स में रख दिये गए कि उनके साथ द्रविड़ प्राणायाम करते रहो।
लाठी की बड़ी महिमा गाई गई लाठी में गुण बहुत है सदा राखिये संग, गहरे नद नाली परत सदा निभाबे संग, सदा निभाबे संग मार कुत्ता को भगाबे।अरे इतनी सुंदर सुंदर स्टाइलिश सुनहरे मूठ वाली छड़ी आ गई है अब कौन लाठी रखता है भला।वे दिन हवा हुए जब मुख्य दरवाजे के पीछे एक मोटा डंडा रखा रहता था कि चोर आ जाए कि घर में कुत्ता घुस आए तो उसे मार कर भगा दो और चोर को पीट पीट कर अधमरा कर दो।अब कुत्ते तो घर के बिस्तर पर सोते हैं उन्हें दुत्कारा नहीं जाता बल्कि गोद में लेकर सारा दिन स्वीट स्वीट नामों से पुकारा जाता है, तुम्हें एक बार को रोटी मिले न मिले पर उसे खूब दुलराया जाता है।तो अब धोबी का कुत्ता घर का न घाट का कहना बन्द करो।उसके तो दिन बहुर गए हैं।बारह बरस बाद तो घूरे के दिन भी बदल जाते हैं फिर वह तो आखिर कुत्ता मेरा सोना मेरा बबुआ है।रही बात चोर की, वे बहुत एडवांस हो गए हैं, उन्होंने चोरी के नये नये तरीके ईजाद कर लिये हैं।बन्द घरों सब माल गायब हो जाता है और तुम्हें कानों कान खबर भी नहीं होती।ऊंची दुकान फीकी पकवान अब आउटडेटेड हो चुका है, अब तो लोग फीके पकवान के लिए ब्रांडेड दुकानों पर ही जाते है, सब सुगर फ्री की डिमांड करते हैं।क्या करें खून में चीनी का स्तर इतना बढ़ गया है कि सब उससे दूरी बरतने लगे हैं।अब ये लेवल तो बढ़ना ही था।भरपूर सुविधाओं ने हमें महाआलसी जो बना दिया है।साइकिल से जाने में भले ही नाक नीची होती हो पर जिम में उसे चलाने के लिए मोटर गाड़ी में बैठकर जाते हैं।एक और देखो चोर चोर मौसेरे भाई। अरे वे मौसेरे ही क्यों ,चचेरे तये रे फुफेरे ममेरे क्यों नहीं जो सकते।चोरों में तो भाई बंदी चलती ही है।अब कहेंगे नानी के आगे ननसाल की बात मत करे लाली, ननसाल ही क्यों दादी के आगे ददिहाल की क्योंनहीं कर सकते।वे दिन लद गए जब साले सलहज जब कभी के मेहमान हुआ करते थे, आज वे गृहस्थी के जरूरी अंग हो गए हैं।तो बदलते माहौल में अपने मुहावरों को भी अपडेट करना जरूरी है।नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को ही क्यों जाए,वह तीर्थ यात्रा पर चारों धाम भी तो जा सकती है।और इतनी बातें हमें अगला एक मुहावरे पर ही सुना गया कि उस दिन मुंह से निकल गई अरे भाई आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास, तो ओटन और कपास के बहाने हमारी क्लास ले डाली, ऐसे धो धो के सुनाया, ऐसे धोबीपाट मारे कि अभी तक कोमा में है।सोच रहे हैं कि अब अपने भाषायी व्यवहार से मुहावरों को ऐसे गायबकर देना चाहिए जैसे गधे के सिर से सींग।लो इतनी सावधानी बरतते एक मुहावरा और आ गया ।भाई तेरे हाथ जोड़े ,हमें तो बशख दो।कान में ऐंठा दे लयो कि अब नाय बोलिंगे साब।चन्दना तो चुप ई भलो।
सो भाई इन घिसे पिटेमुहावरों के पीछे लठ्ठ लेकर मत पड़े रहो, अब इनसे उबरो, नए ईजाद करो।जमाना बहुत बदल गया है अब सोलहवीं शताब्दी नहीं, इक्कीसवीं सदी में जी रहे हो।