सफर जारी है.….973
24.06.2022
हमने आंगन नहीं बुहारा......
झाड़ना बुहारना दैनिक क्रियाएं हैं।झाड़ू मारना मुहावरा भले हो ,जिस किसी अर्थ में प्रयुक्त होता हो पर सच तो यह है कि झाड़ू और बुहारी के बिना किसी का काम नहीं चलता। नए घर में प्रवेश करते तीन वस्तुएं अनिवार्य रूप से सबसे पहले रखी जाती हैं पानी का बर्तन घड़ा, सुराही आदि, नमक और भगवान का विग्रह, उनकी तस्वीर अथवा प्रतिमा। तीनों के संदर्भ भी बहुत स्पष्ट हैं, घर की साफ सफैयत के लिए झाड़ू, खाने में सबसे जरूरी नमक शायद यह उस समय की कल्पना रही होगी जब नोन, तेल, लकड़ी जीवन जीने के लिए जरूरी रहे होंगे, और ईश्वर तो सब का रखवाला है तो उसे तो किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठित होना ही था। उच्च वर्ग में झाड़ू का स्थान वैक्यूम क्लीनर ने ले लिया। साधन भले ही बदलें हो पर साफ सफाई की संकल्पना तो शाश्वत है।
कुत्ता तक जहां बैठता है, पूंछ से उस जगह को झाड़ लेता है फिर हम तो मानुष हैं बिना साफ सफाई के कैसे रह सकते हैं। घर को धो ओ, झाड़ू पोंछे से साफ करो अब ये काम खुद करो या किसी सेवक सेविका से करवाओ पर घर साफ़ करना जरूरी है जहां काम करने जाते हो ,सफ़ाई तो वहां भी चाहिए। जगह के साथ साथ शरीर और वस्त्र की स्वच्छता आवश्यक है तभी तो रोज सवेरे उठते पहले स्नान करते हैं, साफ़ सुथरे वस्त्र पहनते हैं, रसोई को साफ़ कर भोजन बनाते हैं, हाथ धोकर खाना खाते हैं आदि आदि। ये आदत बहुत बचपन से ही डाल दी जाती है। तो सफ़ाई को लेकर हम सभी सतर्क रहते हैं फिर चाहे वह शारीरिक सफ़ाई हो या वस्तुओं और स्थान की।
तो जब सफ़ाई की आवश्यकता सिद्ध है तो मन को भी साफ़ करना आवश्यक होगा, ईश आराधना के लिए केवल तन ही नहीं, मन की शुद्धता स्वच्छता भी जरूरी है। तभी यह भजन गाए गुनगुनाया जाता है हमने आंगन नहीं बुहारा कैसे आयेंगे भगवान, कैसे आयेंगे भगवान। सच्चे मन से नहीं पुकारा कैसे आयेंगे भगवान। चंचल मन को नहीं संभाला कैसे आयेंगे भगवान। पर भगवान भक्त की सच्ची पुकार पर दौड़े चले आते हैं। गज , प्रहलाद और द्रौपदी की पुकार पर दौड़े चले आए , सब जानते हैं। भक्तों के मान की रक्षा प्रभु अवश्य करते हैं बशर्ते भक्त सच्चे मन से उन्हें पुकारे। भक्त की क्या,वह तो यहां तक कह देता है तूने मुझे बुलाया शेरा वालिए मैं आया मैं आया शेरा वालिए। या निर्मल मन हो तो रघुनायक शबरी के घर आते, सूर श्याम की बांह पकड़ कर साग विदुर घर खाते, हमने ये भी नहीं विचारा कैसे आयेंगे भगवान। हम विचार ही तो नहीं करते कि बिना मन साफ़ हुए ईश्वर आएं तो कैसे आएं। हर कोने कल्मश कषाय की लगी हुई है ढेरी, नहीं ज्ञान की किरण कहीं भी हर कोठरी अंधेरी, आंगन चौबारा अंधियारा, कैसे आयेंगे भगवान। बस सारे दिन छल छंद में लगे रहते हैं फिर कहते हैं हमारी प्रार्थना तो प्रभु ने सुनी ही नहीं। बस एक बार अपने हृदय को निर्मल बना कर तो देखो कि भगवान तो कैसे मन से आपकी बात सुनते हैं। ह्रदय हमारा पिघल न पाया जब देखा दुखियारा, किसी पंथ भूले ने हमसे पाया नहीं सहारा, सूखी है करुणा की धारा कैसे आयेंगे भगवान। तो अपने मन को साफ़ सुथरा रखो, हर जीव के प्रति दया और करुणा रखो, फिर देखो भगवान आते ही नहीं, दौड़े चले आते हैं। और उन्हें खोजना कहां, वे तो तेरे अंदर ही हैं, बस ध्यान से देखना पड़ता है, कुटिलता छोड़नी होती है। याद है न कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढे वन मांही, ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाही। अंतर के पट खोल देख ले ईश्वर पास मिलेगा, हर प्राणी में ही परमेश्वर का आभास मिलेगा। सच्चे मन से नहीं पुकारा कैसे आयेंगे भगवान। तो पुकारो सच्चे मन से, भगवान जी आएंगे, उनको आना ही पड़ेगा, वे रुक ही नहीं सकते।
तो प्रभु को पाना है, उन्हें अपने पास बुलाना है तो मन की, चित्त की गंदगी को बुहारना होगा। विचारों को शुद्ध करना होगा, लाग लपेट छोड़नी होगी, पारदर्शी होना होगा, कथनी करनी का अंतर मिटाना होगा। ऐसे थोड़े ही भगवान मिला करते हैं । घर के आंगन के साथ मन को भी बुहारना होता है। सबके प्रति शुद्ध भाव रखना होता है, सबको अपना मानना होता है, साधना करनी होती है, तब जाकर उनका नाम लेने में आनंद आता है। हरि बोल हरि बोल हरि बोल हरि बोल रे का कीर्तन तभी होता है,राधे राधे भी तभी जपा जाता है। तो बस मन के आंगन को बुहारो, नारियल सीक की झाड़ू लेकर जमी हुई काई को खुरच खुरच कर छुडाओ तब जाके भक्ति मे मन लगता है। तो मन के आंगन को बुहारना बहुत जरूरी है। हमने आंगन नहीं बुहारा कैसे आयेंगे भगवान, चंचल मन को नहिं संभाला कैसे आयेंगे भगवान।