Friday, September 16, 2022

जो न समझे, वह अनाड़ी है

 सफर जारी है....... 1059

18.09.2022

जो न समझे, वह अनाड़ी है ........

जैसा कहा जाता है, सुना जाता है, वह सभी सच भी हो, ऐसा आवश्यक नहीं। पर जिसे श्रव्य और दृश्य दोनों इंद्रियों से सचेत होकर ग्रहण किया जाता है, उसे झुठलाना मुश्किल होता है। कहते सुना है न कि मैंने खुली आंखो से देखा है, दिन के उजाले में देखा है,यह बात झूठ हो ही नहीं सकती।कहन सुनन से अधिक विश्वास आंखों देखी पर किया ही जाता है। अब ये अलग बात है कि व्यक्ति ने इतना छद्म ओढ़ लिया है कि कभी कभी आंखे जो देखती है या जहां तक देख पाती हैं, वह पूर्ण सत्य नहीं हुआ करता। मानव व्यवहार इतना जटिल है कि उसे समझ पाना सबके बूते का नहीं हुआ करता। फिर सामने वाला भी अब इतना पारदर्शी कहां रहा कि जैसा है वैसा दिख सके। उसके मस्तिष्क, ह्रदय और कर्मेंद्रीय में समन्वय रहा ही कहां, सोचता कुछ है, दिल में कुछ और होता है और करता कुछ और है। यानि तीन एच में संतुलन नहीं बिठा पाता। ये तीन एच हैड, हार्ट और हैंड हैं। प्रसाद जी ने भी कामायनी में संकेतित किया ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी क्यों हो मन की, एक दूसरे से न मिल सके यही विडंबना है जीवन की।

जो अपने जीवन में पारदर्शी रहे, जिन्होंने जैसा सोचा वैसा कहा और जैसा कहा वैसा जीया, वे इतिहास के पन्नो में अमर हो गए। वे आज भी याद किए जाते हैं क्योंकि वे एक व्यक्ति नहीं जीवन पद्धति हैं, वे आदर्श हैं। उनके बताए रास्ते पर चलकर मंजिल को प्राप्त किया जा सकता है। राष्ट्रीयता के सजग प्रहरी काका कालेलकर के जीवन के उन प्रसंगों और संदर्भों को रेखांकित किया जाना बहुत महत्वपूर्ण हैं जिसने उन्हें बालकृष्ण दत्तात्रेय से काका बनाया। सत्य को लेकर उनकी बड़ी स्पष्ट धारणा थी। सत्य को कहना बहुत आसान है, सारा श्रम तो असत्य को गढ़ने, बात को गोल गोल घुमाने में लगता है, अपनी कमियों को, अक्षमता को छिपाने में लगता है। सत्य सहज स्वाभाविक है इसलिए सरल भी है उसे दो टूक कहा जा सकता है। सारी समस्या तो झूठ को गढ़ने में आती है। एक सत्य को छिपाने के लिए सौ झूठ गढ़ने पड़ते हैं और झूठ की पोलपट्टी न जानें कब खुल जाए, इसके लिए बहुत सतर्क रहना पड़ता है। तो किसी भी वस्तु व्यक्ति को देखने का अपना नजरिया बदलना होता है। हम तो किसी के विषय में सोचने से पहले अपना लाभ हानि देखना शुरू कर देते हैं। हम तटस्थ हैं कब, जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने में लगे हैं। जिस बर्तन में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं। जिस संस्था से आजीविका ले अपना और बच्चे का पेट पालते हैं, उसी के प्रति निष्ठावान नहीं हैं। उसके प्रति हमारी कोई प्रतिबद्धता नहीं है। पशुपालक तक अपने पशुओं के प्रति संवेदन शील होते हैं और एक वर्ग वह है जो कालीदास की तरह मूर्खता कर उसी डाल को काटता है जिस पर बैठा है। पता नहीं, उसे बोध नहीं या वह खुट सयाना है।

अपने अपने कार्य दायित्वों को यदि प्रत्येक अपना धर्म मानकर पालन करे, पद को दायित्व मानकर अपने को कार्यकर्ता मानकर कार्य करे तो आधी से अधिक समस्याएं हल हो जाएं। संस्थाएं मजबूत तब हुआ करती हैं जब उससे जुड़ी हर एक इकाई अपने कार्य दायित्व का निष्ठा से निर्वहन करें। एक तो यह करो मत और जब कोई पूछे तो समस्याओं को गिनाना शुरू कर दो कि हमने तो पूरी फाइल तैयार कर रखी है। फाइलों का पेटा भरने से ही कार्य हुआ करते तो अब तक संस्थानों की सूरत बदल हो गई होती। अब एक व्यक्ति केबल इसलिए तैनात किया जाए कि वह एक एक को डिक्टेशन ही देता रहे, यही बताता रहे कि कया करणीय है और क्या अकरनीय तो फिर तुम्हें क्यों बिठाया गया है, तुम्हारे कार्य दायित्व क्या हैं। जिन्हें करना होता है वे रास्ता तलाश ही लेते हैं, सैकड़ों मरुभूमि में बेड़े चला देते हैं, पर्वतों को काटकर नदियां बहा देते हैं। जो कर्मवीर होते हैं उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं हुआ करता।

तो बड़े लोगो को पढा इसलिए जाता है, उन पर सेमिनार, संगोष्ठी, संवाद इसलिए ही आयोजित किए जाते हैं कि उन्हें गुना जाए, उनकी कार्य प्रकृति को समझा जाए, उनसे कुछ सीखा जाए। इन गोष्ठीयों का उद्देश्य मात्र पेपर पढ़ देना और प्रमाणपत्र वितरित कर देना ही नहीं हुआ करता। उन विशेष बिंदुओं को रेखांकित करना होता है जिनको कार्य व्यवहार में लाने से कुछ सुखद और सार्थक परिणाम मिल सके। बोलना मात्र बोलना नहीं हुआ करता, उसके पीछे आपका लंबा अनुभव हुआ करता है और उससे संस्थाएं लाभान्वित ही हुआ करती है। यात्राओं का उद्देश्य भी अपने लोगो से मिलना और उन्हें प्रेरित करना होता है जिससे आगे बढ़ा जा सके। जो पानी रुक जाता है, वह सड़ जाता है, उसमें से बदबू आने लगती है। तो निरंतर बहते रहिए, चलते रहिए, बाधाएं तो आती ही हैं, उनसे भी निपटा जाता है पर उनके भय से काम करना बंदऔर ठप्प नहीं कर दिया जाता ।

कभी समझा बुझा कर कभी निर्देशित कर तो कभी दंड का विधान कर काम करवाए जाते हैं पर ये सब स्वेच्छा से हो, भाव से हो, निष्ठा से हो, प्रतिबद्धता से हो तो अधिक सुखद होता है। तो हमने भी कबीर की तरह आंखो देखी लिख दी है। समझने वाले समझ गए जो न समझे वो अनाड़ी हैं।

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