सफर जारी है.....959
10.06.2022
मनुष्य उत्सव धर्मी है।सात वार में आठ त्योहार मनाने वाले हम भारतीयों का मानस त्योहार का नाम सुनते ही कैसा हरिया जाता है।फिर चाहे वे राष्ट्रीय हों, सामाजिक हों, सांस्कृतिक हों या आयातित हों।हमें तो इसी ब्याज में स्वादिष्ट सुस्वादु पकवान खाने बनाने को मिल जाते हैं और एक के साथ फ्री की तर्ज पर आध्यात्मिक और नैतिक प्रसंग, सन्दर्भ और कथाएं भी थोक के भाव मिल जाती हैं।हर बरस इन कथाओं को दोहराते हम अपने को समृद्ध और जागरूक करते रहते हैं।कथा के अंत में जोड़ी गई टिप्पणी जैसो भगवान ने बाको करो, बाकी लाज राखी, ऐसो सबको होय, के भाव से सबके सुखी स्वस्थ और प्रसन्न रहने की दुआ और प्रार्थना करते रहते हैं।अभी अभी इसी जेठ माह में वट मावस मनाई ,आज गंगा दशहराऔर कल निर्जला एकादशी का पर्व है।सुराही, घड़े, पंखे और मौसमी फलों आम खरबूज तरबूजों के बाजार सज गए हैं।
नदियां हमारा जीवन हैं, वे पूज्य हैं, हम भारतीय गंग जमुनी सभ्यता के पोषक हैं।गंगा अवतरण की कथा से हम परिचित हैं कि भगीरथ कठोर तप कर गंगा को धरती पर लाये क्योंकि राजा सगर के साठ हजार पुरुखों को तारने के लिए यह जरूरी था।वे तप के बल पर गंगा को धरती पर लाने में सफल तो हुए पर वेगवती गंगा की तेज धार यदि सीधे धरती पर गिरती तो सब पाताल चले जाते, कोई बचता ही कहाँ तो आशुतोष, देवाधिदेव भोलेनाथ से प्रार्थना की गई प्रभु आप संभालो, भोले भंडारी तो नीलकण्ठ हैं, अपने भक्तों के लिए कालकूट विष भी गटक जाते हैं, सिर पर अर्ध चन्द्र धारण करते हैं, तन पर भभूत रमाये रहते हैं सर्पों की माला कंठ में पड़ी रहती हैं,नंदी उनकी सेवा में रहता है चूहा पुत्र गणेश है वाहन है तो मयूर दूसरे पुत्र कार्तिकेय का, पत्नी गौरा शेर पर विराजती हैं, शिव परिवार तो अपने अनोखे पन के लिए ही जाना जाता है तो महादेव गंगा को भी सिर पर धारण कर लेते हैं और जटाजूट की एक लट खोल देते हैं कि गंगा भगीरथ के पीछे पीछे होकर गुजरे कि सबका कल्याण हो सके।गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास ही उन्हें भगीरथ बना देता है और वे एक मिसाल बन जाते हैं। भगीरथ प्रयास,भीष्म प्रतिज्ञा तो जनमानस के आदर्श हैं।
नदियों में स्नान करने से पूर्व उनकी पूजा आराधना की जाती है, उन्हें स्वच्छ बनाये रखने की प्रतिबद्धता हमें याद रही होती तो आज नदी को जानो जैसे प्रकल्पों का आयोजन करने की जरूरत नहीं पड़ती।हम प्रकृति का दोहन करने में इतने मशगूल हो गए कि यह भी याद नहीं रहा कि कम से कम उस डाल को तो नहीं काटे जिस पर बैठे हैं।वह प्रकृति जो हमें जीवन भर कुछ न कुछ देती रहती है उसके प्रति भी हम कृतघ्न हो गए, परिणाम हमारे सामने हैं।हम कविता ही भुला बैठे....प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।सूरज हमें रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, दूसरों का भी हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें।खूब पढ़ते पढ़ाते रहे कि नदियां अपना जल नहीं पीती, पेड़ अपना फल नहीं खाते,संत तो परोपकारी होते हैं, वे अपना जीवन परार्थ में ही लगा देते हैं।दधीचि से लेकर शिवि तक की दीर्घ परम्परा है हमारी।हम याद क्यों नहीं रख पाते, सब भूलभाल कैसे जाते हैं।
तब लगता है ये वार तोहार याद दिलाने के सूचक ही तो नहीं है।हम इनके ब्याज से ही सही,अपनी समृद्ध परंपरा को पूजें।हम प्रकृति पूजक बने रहें, उनका अंधाधुंध दोहन न करें।जंगल बचे ही कहाँ अब, नदियों को हम पहले ही प्रदूषित कर चुके, वायु तक शुद्ध नहीं बची, पानी बोतल में समा गया, अब कितना और गिरेंगे हम।सब कुछ नाश करने पर तुल गए क्या।तालाब हमने पाट दिए, नदियां हमने दूषित कर दी, जंगल काट दिए,पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने के दोषी हम हैं तो आखिर कब सुधरेंगे हम।आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ा हमने, पीने को पानी नहीं होगा और सांस लेने को शुद्ध हवा तो कैसे बचेगा उनका जीवन।कैसे भी जिस किसी ब्याज से बात समझ आ जाएं, समझ लेनी चाहिए।अभी कम से कम सचेतक तो हैं जो हमें हर पल जागरूक कर रहे हैं, कर्तव्यों के प्रति आगाह कर रहे हैं, अभी भी चेत जाओ, ये समय भी खो दिया तो केवल और केवल पश्चाताप शेष रह जॉयेगा, सिर धुनना शेष रह जॉयेगा, कुछ हाथ नहीं आएगा।
तो पर्व के महत्व को समझो, अपनी सांस्कृतिक परम्पराओ को जानो कि आखिर मौसमी फलों को दान देने उन्हें खाने, गेहूं की कौमुरी बनाने के संदर्भ क्या केवल मुंह के स्वाद बढ़ाने के लिए हैं या इनके सन्दर्भ और भी हैं।ये दशहरा मात्र खरबूज तरबूज का नहीं, नदियां स्नान करने लायक बची रहें, ये कवायद जरूरी है।हम बाथ टबों में इतने मशगूल न हो जाएं कि जल के प्राकृतिक स्रोतों को ही भुला बैठें।जाग मुसाफिर जाग, अब जागन की बार।