सफर जारी है...999
20.07.2022
गरजत बरसत सावन आयो रे.....
अब सावन को आना तो बादलों की गड़गड़ाहट , बिजली की तड़तड़ाहट और बारिश की फुआरो के साथ ही चाहिए था पर अब के सावन सूमसाम सा प्रवेश कर गया है, कर क्या गया ,चार पांच दिन भी बीत गए सूखे सूखे में।लगता है आगरा शहर से मेघा रूठे रूठे से हैं, देश भर में खूब बरस रहे हैं, बरस ही नहीं रहे, इत्ती जोर से बरस रहे हैं कि कहीं बादल फट जाते हैं तो कही सब बहा के ले जाते हैं। अब के तो पूजा पाठ से मानेंगे के जोर जोर से गानो पड़ेगो काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे । भूरो बादल पानी लावे, कारो बादर जी डरपानबे और जो कछु याद न आए तो बालपन में पड़ी काई बाई कविता ए गा लेयो ....अम्मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल, गरज रहे हैं बरस रहे हैं दीख रहा है जल ही जल। हवा चल रही क्या पुरवाई भीग रही डाली डाली, ऊपर काली घटा घिरी है नीचे फैली हरियाली। भीग रहे हैं ताल बाग वन भीग रहे हैं घर आंगन,बाहर जाऊ मैं भी भीगूं चाह रहा है मेरा मन।
पर चाहिबे ते कछु नाय होत भईया। काऊ जोतिशी से पूछो कि का करिबे ते मेघा झड़ी लगाएंगे। मोय तो जे लग रई है कि आधो सावन ऐसे ई उमस और घमस में ही निकल जाएगो।बहुत भयो तो अमावस बीते नेक बूंदाबादी हे जाय तो है जाय पर लच्छन लग नाय रये बरसबे के। और जे मान लेयो कि कछु सी बूंद परऊ गई तो जमीन ऐसी दहक रई है कि दो तीन पोत की बारिश तो ऊंट के मुंह में जीरा दाखिल होयेगी, नेक बूंदन ते का प्यास बुझेगी धरती मैय्या की, चुप्प पी जाएगी पांच छह बारिश तो। अब तुम जानो कैसी तपी है जेठ बैसाख और अषाढ़ भर।इत्ते पानी ते कछु नाय होने को। बोई डोर है जावेगो कि नंगो न्हायगो कि निचोड़ेगो।
पर भईया मानुष के हाथ में कछु नाने, अब पैइसन से थोड़ी खरीदी जाबेगी बारिश कि हम तो बौत अमीर है कि बारिश हू खरीद लिंगे। धूप बादल चंदा सूरज तो अरबपति पे हू नाय खरीदे जा सके। एक जे ई तो बचे हैं बाकी तो सब खरीद लियो ई समझो। सो हम बार तो बादल की आस लगाए बैठे है कि खूब जम के बरसे बदरा और रेडुआ में गानो बजे.... बरखा रानी झूम के बरखो।अब हम बहन बेटीन ने तो बाबुल के अंगना जाके खूब झूलबे को मन कर रयो है के हरियाली तीजें आए तो हम सखी सहेली मिल के ऊंची ऊंची पेंग भर के, एक दूसरे ए झोटा दे के खूब जोर जोर ते गाबें कि गोवर्धन को बीजना हरियाली तीजें आबेंगी, मेरी दादी लीपे चौंतरा मेरे बाबा फूल बिखेरंगे के अमुआ के लंबे चौड़े पत्ता पपिहा बोले के अरी मेरी बहना सातों सहेली चलो संग झुला पे चल के झूल लें, कैसी खड़ी हो री बहना अनमनी अरी बहना कैसो तिहारो सत्संग झूला पे चल के झूल लें। चम्पा चमेली वन में जायके, अरे बहना मन में तो उठी है उमंग झूला पे चल के झूल लें। अरे साठ पार हो गए तो क्या झूलने और गाने पर बैन लग गया, मैय्या बाबुल स्वर्ग सिधार गए तो भैया भाभी दीदी छुटकी सब तो है, सो हम तो खूब मगन है के गांगे कि बहुत दिना है गए बलम जी मैं पीहर कू जाऊंगी, और भैया आ गयो मोय लिबाबे झूला झूलबे जाऊंगी मैं तो खूब खूब बतराऊंगी। सावन तो बहन बेटियों के लिए पीहर मायके की सौगात लेकर आता है, मन कैसा हिलोरें लेता है, अपने बचपन की सखी सहेलियों से मिल कैसे हरखा जाता है, दुनिया भर के काम काज एक तरफ और सावन की तीज कजली दूसरे पलड़े में। ये त्योहार सारी खीझ, सारा दबाव सारा तनाव सब उड़नछू कर देते हैं। मन कैसा हिंडोले सा दोलायमान होता है।
तो आते रहें ये सावन भादों, तीज राखी के त्योहार, मनाती रहे आधी आबादी अपनी खुशियां, झूले जाते रहे झूले, पड़ते रहें नीम और आम की डाल पर मोटी रस्सी के झूले, खोजी जाती रहे पटलियां, दिए जाते रहें झोटे, बढ़ती रहें पींगे और गूंजती रहे सावन के गीत मल्हार, बहन बेटियां जाती रहें मायके, इनका मन हरखता रहे और गरज बरस के साथ सावन की फुआरें सबके मन को भिगोती रहें।