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Wednesday, August 17, 2022

सांझ घिर आई है, सपेरो समेटो

 सफर जारी है.......९८२

०३.०७.२०२२

सांझ घिर आई है, सपेरो समेटो ......

वक्त कैसे उड़ा जा रहा है जैसे मुठ्ठी से रेत फिसल रही हो या पैर के नीचे से बालू खिसक रही हो यानी हम नदी के तट पर हैं। हां जीवन भी तो नदी ही है, इस तट से उस तट जाने में ही समय निकल जाता है, नाव पुरानी हो, और तूफान तेज हो तो नाव बहुत झटखोले खाती है पर खिवैया काली कमली वाला हो तब पार लग जाती है। कितने जतन से मानुष छोटे छोटे सामान  संजोता है,तिनका तिनका जोड़ घोंसला बनाता है पर समय बीतते कैसे सब एक बिंदु में सिमट जाता है। जीवन भर जोड़े बटोरे सामानों से, बुने गए रिश्ते नातों से कैसी चिपक सी हो जाती है, घर भले ही सामान से लदे फदे होते हों लेकिन मन खाली खाली से हो जाते हैं। ये तीसरा पहर होता है जब सांझ की आहट होती है, बच्चे अपनी अपनी मंजिल पर पहुंच चुके होते हैं और घर के बड़े बूढ़े चोला छोड़ चुके होते हैं । जिस मोड़ से दो की गृहस्थी ने विस्तार पाया था, अपने कर्तव्य पूरे कर फिर दो के दो ही रह जाते हैं । वर्षों के जोड़े सामान से लगाव सा हो जाता है, जानते हैं कि इन चूल्हा चक्की,सिल बटना, खल्लड मूसली,सूप छलनी, मशीन, सिलाई, क्रोशिया , बडी बडी बाबा आदम के जमाने की कढ़ाही, परात, कटोरदान, अचार की बोट मर्तबान का कोई उपयोग नहीं होना है, इनके विकल्प आ चुके हैं फिर भी उन्हें घर से बाहर करते जी कैसा कच्चा कच्चा सा हो आता है। सब जानते हैं कि जन्म के साथी तक लम्बे समय तक साथ नहीं रह पाते, कोई कभी तो कभी कोई बिछुड़ता चलता है फिर वस्तुओं से लगाव और चिपक का कोई मायने नहीं होता पर चिपक है तो है, लगाव है तो है, उसका क्या किया जाय।पुरानी आदतें कोई ऐसे ही थोड़े छूटती हैं फिर ये तो बरसों बरते गए सामान हैं।

 घर में साफ सफैयत करते, लिपाई पुताई  और रंग रोगन करते  उन सामानों को लंबे समय तक इधर से उधर सरकाया तो जा सकता है, उनकी जगह बदल बदल कर रखा जा सकता है पर उन्हें एकदम बाहर नहीं किया जा सकता। हालांकि बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि इनका अब कोई प्रयोग नहीं करेगा, नई नई डिजाइनों के इतने अच्छे अच्छे सामान आ गए हैं फिर भी उन्हें हटाते कुछ दरक सा जाता है। भले ही से ये नोस्टोलोजिया हो पर है तो है। हम जैसे मन कड़ा करके कितने कितने सामानों का बारा न्यारा कर देते हैं, पसंदीदा पुस्तकों को उठा पुस्तकालय में दे आते हैं, पुराने पेपरों को बेदरदी से दो टुकड़े कर देते हैं पर डायरियों को हटाते मन नहीं मानता। अब इतना साहस क्या कम है कि चार दिनों में चार अलमारियों को बिलकुल खाली कर दिया।इतने बहादुर तो बन ही गए ।ऐसे ऐसे भी भरे पड़े हैं जो बीस पच्चीस साल पुराने कागजातों को हाथ ही न लगाने दें, अपने आप से तो बिलकुल ही न कहें। अब ये अलग बात है कि तुम दुपका चोरी नजर बचा के इधर से उधर कर दो। 

 सच तो ये है कि घर और सामान ही नहीं बिखरता और भी बहुत कुछ बिखरता है जिसे कोई नाम नहीं दे पाते। बिखरे को समेटना सपेटना होता है। दरअसल ये फैलारा केवल भौतिक वस्तुओं भर का ही नहीं है, इसमें नाते रिश्ते, संबंध और सबसे अधिक मन है। मन जिसने अपने को हजार लाख टुकड़ों में बांट रखा है अचानक कैसे एक बिंदु में केंद्रित हो जाता है। शायद इसे ही समेटना सपेरना कहते होंगे। जितना जल्दी खुद को सब ओर से विलग कर उस परम पिता में केंद्रित हो जाएं, गीता के कर्मयोग को निभा सकें, सब करते सरते भी जल में कमल वत रह सकें, उतना ही अच्छा।बस ईश्वर इतनी शक्ति दें। इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो न, हम चलें नेक रस्ते पर हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न। हम न सोचें हमें क्या मिला है,हम ये सोचें किया क्या है अर्पण।बस इस प्रार्थना के बोलों को दोहराते रहेंऔर अन्याय और बुराई से बचे रहें, कर्तव्य पथ पर चलते रहें।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...