सफर जारी है......836
03.02.2022
ज्ञानार्जन जरूरी है तो उसका जीवन में प्रयोग भी उतना ही जरूरी है।केवल सिद्धांत मात्र रटने से कुछ नहीं होता।इसलिए परीक्षा में जहां आपके ज्ञान की जांच होती है वहीं आप सीखे हुए ज्ञान को अपने जीवन में किस तरह प्रयोग कर सकते हैं, इसकी जांच भी प्रायोगिक परीक्षा में कर ली जाती है।अर्थात जो भी सीखो उसे व्यवहार में लाना जरूरी है।जो नहीं ला पाते वे केवल कागजी शेर बने रहते हैं ,व्यवहार में ठनठन गोपाल रह जाते हैं।तो जो मर्जी सीखो उसे व्यवहार में लाने की कवायद जरूरी है नहीं तो सीखने का मतलब ही क्या।आश्चर्य की बात है जो बातें कहने में बहुत सरल लगती है उसे निभाना बहुत कठिन होता है।बड़े बड़े आदर्श वाक्यों को मोटे मोटे सुडौल अक्षरों में लिख कर कमरे में टांग लेना एक बात है और उसे जीवन में अमल करना बिल्कुल दूसरी।ये ही तो कथनी करनी का फर्क है जिसके लिए बार बार कहा जाता है कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।सच ही सब सीख लेना, याद कर लेना रट्टा मार कर इम्तहान में अधिक अंक ले आना एक बात है और सीखे गए ज्ञान को, पढाई को, जीवन में, रोजमर्रा में प्रयोग करना बिल्कुल दूसरी।दोनों में जमीन आसमान का अंतर है, दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है।
परीक्षा देते निबंधात्मक और वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार के प्रश्न हल करने होते हैं।जहां निबंधात्मक में लिखने की स्वतंत्रता होती है वहीं वस्तुनिष्ठ आपकी लेखनी को बहुत सीमित कर देते हैं।बस सही शब्द पर टिक लगाओ या खाली जगह में एक आध शब्द लिख देने भर से काम चल जाता है पर उस जरा से काम को करने के लिए दिमाग बहुत लगाना पड़ता है।खाली स्थान भरो जैसे प्रश्न हल करते करते कब खाली स्थान भरने की आदत स्थाई हो गई, पता भी नहीं चला।अब तो ये हाल है कि कहीं कुछ खाली सा लगता है तो उसे तुरन्त भर दिया जाता है।इस प्रक्रिया में प्राप्त सामग्री मतलब दिए गए शब्दों में से चयन की स्वतंत्रतता मिल जाती है तो कहीं सब कुछ अरेंज करना होता है। याददाश्त पर जोर डालने की नौबत आ जाती है।जो भी हो ये रिक्त स्थान जिंदगी के बहुत बड़े सबक है।इन्हें भरते रहो तो ठीक नहीं तो खाली स्थान बहुत मुंह चिढ़ाते हैं।
खाली पन तो कहीं भी अखरता है फिर चाहे वह भाव का हो वस्तु का आदमी का या अन्य किसी और का।भाव और देशभक्ति के भाव के लिए तो स्पष्ट उल्लेख ही कर दिया गया कि जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं, वह ह्रदय नहीं वह पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।इस खालीपन को भरना बहुत जरूरी है।कभी कभी आप डॉट डॉट कर खाली स्थान छोड़ देते हैं तो उसके ही बहुत मतलब निकाल लिए जाते हैं।कपड़े में छेद हो जाये तो आप उसे रफू कर लेते हैं, उसकी सजावट कर उसे नया रूप दे देते हैं, दिन भर झींकते नहीं रहते कि पहले ऐसा था, ऐसा हुआ करता था, अब सब अतीत बन गया है, उसे गाने से क्या होगा, अब उस गड्ढे को भरना जरूरी है।यदि सब समतल हो जाता है तो फिर किसी का ध्यान नहीं जाता।नाटक नौटंकी रामलीला कृष्णलीला में मूल दृश्यों के बीच बीच में कुछ अन्य लीलाएं भी चलती रहती हैं।वे पूरी तरह से मुख्य कथानक का भाग न भी हों पर उसके आसपास की जरूर होती हैं और कार्यक्रम को पूर्णता देती हैं।
जीवन में कई लोग फिलर की भूमिका में भी बहुत जमते है ।वे जानते हैं कि वे किसी का स्थान रिक्त होने पर उस खाली स्थान को भरने के लिए लाए गए हैं, चिपकाए गए हैं,।उन्हें यह गलत फहमी नहीं पाल लेनी चाहिए कि वे मुख्य भूमिका में हैं।ये सब चार्ज दायित्व अतिरिक्त और कभी कभी कार्यकारी होते हैं यानी आप फिलर होते हैं फिर चाहे वह कार्यालयीन कार्य हो या घर।तो फिलर ही बने रहिये, काम करते रहिये, जुए में जुते रहिये, कोल्हू के बैल की तरह पिरते रहिये, अरे तो काम था इसलिए तो आपको फिलर के रूप में रखा गया है।अब खुद को फिलर की भूमिका से हर बार बाहर मानकर मूल का सा आचरण करने लगोगे तो धुने ही जाओगे।अपने खोल में, सीमा में बने रहो, जितना आसानी से कर सको कर दो।किसी के ऊपर कोई अहसान नहीं है।सबसे पहले आप अपनी भूमिका को समझो, हर काम में हाथ डालना जरूरी है क्या।जो हो वही बने रहो, क्यों सब अपने ऊपर लाद लेते हो, जितना दिया जाए उतना करो।हर के ऊपर स्वयम को आच्छादित मत करो, अपनी भूमिका समझना जरूरी है और ये याद रखना भी कि फिलर हमेशा फिलर ही रहते हैं, वे मूल की भूमिका में फिट नहीं बैठा करते, जगह खाली है इसलिए आप है जैसे ही स्थान भर जाएगा आपको बैक टू पवेलियन होना होगा।तो फिलर जरूरी हैं पर उतने ही जितना उन्हें होना चाहिए।न उससे कम न उससे ज्यादा।अपनी रजाई देखकर पांव फैलाएं और दूसरे के पजामे में पांब न पोये।वस्तु स्थिति को बनाये रखना बहुत जरूरी है।