सफर जारी है....949
30.05.2022
हां भाई हां,ये तीन यानी ननिहाल, ददिहाल और ससुराल बड़े जरूरी है जिंदगी में। बिल्कुल एकल परिवार में रहो तब भी जन्मदाता और सहोदर तो होते ही हैं।।दुनिया में आये हो तो जन्मदाता होंगे ही, आकाश से तो टपके नहीं होंगे, जन्मदाता हैं तो उनके भाई ,बहिन, माता ,पिता भी होंगे।ये हैं तो ददिहाल और ननिहाल भी होगी।अब तुम वहां जाओ न जाओ, ये अलग बात है। सहोदर हैं तो बहनापा भाईचारा निभाना भी आ ही गया होगा ।मौसेरे, ममेरे, चचेरे ,तयेरे, फुफेरे रिश्ते तो जन्म के साथी हैं, इनसे दूरी भले ही रखे रहो पर इन्हें नकार तो नहीं सकते।सम्बन्ध निभ जाए तो सोने में सुहागा और दूरी बनाए रखो तब भी सम्बन्धों का अस्तित्व तो अपनी जगह बना ही रहता है।रिश्तों की जड़ में कितना भी मठा डालो, ये तार तो मरे पीछे भी जुड़े रहते हैं।इन सम्बन्धों को निभाने की कला सबको नहीं आती।अरे जो निजी सम्बन्धों को ही नहीं निभा पाते ,वे अन्य सम्बन्धों को कैसे पोसेंगे भला।
सम्बन्धों को निभाना भी एक कला है।कुछ इसमें बड़े कुशल होते हैं।अपना भी नुकसान नहीं करते और सब से व्यवहार भी बनाये रखते हैं।दरअसल सम्बन्ध वे ही निभते हैं जिनमें आप अपेक्षा नहीं जोड़ते।बस जो बन पड़े, उतना कर भर देते हैं।हर व्यक्ति अलग परिवेश में पलता बड़ा होता है तो उसका व्यक्तित्व भी अलग तरह से शेप लेता है।आप के लिए जो बातें बिल्कुल महत्वहीन होती हैं ,हो सकता है अगला उन्हें पहली प्राथमिकता पर रखता हो।तो कई कई बार अगले को जानना समझना बहुत जरूरी होता है, उसके व्यवहार को समझना होता है, उसे क्या अच्छा बुरा लग जायेगा पता लगाना होता है।फिर यदि कोई अपना है तो उसकी छोटी -छोटी बातों को नजरअंदाज भी करना सीखना होता है। ,रूठे सुजन मनाइए जो रूठे सौ बार, रहिमन फिरि फिरि पोइए टूटे मुक्ता हार।कितनी कितनी बार सम्बन्धों को सहेजना होता है ,देखना होता है कि उनमें गांठ न पड़ जाए और जो गांठ पड़ गई तो गांठ गठीले बन्धनो को निभाना बड़ी टेढी खीर होता है। रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर न जुड़े जुड़े गांठ पड़ी जाए।
रिश्तों में निभाव में स्वभाव और प्रकृति बड़ी भूमिका निभाते हैं।विपरीत स्वभाव वाले के साथ आपके रिश्ते लम्बे नहीं चला करते।रहीम ने पहले ही सावधान किया कि कहो रहीम कैसे निभे बेर केर को संग, वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग।प्रेम से परोसी मोटे अनाज की रोटी भी स्वाद लगती है और बेमन से परोसी मैदा की पूरी भी मन को प्रसन्न नहीं कर पाती।रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत मन मैलो करे सो मैदा जर जाय।सच ही सम्बन्धों का निभाव हर किसी के बस का होता भी नहीं।ऐसे तिर्यक का तो बिल्कुल भी नहीं जो व्यवहार का क ख ग भी नहीं जानते, बस हर समय मुंह सुजाये रहते हैं।
अब जो व्यक्ति अपने इन सगे रिश्तों को ही नहीं निभा पाते, वे नए रिश्तों में कैसे सामंजस्य बिठा पाएंगे।सम्बन्धों के निभाव की नींव तो घर से ही पड़ती है।यदि वहीं आंकड़े गलत बिछ गये,फंदे ही गलत डल गए तो आगे की बुनाबट सही कैसे होगी।घर परिवार बसाते नये घर से सम्बन्ध जुड़ता है ,घरवाली/ घरवाला मिलते हैं,ससुराली रिश्ते जुड़ते हैं, सास ससुर, साले सलहज, साली साडू के सम्बंध फ्री में मिलते हैं,तो चार दिन की चांदनी तक तो सब निभ जाता है लेकिन लम्बे समय तक इसे वे ही निभा पाते हैं जो समझदार होते हैं और सम्बन्धों की गरिमा समझते हैं।अरे अब तो रिश्तों की दृष्टि से और संपन्न हो गए, एक छोड़ दो दो घर हो गए, दोनों हाथों में लड्डू पा गए और क्या चाहिए भला।छेमचन्द की बात याद कर लिया करो छेम गए ससुराल दिना छह में आये, और छेम के आ गए छह मेहमान छेम कहीं गये न आये।तो आते जाते रहिये सम्बन्धियों के यहां, बोलते बतियाते रहिये उनसे, चिठ्ठी पत्री डालते रहिये, राजी खुशी मनाते रहिये उनकी।कुल मिलाकर निभाते रहिये इन सम्बन्धों को, सम्बन्धियों को ।बड़े भाग्यशाली होते हैं वे जिनके पास सम्बन्धों का अकूत खजाना होता है।