सफर जारी है...1020
10.08.2022
राम भरोसे एक......
तुलसीदास एक ऐसे सशक्त हस्ताक्षर हैं कि जब जब जीवन में निराशा के बादल गहराते हैं , उनकी कोई न कोई रचना लाइट हाउस की माफिक घनघोर अंधकार में आशा की धुंधली सी किरण बन उपस्थित हो जाती है । जीवन में अनेकों ऐसे अवसर आते हैं जब आप समस्या को जानते समझते तो सब हैं लेकिन समाधान आपके हाथ नहीं होता। आप समस्या के मूल में हों न हों, लेकिन आपके चिंतन के मूल में समस्या अवश्य होती है। अंधेरे में तीर चलाते उपाय भले ही खोजते रहें पर सच तो यह है कि कुछ ऐंचक वैंचक समस्याओं का समाधान आपके पास होता ही नहीं है । तब आप राम भरोसे हो जाते हैं और राम ही आपको रास्ता दिखाता है, मारग सुझाता है। अब राम तो हम जैसे दरिद्री को क्या दर्शन देंगे पर अपने रामबोला को संकेत जरूर कर देते हैं कि जा, इस मूरख को समझा दे कि जब अपनी अक्ल काम न करे तो तुलसी साहित्य सागर में गोता लगा और जो हाथ लगे उसे चिंतामणी की तरह संभाल कर रख। पायो नाम चारू चिंतामणी उर कर ते न खसैहों।
मुझे भी खोजते खोजते ये पंक्तियां हाथ लग गईं जो हम जैसों के लिए तो हारे को हरिनाम तुल्य संजीवनी माफिक है। तुलसी साथी विपत्ति के,विद्या विनय विवेक।साहस सुकृत सुसत्यव्रत,राम भरोसे एक।गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि किसी भी विपत्ति के समय निम्न सात गुण ही आपको आसन्न संकट से बचाएंगे-आपका ज्ञान,आपकी विनयशीलता,आपका बुद्धि विवेक,आपके अन्दर का साहस,आपके सत्कर्म,आपकी सत्यनिष्ठा तथा ईश्वर में अटल विश्वास। ज्ञान यानी जो आपने देख सुन कर पढ़ लिख कर प्राप्त किया है, महापुरुषों के आप्त वचन पढ़े हैं, सूक्ति याद की हैं, परंपरा से जो जानकारी प्राप्त की है। जैसे बचपन में सुनी रामू श्यामू की कहानी की ये सीख कभी नहीं भूलती कि वक्त पड़े पर काम न आबे, मित्र उसे मत जान। तो जो सीखा है उसे याद रखना और समय पर प्रयोग कर लेना ज्ञान है। विन्याशीलता के बिना तो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता। विद्या का तो अर्थ ही बता दिया गया जो विनय शील बनाएं, वही सच्ची विद्या है। विद्या ददाति विनयम, विनयात याति पात्रत्त्वताम। जो विनय शील नहीं, वह सूखी डाल की तरह अकड़ा खड़ा रहता है और आंधी तूफान आने पर झट से टूट जाता है जबकि घास नमनीयता के कारण आंधी तूफान में झुक कर लेट जाती है और फिर गर्व से सिर उठा कर खड़ी हो जाती है। फल से लदा पेड़ हमेशा झुका होता है। नल की अरु नल नीर की गति एकही कर जोय, ज्यों ज्यों नीचो है चले त्यों त्यों ऊंचो होय।बुद्धि विवेक दोनों को एक साथ रखा गया यानि अकेले बुद्धिमत्ता से काम नहीं बना करते, साथ ही विवेकशील होना बहुत जरूरी है। बुद्धिमान हैं भी तो क्या, विवेक को तो सात कोठरी के अन्दर छिपा कर रखते हैं और चाबी कहीं रख कर भूल जाते हैं। साहसी होने का अर्थ केबल शारीरिक बल नहीं है। सत्साहस जिसकी बात सरदार पूर्णसिंह करते हैं। साहसी व्यक्ति हार के डर से चुप होकर नहीं बैठ जाता, वह अपना कार्य करता है, मुश्किलों से नहीं घबराता, विपत्तियां आती हैं तो आने दो। सूरमा नहीं विचलित होते, अपने आत्म बल को बनाए रखते हैं।
आपके सत्कर्म, आपकी निष्ठा, आपकी सत्यवादिता आपके सबसे बड़े हथियार हैं। पर सत्य परेशान बहुत होता है पराजित हो न हो। कहने को झूठ के पैर नहीं होते पर लोग सफलता का रास्ता झूठ के सहारे ही तय कर लेते हैं और सब पर हावी बने रहते हैं। एक अंतिम बात, भले ही से आप ज्ञानी, बुद्धिमान, विवेक शील, विनम्र, सत्कर्म करने वाले,साहसी, आत्मबल के धनी और सत्यवादी क्यों न हो, जो आपकी ईश्वर में आस्था नहीं तो सारे के सारे गुण ऐसे ही धरे रह जाते हैं। जिन्हें ईश्वर में अटल विश्वास है, वे विचलित नहीं होते। उनकी नैया तो राम जी ही पार लगाते हैं। तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को डरे। अब मन ही तो है, हो जाता है बाबरा, पागलों सा इधर से उधर डोलता है। कुछ समझ नही पाता। और जो राम जी की कृपा हो जाएं तो मन में शान्ति सी आ जाती है। निर्भय हो जाते हैं। राम के भरोसे कंबल लपेट के सो जाते है। तुलसी भरोसे राम के निर्भय होके सो को कस के पकड़ लेते हैं। तो बस ये विश्वास बना रहे कि हरि हमारे साथ हैं, किसी भंवर में डालेंगे तो देर सवेर निकाल भी लेंगे। राम भरोसे एक।