सफर जारी है....952
02.06.2022
आंख खोलकर पड़े रहना जागना नहीं कह लाता।जब तक किसी काम में चेतना केंद्रित न हो जाए तब तक सोया और जागा व्यक्ति समान ही होता है।कुछ सोते हुए भी जगे से रहते हैं अर्थात नींद में भी चिंतन करते रहते हैं तो कुछ जागे होकर भी सोए रहते हैं।जिनके दिमाग सोए रहते हैं फिर भले ही आंख भट्टा सी क्यों न खुली रहे, उनसे बहुत जरूरी सा कुछ न कुछ रोज ही छूट जाता है।अब वे करें भी क्या ,इंसान की सीमा है, सब तो पेट नें भरा नहीं जा सकता ।तो प्राथमिकता तय करना जरूरी है। फिर ध्यान आता है जो आधी को छोड़ पूरी को धाबते हैं, उन्हें पूरी तो छोड़ो,आधी भी प्राप्त नहीं हुआ करती और वे खिसियाने से खम्भा नोंचते से रह जाते हैं।।कुछ ऐसे भाग्यशाली होते हैं कि दोनों हाथों में तो लड्डू होते ही हैं , मन ही मन भी लड्डू फूटते रहते हैं।और यहां ऐसे दलिदर पैदा हुए कि सब करते धरते भी रायता फैल ही जाता है, फिर उसे बटोरते से रहो।समय अलग बर्बाद हो और हाथ में आये निल बटा सन्नाटा।सब भाग्य की बात है, किस्मत के हेठे न होते तो करते धरते भी आलोचना के शिकार क्यों होते।
एक वे लाटसाहब हैं जो करेंगे धरेंगे कुछ नहीं, पर रौब ऐसा गाठेंगे कि सारी जायदाद इनकी बपौती है।और आश्चर्य इस बात का है कि सब जानते बूझते लोग उनका हुक्का सा भरते रहते हैं, बड़ी परवाह है उनकी नाराजगी की, उनके माथे पर नेक सिलवट आ जाएं तो सब को सांप सूंघ जाता है, फिर उनकी चिरौरी में लग जाते हैं।ये सारा माहौल देख कर लगता है कि बेशर्म बने रहने में फायदा है।करो धेला भर मत और रौब गांठो सो अलग।सच ही लिखा कहा होगा जो अति का सीधा होता है वह अपना नाश कराता है, देखो मीठे गन्ने को कोल्हू में पेरा जाता है।देखा है न गन्ने का रस निकालते हुए, कैसे मोड़ तरोड कर मशीन में लगाता जाता है, अंत में जब बिल्कुल जब छूँछ रह जाता है तो उसके बीच भी नींबू लगा फिर मशीन में लगा लेता है और बूंद बूंद रस निचोड़ लेता है, बिल्कुल अंतिम सांस तक।वन में टेढ़े मेढे पेड़ छोड़ दिये जाते हैं और सीधे सट्ट पर झट आरी चल जाती है।तो क्या सीधा होना और गम्भीरता से कार्य करना अपराध की श्रेणी में आता है।और यदि यही सच है तो फिर बदमाश होना, काम से बचने के उपाय खोजना, फूली फूली चरने वाले,बिना हाथ हिलाए यूं ही मुफ्त में क्रेडिट लेने वाले लोग अधिक अच्छे होते है।सबको वैसा ही हो जाना चाहिए।पर कहीं ऐसा हो गया तो सब बंटाधार ही हो जायेगा।
नहीं नहीं, ऐसे नहीं चलेगा, अभी कम से कम इतना संतोष तो है कि हम गलत नहीं कर रहे।कहीं सब खरबूजो को देखकर आप से खरबूजे भी रंग बदलने लगे तो फिर उनमें और आप में भला फर्क ही क्या रह जायेगा,फिर तो आप कहने के हकदार भी कहाँ रहेंगे, और अंतरात्मा अलग कचोटेगी सो अलग।क्या एक दिन भी सपनों में भी सो सकोगे, मन चीत्कार नहीं करेगा कि अरे बन्धु,ये अनर्थ तुम कैसे कर सकते हो, रोज तो याद करते हो कि बिना काम किये खाने वाले को अपच हो जाती है, निष्क्रियता व्यक्ति को बिल्कुल जड़ बना देती है।यदि वे तुम्हें देख कर नहीं बदल सकते तो तुम अपने सच के रास्ते से कैसे विरत हो सकते हो, क्या तुम्हारा अंतर तुम्हें धिक्कारेगा नहीं, क्या तुम चैन की नींद सो पाओगे, क्या अपने बड़ों से आंखें मिला पाओगे, क्या तुम खुद को माफ कर पाओगे, क्या अपनी ही नजरों में नहीं गिर जाओगे।अरे जो हो नहीं सकते वैसा सोचते ही क्यों हो।क्या हुआ जो सब काम अपने पेट में नहीं भर पाये, क्या हुआ जो आपसे कुछ कुछ बहुत जरूरी छूट गया, क्या हुआ जो अगले ने आपकी कमियों की ओर इंगित किया, क्या हुआ जो अपनो की श्रेणी में आते थे वे विश्वासघाती निकले, क्या हुआ जो आप ऊंचे ऊंचे लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके।फिर दोबारा से कोशिश करेंगे, गिरेंगे तो क्या धूल झाड़ कर फिर उठ खड़े होंगे।काम तो बिगड़ा पर अगले का पता तो चल गया।कुछ लोगों में व्यवहारिक समझदारी जल्दी आ जाती है तो कई की अक्ल दाढ़ देरी से निकलती है, कुछ जल्दी सीख जाते हैं तो कुछ गिर गिर कर चोट खा खा कर सीखते हैं।
नेक हमसे सिलबिल्ले और सीरे धीरे लोग देर से जागते हैं,जब सब प्रसाद बंट जाता है ,तब पहुंचते हैं और ठनठन गोपाल रह जाते हैं।उनने शायद पिछारी रोटी खाई होती है, तो अक्ल दाढ़ जरा देर से आती है।वे सिस्टम का पार्ट नहीं बन जाते, इसलिए हमेशा हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं।तो जागने और समय पर जागने के फर्क को समझना जरूरी है, अपने को अद्यतन करना जरूरी है, जागे तभी सवेरा से सबक लेना जरूरी है।