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Sunday, September 25, 2022

बातें हैं बातों का क्या

 सफर जारी है .......1066

24.09.2022

बातें हैं बातों का क्या.......

तो आज श्री गणेश करते हैं बारहवें सूक्त का। जीवन में बातों का कितना महत्व है, यह तो उससे पूछिए जिसे बातें करने का कभी सौभाग्य ही नहीं मिला हो, जो बेचारा मन ही मन अपने आप से बतियाता रहा हो, जिसके पास एक अदद मित्र तक न हो जिसके आगे वह अपना मन खोल सके। सोचो कितनी घुटन होती होगी उसे। बातें इतनी जरुरी न होती तो बाल कृष्ण भट्ट को क्या पड़ी थी कि वे बात पर लेख ही लिख मारते। ये बातें बड़ा शस्त्र हैं समस्याओं को हल करने का, इनका समाधान खोजने का। पिताजी हम बच्चों के तुनक फुनक कर रूठ जाने और आपस में कुट्टी कर बातचीत बंद कर देने पर अक्सर कहा करते थे दो देशों के बड़े से बड़े मुद्दे भी बातों से सुलझा लिए जाते हैं तो कोई बात है तो उसे कह कबा कर रफा दफा करो। मन में घोटते मत रहो। जो दिल में रखे रहोगे तो छोटी सी बात कल को सुरसा का रुप ले लेगी। उसके सारे एंगिल ही बदल जायेंगे। तो छोटी छोटी बातों को वहीं का वहीं कह सुन कर निपटारा करना ज्यादा उचित है वनस्पत उसका तिल का ताड़ बनाने के।

सच बताएं तो बातों का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। बचपन में दोस्तों से बातें करने के चक्कर में घर से डांट भी खाई हैं, कभी कभी तो बातों के तार इतनी लंबे हो जाते कि समय का अतिक्रमण हो जाता और देर से आने के चक्कर में पिटाई ठुकाई होती सो अलग। अब बात करना तो नहीं छोड़ा जा सकता था तो बात करने के घंटे निश्चित कर दिए गए, अपनी घर की देहरी, बाउंड्री, आंगन, बगीचे में बात करने की छूट दे दी गई। सावधानी की दृष्टि से कभी कभी उस ओर कोई बड़ा चक्कर भी काट जाता कि देखें क्या गुफ्तगू हो रही है। हम बाल सखाओं और स्कूली मित्रो के पास बातों का अक्षय भंडार था। इसकी उसकी सबकी बातें, घर की स्कूल की बाहर की रिश्तेदारी की बातें। बातें थीं कि उनका कोई ओर छोर ही नहीं था। कहीं से भी कोई सिरा पकड़ा कर शुरू हो जाते। पहले पहल तो घर में ही बहनें सिर से सिर मिला बातें करते, फिर शाम होते मां खूब खूब बातें बताया करती। नानी दादी की बातें, गांव की बातें, अपने बचपन की बातें। जब पिताजी के साथ बस में बैठ कर रिश्तेदारी में जाना होता, तो पिताजी से तरह तरह के प्रश्न पूछते और बातों में ऐसे खो जाते कि न खाने की सुध रहती न पीने की। बातों ही बातों में कितनी कितनी ज्ञान की बातें मां पिताजी हमारे अंदर ट्रांसफर कर देते।

स्कूल में ख़ाली घंटे या खाने की छुट्टी में या पूरी छुट्टी में खरामा खरामा चलते बातों का पिटारा खुलता। कुछ  बातें करने में इतने उस्ताद थे कि दूसरे का नम्बर ही नहीं आने देते थे, बस वे ऐसे चटर पटर बोलते थे कि बाकी के सब ध्यान लगा के उन्हें सुनने में मशगूल हो जाते। बड़े होते गए और बातों के भंडार भी भरते गए। जैसे जैसे बड़े होते गए, बातें कम और काम ज़्यादा के निर्देश प्रभावी होते गए। बातों बातों में यही समझाया गया कि बातें कितनी मर्जी ज़रूरी हों पर सबसे जरुरी काम होता है। हां ,ये बात अलग है कि उस काम से संबंधित ज़रूरी बातें अवश्य की जानी चाहिए। घर परिवार बसाते भी बाते बहुत ज़रूरी उपादान रहीं। कभी गंभीर मसलो के हल बातों से निकालें जाते रहे तो कभी ख़ाली समय को बातों के उल्लास से भर लिया गया। ये मुआ मोबाइल, टीवी तो अब अधिक प्रचलन में हैं कि घर में दो लोग हैं और दोनों ही अपने अपने मोबाइल से किसी तीसरे से लिखित या मौखिक वार्ता में मशगूल हैं। एक समय था कि रेल में यात्रा करते बेचारा टिकट चैकर यात्रियों को बातों में मशगूल पाकर झकझोरता था। कितनी कितनी बातें होती थीं, सबके पास। अब तो परिवार में भी सदस्यों के मध्य बात नहीं होती। सब बहुत अधिक व्यस्त वाकई में हैं या उन्होंने अपने को बातों से दूर कर लिया है या जानबूझ कर व्यस्तता का चोगा ओढ़ लिया है। राम जाने। पर ये जिनके पास बातों के पिटारे हैं, उन्हें बड़ी अपच हो गई है। बेचारे अपनी बात को पुराने पेड़ के किसी कोटर में ख़ाली कर आते हैं। बातें लिखी जाती हैं, कही जाती हैं, की जाते हैं पर अब बातों में वह बात कहां। कुछ बात करने वालों को , बतकही करने वालों को बातूनी करार दे देते हैं तो कुछ उसे बेबात की बात कह कूड़े की टोकरी में डाल देते हैं। कुछ कह देते हैं बातें हैं बातों का क्या। ये बातें ही आपकी बात बना देती हैं, आपको मशहूर कर देती हैं। तो बातें करते कराते रहिए, लोग मिले तो ठीक नहीं तो खुद से ही बतराते रहिए। बतराना बहुत ज़रूरी है। याद कीजिए और दोहरा लीजिए .... बतरस लाली लाल की मुरली धरी लुकाय, सोंह करें भोंहन हंसे देन कहें नट जाय। तो बातें का रस लीजिए साहब, इन बातों में क्या रखा है।

Thursday, May 19, 2022

बातें हैं बातों का क्या

 सफर जारी है

22.03.2022

बातें मोहक होती हैं,मन मोह लेती हैं, बातों ही बातों में प्यार हो जाता है, बातें गढ़ जाती है, चुभ जाती हैं, बातें खिसिया देती है,बातें उत्तेजित करती हैं, बातें क्रोध दिलाती हैं, बातें आवेश में ले आती हैं, बातें कुछ कर गुजर जाने को प्रेरित करती हैं,बातें जिला देती हैं, बातें जीते जी मार देती हैं, बातें रुला देती हैं, बातें हंसा देती है।आखिर बात बात होती है और जहां सलीके से कही बात आपका सौ दो सौ ग्राम खून बढा देती है तो उज्जडता और बेहूदगी से कही गई बात आपके पूरे सिस्टम को हिला कर रख देती है।

बात अपने में भला होती क्या है  कुछ शब्दों का समुच्च्य ही न ,कभी शब्द मोती की तरह पिरो माला बन जाते हैं तो कहीं क्रोध आक्रोश और जहर उगलते सामने वाले को धड़ धड़ धड़ गिराते चले जाते हैं।कुछ भी साबुत नहीं छोड़ते न दिल न दिमाग।बस एक तीखी तेज कटार से अगला पिछला सब काटते चले जाते हैं।काटते उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे उसी पेड़ की डाली हैं,शाखा हैं, फूल हैं, पत्ती हैं।मूल पर बार बार चोट करते यदि एकबारगी सब तहस नहस हो गया तो क्या तुम्हारा अस्तित्व बच पायेगा।मूल को सींचे बिना तो पेड़ भी नहीं लहलहाते भले ही फुलक को बाल्टी भर सींचते रहो।पर जब अगला कहता है तो अपने अंदर का सारा गन्द, सारा कीचड़, सारा मैल, सारा आक्रोश, सारी भुनभुनाहट ,सारी खुदगर्जी रह रह कर निकालता जाता है।उसे कब याद रहता है कि उसने क्या क्या कह दिया है।वह तो बस अपने को खाली करता जाता है,करता जाता है और जब एकबारगी खाली हो जाता है तो फिर नए सिरे से अपने को भरना शुरू करता है। सात पुश्तों की बात याद करता है, गढ़े मुर्दे उखाड़ता है, अनेक बार कही गई बातों को बारीक बारीक काटता पीसता है। सुनाने के लिए अपने भार को टांगने के लिए वही खूंटी चुनता है जो सब लाद लेने को तैयार हो, सीमा से अधिक वजन उठा ले, रो झींक भले ले पर अगले का रंच मात्र अहित न करे।

जो ज्यादा बोझ से खूंटी लहक गई कि टूट ही गई तो क्या जल्दी ही नई खूंटी मिल जाएगी, टूटी हुई का क्रियाकर्म तो करोगे या उसे यू ही कबाड़ में डाल दोगे।आखिर तो इतने लम्बे समय तक तुम्हारी कहनी अनकहनी का बोझ चुप उठाये चली जा रही है कि कभी तो अगले को बुद्धि आएगी,कभी तो सोच पायेगा कि आखिर वह बोल क्या रहा है। ऐसों को अपसेट माइंड की श्रेणी में  नहीं रखा जा सकता, वे डिमेंशिया के शिकार तो बिल्कुल भी नहीं है, होते तो उन्हें अपने और अपनो के हित की एक एक बात भला याद रहती , वह अपने को कहीं कच्चा नहीं पड़ने देते, आश्चर्य की बात है लाख गुस्से में हों ,कहीं गच्चा नहीं खाते।विष बुझे तीर जने कहां कहां से निकाल कर लाते हैं कि उनका कोटा कभी खत्म नहीं होता।वे सीखे सिखाये पढ़े पढाये हैं, सारा दिन सी आई डी की तरह नये नये प्लान गढ़ने में लगे रहते हैं।उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितना बहूमूल्य समय यों ही बीता जा रहा है।सुनने वाले का क्या, वह तो तब तक सुन रहा है जब तक चिपक है ,लाग लपेट है, सम्बन्धो की ऊष्मा है नहीं तो छूटने में भला कितना समय लगता है।चाहे तो सब वहीं का वहीं झाड़ झूड कर मुक्त हो जाये , अगला पिछला  सब हिसाब चुकता कर ले। ब्याज को छोड़ भी दे तो भी मूल ही इतना है कि देते देते चुक भले जाओ पर भाव सम्पदा का दस अंश भी न चुका पाओ।अरे कुछ देना भी सीखो, देना भौतिक सम्पदा का ही नहीं होता,किसी के मीठे वचनों का ही प्रतिदान दे दो।और जो देना सीखे ही नहीं हो तो कम से कम वाणी की शुचिता तो बनाये रखो।अगला तो इतने से ही भर पायेगा।कौन वह तुमसे कुछ लेने आया है, प्यार के दो बोल सबसे बड़ी नेमत कहे जाते हैं, उनमें तो कम से कम कंजूसी मत बरतो।वचने का दरिद्रता।

   फिर ये भी याद रखना जरूरी है कि ये सब खट्टी मीठी बातें किसी को चिपट नहीं जाती, वह तो धूल सी झाड़ कर आगे बढ़ जाता है पर तुम्हारा आंकलन खूब हो जाता है कि कितने पानी में हो।छोड़ो यार ये बातें हैं बातों का क्या।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...