सफर जारी है....956
07.06.2022
जेठ की गर्मी और उस पर भी नौतपा,ऐसी प्रचंड गर्मी कि छांह भी छांह की चाह रखती है।अब जेठ से बड़ा ओहदा और किसका होगा ,रिश्तों में भी और माह में भी।ज्येष्ठ तो ज्येष्ठ है, ससुर का प्रतिनिधित्व करता है।परिवार को साथ लेकर चलता है, सबको नेह की डोर से बांधे रखता है।घर भर के बच्चों का ताऊ और बड़ा पापा है।जहां चाचा के पास सब छोटी बड़ी बातें शेयर की जा सकती हैं वहीं जेठ जी से थोड़ा पर्दा बना रहता है, वे तो बच्चों को डराने के काम ज्यादा आते हैं।कुछ गड़बड़ की तो बस ताऊजी कान खींच देंगे।सो रिश्तों की गर्माहट मौसम पर भी असर दिखा रही है।ऐसा नहीं है कि पहले गर्मी नहीं पड़ती थी कि लू नहीं चलती थी कि अंधड़ तूफान नहीं आते थे कि सबके सब सीरे में बैठे रहते थे।नहीं भाई नहीं, गर्मी तब भी थी।मौसम का चक्र है , तपेंगे नहीं तो सरसेंगे कैसे, जेठ तपेगा तभी तो आषाढ़ में बारिश का पहला लोंदा गिरेगा, मिट्टी की खुशबू नथुनों में भरेगी, धरती खूब प्यासी होगी तभी दो तीन बारिश का पानी ऐसे ही सोख जायेगी।
सो पहले तपना होता है खूब ,पसीना बहता है तभी हवा सीरी लगती है।अब गर्मी है तो दिन भी पहाड़ सा लम्बा है और रातें भी गर्म हैं । इतनी गर्म कि किसी को चैन नहीं पड़ रहा है,बस सब हाय हाय कर रहे हैं।जो सुविधा सम्पन्न हैं वे एसी कूलर की हवा का आनन्द ले रहे हैं और जिन्हें बिजली ही मयस्सर नहीं ,वे हाथ पंखे बीजना से बयार कर सीरे हो लेते हैं, नीम पीपल की घनी छाँब ही उनका आसरा है।पानी छिड़क छिड़क कर घर आंगन द्वारी ठंडी रखते हैं, डेले की बर्फ को कूट काट कर उसी में चीनी बुरक चुस्की का स्वाद ले लेते हैं।क्या करें कम से कम कुछ देर को ठंडक तो मिल जाती है। इतनी गर्मी में सबके दिमाग भी बहुत गर्म हो गए हैं।क्या मानुस क्या पशु पक्षी सभी जीभ निकाले पानी पानी कर रहे हैं।ऐसी गर्मी को लक्ष्य करते लिखा गया होगा.... कहलाने एकत वसत अहि मयूर मृग बाघ, जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ।इतनी प्रचंड गर्मी कि पशु पक्षी सब आपसी शत्रुता भुलाकर जहां छाँब का टुकड़ा मिल जाता है, जो कोना मिल जाता है उसी में मिल बैठ जाते हैं, बस जान बची रहे,लड़ा भिड़ा तो बाद में भी जा सकता है।सर्प और मोर का वैर जग जाहिर है पर वैर तो तभी तक है जब तक जिंदा हैं, हिरन को बाघ भला कहीं जिंदा छोड़ता है, उसका बस चले तो देखते ही फाड़ कर रख दे।पर जब अपनी जान पर खतरा मंडरा रहा हो तब अपनी जान बचाने की पड़ती है।सो भला हो उस प्रचंड गर्मी का, उस दीरघ दाघ निदाघ का जिसने जगत को तपोवन सा बना दिया है। आपसी शत्रुता को भुला दिया है।
तो ये सच है कि दुख माँजता है, सब वैर भाव भुला देता है, समझदार बना देता है, जब खुद के हाथ झुलसते हैं ,सिर पर बेभाव के झंडे पड़ते हैं ,पीड़ा का अहसास होता है तब समझ आता है कि मार का दर्द एक सा होता है। आग सबको समान रूप से झुलसाती है, वह अमीर गरीब को नहीं देखती, उसका धर्म है जलाना। दुख की अनुभूति समान होती है पर पता नही क्यों हम अपने और दूसरे के कष्ट में अंतर कर बैठते हैं।अपना दुख दुख और दूसरे का मक्कड़ लगता है, बहानेबाजी लगता है।धूप तो सबको एक सा ही तपाती होगी, बस किसी के पास धूप से बचने का साधन है तो आड़ हो जाती है और जो इससे वंचित है वे सूर्य के प्रखर ताप को नङ्गे सिर सीधे झेलते हैं।धूप के मारे सुन्न काले हो जाते हैं।
यह भी देखा कि बहुत सुविधाओं में रहते रहते धूप ताप सहने की शक्ति कम हो जाती है।कल घर परिवार में भागवत कलश यात्रा में टीकाटीक दुपहरिया में जहां महिलाएं, किशोरी ,तरुणी के झुंड के झुंड सिर पर कलश धरे आनन्द और उत्साह में भरे नङ्गे पैर उछलते कूदते च
ले जा रहे थे , वहीं हम जैसे पोच गर्मी के मारे बाबले हुए जा रहे थे।उनकी क्षमता उत्साह के आगे तो हम बहुत बौने सिद्ध हो रहे थे।धूप ताप तो सबके लिए बराबर था पर सब उसे अपने अपने स्वभाव और प्रकृति के संदर्भ में ग्रहण कर रहे थे ।दिमागी करतब करते भले ही सयाने बन लें पर सच में सर्दी गर्मी सहने की शक्ति तुलनात्मक रूप में शून्य थी।
भरी दोपहरी में चलते बस एक ही दोहा मानस में उछल कूद कर रहा है.... बैठि रहि अति सघन वन पैठि सदन तन मांहि, देख दुपहरी जेठ की छाँहो चाहति छाँह।