सफर जारी है...993
14.07.2022
गुरुजी तो गुरुजी हैं.....
वे गुरुजी हैं, उनसे ही तो सब सीखा है, अब भी सीखते ही रहते हैं, सीखना चाहो तो सारी ज़िंदगी सीखते रहो। सीखने की कोई उम्र थोड़े ही होती है। पहले अक्षर ज्ञान सीखते हैं, फिर किताब पढ़ना सीखते हैं, प्रश्नों के उत्तर लिखना सीखते हैं, अपने को अभिव्यक्त करना सीखते हैं कि कब कैसे किससे क्या कितना बोलना है, कब चुप रहना है, कब बात को हवा में उड़ाना है, कब छोटी सी बात को इशू बना देना है, कब बडी से बडी बात को दो मिनट में समाप्त कर देना है और कब बात जा बतंगड़ बना देना है। सब सीखा ही तो जाता है और जिन जिन से सीखा जाता है, वे सब गुरु की श्रेणी में रख दिये जातें हैं। स्कूल और महाविद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने तक बार बार गुरू जी बदलते रहे पर कुछ ऐसे दिमाग पर छा गए कि उनकी सीख उनकी बातें आज भी मस्तिष्क में गूंजती रहती हैं। किताबें तो बहुतों ने पढ़ाई पर जो जीवन जीने के दो चार ज़रूरी बातें और सूत्र सिखा गये, वे भुलाए नहीं भूलते।
तो सबसे पहली गुरु तो मां रही जिसने व्यवहार करना सिखाया, कुम्हार की तरह ठोक पीट कर पर अन्दर से हाथ का सहारा दे गढ़ती रही, तब तो खूब कुनमुनाते भुनाभुनाते थे कि जब देखो अंकुश ही लगाती रहती हैं कि ये नहीं करना है वह नहीं करना है, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, इससे उससे बात मत करो, अकेले क्यों गई थीं, बता कर क्यों नहीं गये, जी लगा कर क्यों नहीं बोला जाने क्या क्या उपदेश होते थे जो उस समय तो बिलकुल भी अच्छे नहीं लगते थे पर सच तो यह है कि वही सब बातें ज़िंदगी में बहुत काम आई। पुस्तक पढ़ कर तो कक्षाएं पास कर ली, प्रथम द्वितीय आते अपने को तुम्मन खां समझते रहे पर ज़िंदगी की वास्तविकता से जब सामना हुआ तो पता चला किताबों में सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं लिखे होते, कुछ उत्तर स्वय से खोजने होते हैं, कुछ समय सिखाता है तो कुछ अनुभव। घर परिवार अपने अंदर बहुत से गुरु छिपाए रहते हैं जिन्हें हम गुरु की संज्ञा तो कभी नहीं देते वैसे भी घर की मुर्गी तो दाल बराबर समझी जाती है।
घर परिवार से बाहर निकलते स्कूल वाले गुरुजी हमें बहुत सा सूचना परक ज्ञान देते हैं कुछ को रटना होता है तो कुछ को समझना होता है और कुछ में गहरे उतरना होता है। सब से सीखते ही तो रहते हैं। आकाश धरती पर्वत समुद्र चंदा तारे सूरज हवा पानी यहां तक की पूरी कायनात हमें सिखाती ही तो है । पर्वत कहता शीश उठाकर तुम भी ऊंचे बन जाओ, सागर कहता है लहरा कर मन में गहराई लाओ, समझ रहे हो क्या कहती है उठ उठ गिर गिर तरल तरंग, भर लो भर लो अपने मन में मीठी मीठी मृदुल उमंग, धरती कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार। या जल से पतला कौन है कौन भूमि से भारी कौन अग्नि से तेज है कौन काजल से कारी, जल से पतला ज्ञान है और पाप भूमि से भारी, क्रोध अग्नि से तेज है और कलंक काजर से कारी। तरुवर फल नहिं खात है नदी न संचय नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर। सब सिखा ही तो रहे हैं।
कबीर गुरु की महिमा लिख गए कि गुरु तो गोविंद से भी बडा है क्योंकि गोविंद तक पहुंचने का रास्ता तो वही बताता है इसलिए गुरु की महिमा सात समुद्र की मसि, सब धरती कागद और सारे वन की लकड़ी को लेखनी से भी नहीं लिखी जा सकती। गुरु की महिमा अपरंपार है। गुरु सर्वोपरि है।
आज गुरुपूर्णिमा पर जीवन को आकार देने वाले सभी गुरुओं को सादर नमन। इतने सुधारे बुहारे गए पर अभी भी बहुत बहुत सी कमियों के आगार हैं, आज भी सुधारे जाने की बहुत गुंजायश है, रोज किसी न किसी से कुछ न कुछ सीख ही रहे हैं। कृष्णम वन्दे जगत गुरु में सारे गुरुओं को समाहित करते उन्हें करबद्ध प्रणाम और आप सभी को गुरुपूर्णिम की हार्दिक बधाई, मुनिया पूनो की शुभकामना।