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Tuesday, July 19, 2022

ज्यादा संयम बरतो तो कायर कहलाते हो

 सफर जारी है....954

05.06.2022

धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, मेधा, विद्या, सत्य पालन, अक्रोध धर्म के दस लक्षण जरूर बताये गए हैं पर इन सबकी भी एक सीमा है।धैर्य जब चुक जाए तो आदमी बुरी बिखर जाता है फिर सबकी धैर्य शक्ति और क्षमता अलग अलग होती है।इसलिए धैर्य का एक ही पैरामीटर सबके लिए फिक्स नहीं किया जा सकता।अब कृष्ण तो भगवान थे फिर भी शिशुपाल की सौ गालियों के बाद उन्हें सुदर्शन चक्र चलाना ही पड़ गया फिर हम तो मूढ़ मानव है, हममें इतना धैर्य कहां से होगा, फिर भी सामर्थ्यानुकूल धैर्य बनाये रखते हैं लेकिन कोफ्त तब होती है जब अगला आपके धैर्य को आपकी कमजोरी समझ कायर के विशेषण से नवाज देता है ।क्षमा तो हमेशा बड़े ही करते हैं और छोटे दिनप्रतिदिन उत्पाती होते जाते हैं क्योंकि उन्होंने पढ़ रखा है क्षमा बड़ेन को चाहिए छोटन को उत्पात, कहा रहीम हरि को घट्यो जो भृगु मारी लात।इच्छाओं का दमन भी आवश्यकता से अधिक करना शुरू कर दो तो मन ही मर जाता है फिर किसी बात की इच्छा ही नहीं होती तो जब कभी तो आजादी उन्हें भी मिलनी चाहिए।चोरी ,राम राम राम ,उससे तो बिल्कुल तोबा कर ली है पर व्यवहार में उसका थोड़ा बहुत अंशः स्वतः आ जाता है ।वस्तुओं की चोरी के लिए दण्ड भले ही निर्धारित कर रखा हो कि व्यवहार की चोरी के लिए कोई दण्ड निर्धारित नहीं है, कहो कुछ करो कुछ।  कुछ तो ऐसे जन्मजात चोर हैं कि जब तक सब्जी की ठेल से थोड़ा बहुत धनिया मिर्च, गोलगप्पे वाले से दो चार दोने पानी और नपे दूध के ऊपर थोड़ा सा दूध नहीं डलवा लेते लगता ही नहीं कि खरीददारी की है।

      शौच को बिल्कुल अशौच बना कर रख दिया, शौचाते शर्म लगती है पर फ्रेश होते गर्दन ऊंची हो जाती है। धोने की  जरूरत भी कहां रह गई, ये नेपकिन के पैक के पैक जो शौचालय में रख दिये गए हैं।साबुन के विकल्प भी खोज लिए गए हैं।काहे की शुचिता शेष रही, नहाओ चाहे मत नहाओ, बस टीम टाम कर क्रीम पाउडर की  पोलिश लगा सेंट और डियो छिड़क लिए जाते हैं।कपड़े धोने से बचाब को मोटी मोटी फटी उधड़ी जीन्स पहनना फैशन में शामिल हो गया।पानी की तो इतनी बचत कर ली गई कि भोजन से पहले हाथ धोने के बजाए उसे भी न जाने क्या चुपड़ कर रिप्लेस कर दिया गया।इन्द्रिय निग्रह की बात तो करो ही मत, आंखें अच्छा अच्छा देखने के चक्कर में, कान मधुर सुनने के चक्कर में और जिव्हा सुस्वादु भोजन की लिप्सा में ऐसी बुरी फंसी है कि बस कुछ पूछो ही मत।मेधा का स्थान चतुराई और सा विद्या या विमुक्तये का स्थान अर्थकरी विद्या ने ले लिया है।बस ज्ञानी वही है, समझदार वही है जो चार पांच अंकों की सैलरी पाता हो ,बाकी तो सब भाड़ झोंकते हैं।खूब पढ़े लिखे ढेरों उपाधि पाये इन सेठों धनाढ्यों के आगे पानी भरते हैं।दस बारह वर्ष में मोटी मोटी पुस्तकें पढ़ रात रात भर जग कर  जो  चिकित्सक बनते हैं ,उन्हें किसी अनपढ़ के क्लीनिक और  नर्सिंग होम में अपनी सेवाएं बेचनी होती है, उनसे गवर्न होना होता है, काहे के विद्यावान रह गए वे।सिस्टम ही तो लचर है।

      सत्य की बात करते ऐसे लगता है जैसे किसी दूसरे की सीमा में जा घुसे हों।सब अकबकाई नजरों से ऐसे देखते हैं जैसे बाबले गांव में ऊंट आ गया हो।सत्य बोलना तो दूर उसके नाम और प्रसंग भर से ही उबकाई लेने लगते हैं जैसे दाल में कंकड़ आ गया हो,मुंह का स्वाद खराब हो गया हो।अब कितना संयम रखें, संयम रखते रखते यह हाल हो गया कि अब सामने वाला सत्य को भी झूठ की तराजू पर तौलने लगा।चुप रहो चुप रहो सुनते ऐसे चुपा गए कि अब जुबान ही तालू से चिपक गई है।बस सब एक ही बात कहे जा रहे हैं कि कैसी भी स्थिति परिस्थिति हो ,संयम मत खोना।यहां संयमी होते होते पानी सिर से ऊपर बह गया, लोग कायर,कमजोर की श्रेणी में रखने लगे और तुम अभी तक संयम संयम की रट लगाए हुए हो।आखिर कब तक जज्ब करें अपने को।बहुत हुआ ,बस अब अक्रोध की सीमा पार हो गई, अब तो फूटेंगे ही।काहे को निर्बल और कायर कहलाये, चूड़ियां थोड़े ही पहन रखी है पर सच तो यही है कि हम चूड़ियों बिछुए के साथ ही भरे पूरे हैं।चूड़ियों के शील को नहीं उतार फैंका जा सकता, वे शील और सौभाग्य की सूचक हैं ,डरपोक और कायर होने की नहीं।तो इन्हीं चूड़ी बिछुओं के साथ दो दो हाथ करने की तैयारी है।अब मुहावरे तो तुम बदलो अपने कि हाथों में चूड़ियां पहनने से कोई कमजोर नहीं होता बल्कि दूसरे की शक्ति भी उसमें आ जाती है।तो अब ज्यादा संयमी होने के बंधन उठा कर रख दिये गए, इन्हें तिलांजलि दे दी गई अब दो दो हाथ करने की तैयारी पूरी है।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...