सफर जारी है ...994
15.07.2022
आखिर वे ऐसे क्यों हैं .......
वे हमेशा भुनकते तुनकते ही क्यों रहते हैं, हमेशा क्रोध में क्यों तने रहते हैं, दूसरों में दोष और कमियां ही क्यों खोजते रहते हैं, उन्हें कोई भी पसंद क्यों नहीं आता, उन्हें नुक्ता चीनी की आदत क्यों पड़ गई है, क्या आपने कभी इन छोटी छोटी और महत्वपूर्ण बातों पर विचार किया है, या इसे भी यह कह कर हवा में उड़ा दिया गया कि हम पे टैम नहीं है। अरे जो बातें आपके जीवन को प्रभावित कर रही हों, जिससे आपकी छवि धीरे धीरे धूमिल होती रही हो, आपके दोस्त मित्र सखी सहेली सब दूरी बनाते जा रहे हों,कटते जा रहे हों, परिवार में कलह के बादल घिरते जा रहे हों, बच्चे अलग रूठे मटके से रहते हों, दांपत्य जीवन में जहर घुलता जा रहा हो तो भी इगोइस्ट बने रहना कहां तक उचित है। अरे जब बोलने बतराने सुख दुख बांटने के लिए पास कानी चिरैया भी पास नहीं होगी तब सोचना शुरू किया भी तो भला हाथ क्या आयेगा।
ऐसी शिक्षा दीक्षा पाने का भला क्या फ़ायदा हुआ कि जीवन ही सुख पूर्वक नहीं बीत पाया। कोई न कोई इल्लत लगी ही रही। ज़िंदगी भर इतने मोटे मोटे ग्रंथ पढ़ते रहे, मार किताब इकठ्ठी कर कर के लाइब्रेरी बना डाली, उपाधि के निरे बंडल के बंडल ले लिए, इतने इतने पुरस्कार और शील्ड जीत कर ड्राइंग रूम में सजा लिये पर व्यवहार करना नहीं सीख पाए, आचरण में कोई बदलाब नहीं आया।शक्ल सूरत से हीरो पर अकल में वही जीरो के जीरो बने रहें। अरे भाई मेरे, मंहगे कपडे पहन कर इतरा भले ही लो पर उससे तमीज थोड़े ही आ जाती है। सुंदर दिखने के लिए भले ही से खूब मंहगी क्रीम चेहरे पर पोत लो पर आचरण में तो मोटी और काली भैंस ही बने रहते हो। कोई कुछ पूछे तो चिल्ला चिल्ला कर क्यों बोलते हो, अगला न तो बहरा है और न ही उसे कम सुनाई देता है। क्या फ़ायदा हुआ इतनी इतनी पढ़ाई का भला जब सम्बन्धों को ही ढंग से नहीं संभाल पाये। प्राथमिक कक्षा से ही बड़े बड़े सूक्ति और सुवाक्य सिखाए गए, खुशकत और इमला लिखाई गई, ऐसी मोटी मोटी कापी भर के कापी भर भर के प्रश्नों के उत्तर लिखे, रात दिन बैठ कर घोटा लगाया खूब रेज के नंबर भी पा लिये पर जैसे ही अगली कक्षा में पहुंचे पिछला सब सफाचट हो गया। नाम के आगे पदनाम लग गया, उपाधि जुड़ गई लेकिन दिमाग सफाचट ही बनाए रखा। उसे काहे को कष्ट दें। ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। अब उपयोग में लाते तो कुछ कम हो जाता तो जो जो सिखाया उसे लिख दिया, लिखने के लिए ही तो पढ़ा था कौन व्यवहार में लाना था।
जो भी मेहनत थी, पैसों का व्यय था, डांट मार थी वह उपाधि प्रमाणपत्र के लिए नहीं थीं भाई, वह सब आपके व्यवहार में दिखना ज़रूरी था। विनम्र होना था, मीठा बोलना था, क्रोध को जीतना था, संयम रखना था, अपना ही अपना नहीं देखना था, दूसरे की भी परवाह करनी थी, सब आप जेसे ही तो थे। तो आप उनसे सुपर कैसे हो गए। बात बात पर दूसरे के ऊपर बादलों से बरसते क्यों रहे, जितनी देर सामने वाले को सुनाने के लिए अपने कोषागार से तीखे व्यंग्य बाण निकालते थे, उसके क्षणांश में कहीं अपने अन्दर झांक लेते, ये जो बात बात पर लाल पीले होते रहते हो, सामने वाला तो जब प्रभावित होगा तब होगा पर जहां ये क्रोधाग्नि जलेगी उसकी लपटें तो सबसे पहले आपको ही लपेटे में ले लेंगी,उस स्थान को ही सुन्न काला कर देंगी, व्यवहार तो आपका ही बदलेगा, माथे पर सलवटें आपके पड़ेंगी, आंखें लाल पीली आपकी होंगी, आवाज़ आपकी विकृत होगी तो ये जो बात बात पर दुर्वासा सा रूप धारण कर लेते हो, उस क्रोध को सही समय के लिए बचा कर रखो। शांत रहो, धैर्य रखो, पहले खुद में गंभीरता तो लाओ, खुद को स्थिर तो करो, बात को समझो तो सही। तुम्हारा क्रोध, तुम्हारी खीझ, तुम्हारी तुनक, तुम्हारी हर दूसरे में दोष देखने की प्रवृत्ति, खुद के ईगो को तृप्त करने के लिए दूसरों पर बरसने, जहर उगलने, उसे बात बात पर नीचा दिखाने की सोच तुम्हें सुपर नहीं बनाती बल्कि तुम्हारे खोखले पन को दर्शाती है। दूसरी लकीर को लगातार घिस घिस कर छोटी करने में अपनी शक्ति का अपव्यय क्यों करते हो, इतनी देर में तो उस लकीर के समानांतर उससे बड़ी दूसरी रेख खींच खींच सकते हो, इन सब तू तू मैं मैं में कुछ नहीं रखा है, इनसे उबरो। बदलना ही है तो सबसे पहले खुद को बदलो, खुद सुधरो, अपने को डिस्टर्ब मत करो। जो खुद सुलझा हुआ होता है, वह बेबात की बातों में नहीं उलझता। अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करता। अपने को सहेजता है, आगे बढ़ता है, सबसे मिलता जुलता है। संबंधों को कुशलता से निबाह ले जाता है, जोडक योजक बनता है।
तो वे अपना आत्म विश्लेषण कर लें, खुद में झांक लें, अपने अवगुणों को त्याग दे, मनुष्य हैं तो मनुष्य बन के रहें।