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Tuesday, September 6, 2022

जो बीत गई सो बात गई,

 सफ़र जारी है .......1049

08.09.2022

जो बीत गई सो बात गई.....

जो बीता, वह कल में बदल जाता है और सब बीते हुए को भुलाने की बात कहने लगते हैं। सब आज में जीने की सीख देते हैं। जो हुआ सो हुआ, उसे भूल जाओ और आगे की सोचो। बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय। जो जो घटा वह अच्छा था या बुरा, आपका एक अनुभव था और अनुभवों से हमेशा सीख ली जाती है, उसे भूला भुलाया नहीं जाता। अतीत की जमीन पर खडे होकर ही तो वर्तमान की नींव रखी जाती है, उसे खुशहाल बनाया जाता है, उससे सीख ली जाती है। यदि ऐसा नहीं होता तो सफलता का परचम लहरा चुके व्यक्तियों से उनके जीवन की मुख्य बातों को रेखांकित करने के लिए क्यों कहा जाता, उनके जीवन वृत्त पाठ्यक्रम में क्यों लगाए जाते, वे अपने जीवन के उन प्रसंगों को क्यों हाईलाइट करते जिनके चलते उनके जीवन में जबरदस्त बदलाब आया। बीत गईं सो बात गई के आधार पर तो उन्हें विगत की परेशानियों कठिनाइयों को जड़ से भुला देना चाहिए था और आज की सफलता पर इठलाना चाहिए था।

पर ऐसा नहीं है। अमीर बनता व्यक्ति अपनी गरीबी के दिनों को भूलता भुलाता नहीं, वह उसे अनमोल याद की तरह साथ लिए चलता है कि जब दंभ अहंकार पैदा होने लगे तो उस पोटरी को खोल थोडा झांक सके कि न न मुझे ऐसा बिलकुल नहीं करना है। मैंने दुख झेला है, हिम्मत नहीं हारी, तब जाकर यहां तक पहुंच पाया हूं। जो भी घटा अच्छा या बुरा, उसके अनुभव आपकी थाती हैं। उनसे सीख लेना जरुरी है। जब हम अपने जीवन की सुखद घटनाओं को प्रसंगों को बराबर याद करते हैं, सुभद्रा कुमारी को अपना बचपन इतना प्रिय है कि बार बार उसे याद करती कह उठती है, लिख कर ही संजो देती है बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी, गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी। जेम्स बाट जितना भी बड़ा भाप का इंजन क्यों न बना लें पर बचपन की वह घटना नहीं भूलते जब वे रसोई में बैठे आग पर चढ़े पतीले में खौलते पानी के ढक्कन पर दवाब रखकर भाप की शक्ति समझ पाते हैं। लिंकन राष्ट्रपति बनने के बाद भी कहां भूल पाते हैं कि उनका जीवन कितनी गरीबी में बीता है, न्यूटन गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज प्रयोगशाला में नहीं, बगीचे में आम को पेड़ से नीचे गिरता देख कर ही करते हैं जो मर्जी हवा में उछालो, वह आता जमीन पर ही है।

साहित्यकार लिखते रहे मेरो मन अनत कहां सुख पावे, जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आबे। सुख तो अपनी माटी अपनी जमीन से जुड़े रहने में ही है, मर्जी चाहे जहां जितना मर्जी घूम आओ, पर लौटना तो अपनी भूमि पर ही होता है। अपनी जमीन भला किसे प्यारी नहीं होती, कहते हो न ऐसे लगा कि जैसे पैरों तले जमीन खिसक रही हो। इस जमीन पर पांव जमाए रखना बहुत जरुरी है। अपनी माटी अपनी जमीन का कोई सानी नहीं। जिसकी रज में लोट लोट कर बड़े होते हैं, घुटनों के बल सरक सरक कर खडे होते हैं, उसे भला कैसे भुलाया जा सकता है। हिमवासी विषुवत रेखा का वासी भी मर्जी जितनी कठिनाइयों में क्यों न रहे, रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर। तो कहां भूले जाते हैं अपने कच्चे पक्के घर, आंगन, दालान, बचपन की पाठशालाएं, अध्यापको की मार डांट, वह बेंच पर खड़ा कर देना, मुर्गा बना देना, पतली सी डंडी से सूंत देना, हथेली पर फुटे से चटाचट मारना, कक्षा से बाहर खड़ा कर देना, सब का सब याद है, उसी के कारण तो जो आज है बन पाए। अध्यापक ही क्यों, माता पिता से लेकर नाते रिश्तेदार, अड़ोसी पड़ोसी, समाज सब तो अपने अपने तरीके से ठोक ठोक कर हमारे खोट निकालने में लगे रहे, कह सुन कर हमें गढ़ते रहे तब तो आज इस रुप में हो पाए। और तुम रोज रोज कहते हो जो बीत गया उसे भूल जाओ, बस आज में रहो। ये आज आज ही थोड़े पैदा हो गया, इसमें कितना कितना कल समाया है तुम क्या जानो बाबू। तुम्हें तो फूली फूली चरने की लगी हुई है। अरे हर बात के पीछे बातों का लंबा इतिहास होता है, उसे जाने रहना होता है।

हां यह सच है कि अतीत को कंधे पर शव की तरह लादे रहे नहीं चला जा सकता, पर उससे सीख तो ली जा सकती है, उसको नींव में रखकर ऊपर की मंजिल तैयार की जा सकती है। हर का एक अतीत होता है उसे अच्छा बुरा नहीं कहा सकता, कुछ कटु यादें हैं तो उनसे सीख ली जाती है और जो सुखद प्रसंग हैं तो उन्हें गाहे बगाहे दोहरा लिया जाता है जिससे उसकी याद धूमिल न पड़ जाए। याद करना बुरी बात होती तो पढ़ते पढ़ाते  प्रश्नों के उत्तर याद करने के लिए क्यों कहा जाता। तो हमसे तो नहीं भूलता न अच्छा न बुरा, न सुखद न दुखद, न सुविधाएं न कष्ट। जीवन तो इस सबसे मिल कर ही बनता है मीठा मीठा हम खाएं तो आक थू जैसा कड़वा क्या कोई और खाएगा। सुख हमें बांधता है तो दुख भी खूब पाठ पढ़ाता है दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात। तो बीत गई सो बात गई ही सच नहीं है, इन्हीं बीते लम्हों के साथ बहुत कुछ जुड़ा होता है जो भूल कर भी नहीं भुलाया जा सकता। और उसे भूले भी क्यों कर, उससे सीख ले आगे बढ़ जाएं, उससे चिपके न रहें, बस बात इतनी सी है।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...