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Thursday, April 28, 2022

स्वर्गादपि गरीयसी

 सफर जारी है......854

22.02.2022

जननी जन्मभूमि के आगे सब बौना है।माता जो अपनी कोख में बालक का नौ माह सर्जन करती है, माता जिससे नाल का सम्बंध जुड़ा होता है, जो हमें पालती है पोसती है, खुद गीले में सो बच्चे को सूखे में सुलाती है,चलना बोलना सिखाती है, पढ़ाती लिखाती है, अपने स्नेह से सराबोर रखती है।खुद भले ही भूखी रहे पर बच्चे के पेट भरने का जुगाड़ जरूर कर लेती है।कितनी कितनी बार देखा कि कटोरदान में मां के लिए रोटी भले ही न बची हो पर बालकों को रच पच कर खिलाती है और खुद उपवास का बहाना बना कर भूखी रह जाती है पर बच्चों को कभी नहीं जताती।बस सारे दिन काम में जुती रहती है कि बालक चार अक्षर पढ़ लिख जाएं, अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, ब्याह हो जाये,अपनी घर गृहस्थी में मगन हो जाएं। इसके अतिरिक्त उसे कुछ और नहीं चाहिए, इतने में ही भरपाई हो जाती है उसकी।वह बच्चे की पहली शिक्षिका ऐसे ही थोड़े कही गई।

मां का एक रूप थोड़े ही है।गौ ,गायत्री और गंगा भी मैया ही हैं।

अपनी जन्मभूमि सब को प्रिय होती है। हो भी क्यों न, आखिर उसका नाल जो गड़ा होता है वहां।जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है, इसके वास्ते ये तन ये मन और प्राण हैं।याद तो होंगी ये पंक्तियाँ विषुवत रेखा का वासी जो जी लेता नित हांफ हांफ कर रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर, हिम वासी जो हिम में तम में जीता है नित कांप कांप कर कर देता है प्राण न्योछावर वह भी अपनी मातृभूमि पर।कहीं चले जाएं पर लौटते तो अपने देश ही हैं।भारतमाता का गौरव हमें खींच ही लाता है।जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आबे, मेरो मन कहां अनत सुख पाबे।रसखान तो ब्रज भूमि के सौंदर्य पर तीनों लोक को बार देते हैं बस एक ही कामना है मानुस हो तो वही रसखानि बसों ब्रज गोकुल गांव की ग्वारिन,पाहन हो तो वही गिरि को जो कियो छत्र पुरन्दर धारन,जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरों नित नंद की धेनु मँझारन, जो खग हो तो बसेरो करो मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन। रसखान तो कौटिक हू कलधौत के धाम करीन के कुंजन ऊपर वारो में विश्वास रखते हैं।तो क्या अब मातृ भूमि से प्रेम कम होता जा रहा है।जिसे देखो सब बाहर बास भागे जा रहे हैं।कोई नौकरी की खोज में है तो कोई वहां के रंगीन नजारे देखने को लालायित है।कुछ को तो बाहरी चमक दमक देखने के बाद मातृभूमि से ही विरक्ति हो जाती है, उनका सोच बन जाता है क्या फायदा लौटने से, वहां रखा ही क्या है, कुछ विवशता में तो कुछ स्वेच्छा से वहीं डेरा जमा लेते हैं।फिर वही भूमि रास आ जाती है।उनके लिए मातृभूमि में ऐसा कुछ विशेष नहीं रखा होता जिसके लिए ऐसा सुंदर देश छोड़ कर जाया जाए।प्रसाद लिखते हैं तो भले लिखते रहें अरुन यह मधुमय देश हमारा, जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।अरे कुछ का अपना सुख इतना बड़ा हो जाता है कि देशभक्ति गई तेल लेने।डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वह भारत देश है मेरा गाने सुनने कहने के लिए ही अच्छा लगता है।अब अपनी सुख सुविधा देखें कि इसे ले के बैठे रहें। उनकी तो आंखें चुंधिया जाती है चमाचम सड़के देख कर।इतनी सफाई और व्यवस्था पसन्द हो तो बनी बनाई व्यवस्था में क्यों जा घुसे, पकी पकाई क्यों खा रहे हो।यहां बनाओ ऐसी व्यवस्था।न जी हम क्यों करें वो तो सरकार का काम है।बस हम तो वहां रह लेंगे जहां सारी सुविधाएं हों सम्पन्नता हो।सब अपना ही है, सारी वसुधा कुटुंब वत ही तो है तो फिर जहां मन चाहे वहां रहेंगे।मर्जी कहीं रहो हमें क्या जित तेरे सींग समाए बित कू ही चलो जा।तू जाने तेरो काम जाने।हमाओ तो कहबे को काम है कि अपनो देस अपनो ही होत है, खूब घूम लेओ पर लौट के अपने थान पे ही आ जानो चहिये।जई ते कहो गयो कि जननी जन्मभूमि के आगे स्वर्ग हू फीको लगे भैया।

अब मातृभाषा की बात और कर लें,अपनी बोली अपना देश अपनी माँ और अपना भेष सबको बहुत प्यारा होता है ।होना भी चाहिए ।भजन, भोजन ,भेष और भाषा ही तो व्यक्ति की पहचान है।सारी रचनात्मकता अपनी बोली भासा में ही प्रकट होती है।धारा प्रवाह कहीं अटक नहीं, विचारों की मौलिकता, प्रखर तीखी धारदार अभिव्यक्ति, शब्द अपने से दौड़े चले जाते हैं उन्हें खोजना नहीं पड़ता, लोक बात बात में घुस जाता है, मुहावरे लोकोक्ति सब साथ साथ चलते हैं कुछ खोजना नहीं होता।रोज के से तो प्रसंग हैं।उन्हें कौन रटना पड़ता है, अपनी भाषा की तो बात ही और है।सब समझ आ जाता है।और जैसे ही माध्यम बदला सब बदल जाता है।अब विषय पर ध्यान किसका रहता है सारा समय तो उस गिटर पिटर की भाषा को सीखने में चला जाता है, सोचें कब और लिखें कब।अब रट कर भले ही चेंप दो पर सच में दस वाक्य भी नहीं बनते तो अनुच्छेद ,पृष्ठ और कॉपी भरने की तो बात ही छोड़ दो।जबरदस्ती सी करते रहो और पल्ले कुछ न पड़े तो ऐसी पढाई से भला क्या फायदा। बस तीन म को पकड़े रहो.....माता, मातृ भूमि और मातृ भाषा।तो अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवसपर संकल्प लेते हैं कि हम अपनी माता का सम्मान करेंगे, मातृभूमि को नहीं छोड़ेंगे और अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करेंगे।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...