Showing posts with label हुलसी के तुलसी. Show all posts
Showing posts with label हुलसी के तुलसी. Show all posts

Wednesday, August 17, 2022

हुलसी के तुलसी

 सफर जारी है....1016

05.08.2022

हुलसी के तुलसी......

अमृतलाल नागर जी का मानस का हंस पढते प्रिय रचनाकार तुलसी को जानने की एक नई दृष्टि मिली जो इनकी जीवनी पढ़ते और परीक्षा के लिए रटते से भिन्न थी। कोई कालजयी रचनाकार कैसे बना, इसे जानने पहचानने के लिए उसकी बचपन से प्रारंभ हुई जीवन यात्रा के संदर्भ तलाशना बहुत जरुरी है।

 अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्मे बालक की माता जन्म देते ही चल बसी , पिता आत्माराम को ज्योतिषियों ने समझा दिया था कि यह शिशु परिवार पर भारी है तो घर की दासी उसे लेकर चली गई। उसी ने पालन पोषण किया। जो बालक जन्मते ही मां के प्यार दुलार से वंचित हो गया हो, जिसके सिर पर माता पिता का स्नेहिल छांव न हो, जिसे एक दासी अपने पूरे ममत्व से पाल रही हो, वह सबसे अलग तो वैसे ही हो जाता है। उसे जीवन जीने के लिए अतिरिक्त शक्ति परम पिता सौंप देते हैं, उसे नरहरी गुरू की अहेतुकी कृपा मिलती है, वह समाज का पथ प्रदर्शक बन जाता है, समाज को ऐसा पाथेय दे जाता है कि कई कई पीढ़ियां उससे लाभान्वित होती है , वे अविस्मरणीय हो जाते हैं। आज श्रावण शुक्ला सप्तमी को उनकी जयंती है, उन्हें शत शत प्रणाम।

 घर में रामचरित मानस का पाठ फिर चाहे दसेक चौपाई ही क्यों न हो, जरुरी था। नहा धो कर पहले पूजा पाठ बाद में पेट पूजा की आदत डाल दी गई थी। नवरात्रि में नवाह्न परायण आवश्यक रूप से होता और विशेष दिनों में  सुंदर काण्ड। जरा सा डर लगने पर हम बच्चे जय हनुमान ज्ञान गुण सागर की पंक्तियां दोहराने लगते। मानस के हंस पढ़ते पता चला हमें ही नहीं, तुलसी भी को डर लगता था। वे हनुमान चालीसा रच सकते थे, हनुमान बाहुक लिख सकते थे और हम सबको भय पीड़ा से मुक्त करने के सूत्र भी दे सकते थे। रामचरित मानस का अखंड पाठ आस पड़ोस में हो रहा हो तो वहां हम अपनी हाजिरी लगाने पहुंच जाते। उन दिनों माइक पर बोलने का बड़ा चाव था। दोहे चौपाई और संपुट को कंठस्थ करने की होड़ लगती। तब तक रामचरित मानस को भी रामायण ही कहते थे। ये तो बाद में पता चला कि रामायण वाल्मीकि ने लिखी थी।

    एम ए में एक प्रश्न पत्र निबंध का था, परीक्षा में मेरे प्रिय रचनाकार तुलसी पर निबंध लिखते रामचरित मानस के संदर्भों के उल्लेख से ही उत्तर पुस्तिका भर गई। दरअसल तब जो पढा जाता था उसका अर्थ समझने की परंपरा भी थी, मुख से मात्र दोहे और चौपाई ही उच्चरित नहीं होते थे। तुलसी की विनय पत्रिका पढ़ते उसके भजन गुनगुनाते तुलसी को जानने समझने का विशेष अवसर मिला। अब लो नसानी अब न नसैहो, राम कृपा भव निशा सिरानी जागे फिर न डसैहो। राम रट राम रट राम रट बाबरे जैसे कितने कितने भजन हैं जो आपको भक्ति के सागर में डुबो देते हैं। तुलसी जनमानस के प्रिय कवि हैं। उनकी रचनाएं जनमानस की जुबान पर चढ़ी हुई हैं। मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवऊ सुदशरथ अजर बिहारी के रचयिता तुलसी को सादर नमन। उनकी रचनाएं हमें आत्मिक बल देती है। एक भरोसे एक बल एक आस विश्वास, स्वाति सलिल रघुनाथ जल चातक तुलसीदास।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...