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Wednesday, August 17, 2022

हम अनिकेतन

 सफर जारी है....1021

10.08.2022

हम अनिकेतन ........

सभी प्राणियों के लिए घर/ आवास/निकेतन/भवन/मकान मूल आवश्यकता है फिर चाहे वह कच्चा हो पक्का हो, मकान हो, कोठी हो, एक कमरे का हो, चार पांच कमरे का हो, झोंपड़ी हो या महल, टू और थ्री बीएचके का फ्लैट हो, आलीशान बंगला हो जिसमें ड्राइंग, डायनिग, बेड रूम, किचन ,वाशरूम, लाइब्रेरी, मंदिर, बच्चों और बड़ों केअलग अलग कमरे, सर्वेन्ट क्वार्टर, गैराज, कोर्टयार्ड, लॉबी, गार्डन सब की व्यवस्था अलग अलग हो या एक दस बाय दस के कमरे को ही कई कई टुकड़ों में बांट कर सारी व्यवस्था कर ली जाए।सिर छुपाने को छत तो सबको चाहिए ही। बनजारों की बात अलग है। वे तो रमते जोगी है। उन्हें गर्व है अपने जीवन पर तभी कहते हैं कौन कह रहा बंजारों सा ये जीवन बेकार है, मैं सबका हूं सब मेरे हैं सबसे मुझको प्यार है। वे तो चांद और तारों से सजे आसमान को छत मान लेते हैं, दसों दिशाओ को दीवार ,सारी धरती उनका आंगन है और पूरब पश्चिम ही प्रवेश और निकास द्वार हैं, वे पूरे जगत के हैं इसलिए उनकी जिम्मेवारी भी बहुत बड़ी है , उनके परिवार में कोई चार पांच सदस्य थोड़े ही हैं, वे तो वसुधा ही कुटुम्ब के समर्थक हैं। उनके पास जो भी है  मधुकरी या सितार,सबके लिए है। वे सबके हैं और सब उनके इसलिए जंगल नदिया पर्वत झरने उनको पुकारते हैं। इतना ही नहीं, कुंज कुंज बैठी खामोशी भी उनको निहारती है । उनके व्यवहारियो मे लंबी सूनी सडके दर्ज हैं। इनसे ही उनका प्रगाढ़ परिचय है। दिन भर इन्हें ही नापते हैं। हर दिशा  में इनकी ही पगध्वनी का वंदनवार सजा हुआ है। इतना सौभाग्यशाली जो है तब भला कौन कहेगा कि बंजारों सा  जीवन बेकार है। उन जैसा जीवन तो सबका हो जिसका सूत्र वाक्य ही है मैं सबका हूं सब मेरे हैं सबसे मुझको प्यार है। इस कविता को पढ़ते बार बार यही भाव जगता रहा कि हम से अच्छे तो बंजारे हैं जो पूरे जगत  से जुड़े रहते हैं, सबका ध्यान रखते हैं। यहां तो  घर के चार सद्स्यों को जोड़े रखने में ही सांस फूल जाती है, खूब फांय फांय होती है, मार चकल्लस होती है और एक ये हैं कि पूरी दुनियां को मधुकरी और सितार के ब्याज से जोड़े रहते है।

         अभी तो इस कविता के प्रभाव से ही नहीं उबरे थे कि बाल कृष्ण शर्मा नवीन की कविता हम अनिकेतन हाथ लग गईं। एक सांस में ही पूरी कविता पढ़ ली गईं। हम दुनिया वाले तो घर मकान की चिन्ता में उलझे रहते हैं कि ये कैसे होगा, वो कैसे होगा और ये अनिकेतन कितने निश्चिंत है। जब से पढ़ी है कविता, बार बार एक ही सोच हावी है कि हम मानुष घर मकान जमीन  के प्रति इतने आग्रही क्यों हैं? जितना ईश्वर ने दिया, वह तो समेटा नहीं जा रहा। दूसरों की थाली पर दृष्टि गड़ाए क्यों बैठे है। हमसे भले तो रमते जोगी हैं।हम तो रमते राम हमारा क्या घर क्या दर क्या है वेतन, हम अनिकेतन । हम तो अनिकेतन ही भले। सब से मुक्त, सबके हैं भी और किसी के भी नहीं हैं। रमते राम को भला चाहिए भी क्या, जहां चाहे डेरा जमा लें, चार टिक्कड़ ही चाहिए न, उसकी व्यवस्था भी हो ही जाती है। सारी धरती उनका आंगन है तो जहां मरजी पसर जाओ। अब तक इतनी यों ही काटी, अब क्या सीखें नई परिपाटी , कौन बनाएं आज घरौंदा हाथों चुन चुन कंकड़ माटी ,ठाठ फकीराना है अपना बाघम्बर सोहे अपने तन। हम अनिकेतन।

तो बिना घर के ही भले हैं हम। हम जो भटके अब तक दर दर अब क्या खाक बनाएंगे घर, हमने देखा सदन बने हैं लोगों का अपनापन लेकर, हम क्यों सने ईंट गारे में हम क्यों बने व्यर्थ में बेमन, हम अनिकेतन। अब जो घर नहीं बना पाते ,उन्हें दर दर तो भटकना पड़ता है । वे तो अनिकेतन हैं सो ठहरे अगर किसी के दर पर कुछ शर्माकर कुछ सकुचाकर, तो दरबान कह उठा बाबा आगे जा देखो अगला घर ,हम रमता बनकर बिचरे पर हमें भिक्षु समझे जग के जन, हम अनिकेतन। समाज भिक्षु समझता है तो समझता रहें, हमें भला क्या परवाह।कोई घर बसाए तो दिक्कत ,उससे चिपक हो जाती है और जो बंजारे और रमते जोगी बन कर रहें तो अनिकेतन का ठप्पा लग जाता है। अब ये व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह घर तो बनाए, नीड का निर्माण फिर फिर करे लेकिन स्वयं को उससे कमल वत रखे। अपनों के लिए  घर बना देना एक बात है और उसका आनंद लेना दूसरी। तो जो आनंद अनिकेतन बने रहने में हैं, रमते जोगी और बंजारे की वृत्ति में है, वह आलीशान बंगले और दस मंजिले मकान में भी नही है।आवश्यकताएं कम से कम हों और वृत्ति बंजारों सी हो तो अनिकेतन बने रहने में ही अधिक भलाई है। तो हम तो अनिकेतन ही भले, सब जगह हैं तो किसी निश्चित पते की भी जरूरत नहीं। बस महादेवी को दोहरा लेते हैं परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली।

इत्ते उलायती हू मत बनो

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