सफर जारी है....1015
04.08.2022
जो बोले सो कुंडा खोले.....
प्राथमिक कक्षा में हिंदी की पुस्तक में एक कविता थी जिसका लब्बोलुआब यह था कि बिल्ली के दबे पांव चुपचाप आने से चूहों को कुछ पता नहीं चलता और वे बिल्ली का भोजन बन जाते हैं। इस पर चूहों की सभा बैठती है, बुजुर्ग चूहा सभी चूहों से सुझाव मांगता है । एक उत्साही चूहा बिल्ली के गले में घंटी बांधने का प्रस्ताव देता है। सभी ताली बजाकर इसका समर्थन करते हैं लेकिन जैसे ही बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा पूछा जाता है, सभी चूहे एक एक कर दुम दबा कर भाग जाते हैं। सच भी है सुझाव देना एक बात है और उस सुझाव को अमल करने के लिए अपने को प्रस्तुत करना, उसे क्रियान्वित करना और अभिव्यक्ति के सारे खतरों को उठाते हुए पहले से तैयार गढ़ मठ को तोड़ नए प्रतिमान स्थापित करना बिलकुल दूसरी। हालांकि इतिहास वही रच पाते हैं जो इनिशियेटिव लेने का साहस रख पाते हैं और केवल आगे ही नहीं आते, प्रस्ताव और सुझाव ही प्रस्तुत नहीं करते बल्कि उसे अमली जामा पहनाना भी जानते हैं। वे कहते ही नहीं, उसे करते भी हैं।
अब करने का अर्थ सारी पोटली सारा वजन स्वयं के मूड पर लादना ही नहीं होता, उसकी योजना बना सहयोगियों के साथ मिल बांटना भी होता है। ये तो सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर समुद्र मंथन के समय छोटी और कमजोर सी गिलहरी के द्वारा बार बार समुद तट की बालू में लेटकर और फिर जल में जा उस बालू को वहां छोड़ते जैसे कार्य से प्रेरणा तो ली जा सकती है। किसी के पूछने पर गिलहरी द्वारा दिया गया उत्तर भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि जब जब समुद्र मंथन का संदर्भ आएगा कम से कम मुझे कामचोर की श्रेणी में तो नहीं रखा जायेगा। और हुआ भी यही गिलहरी के शरीर पर तीन रेखाएं राम के दुलार के चिह्न के रूप में सदा सदा के लिए अंकित हो गई। ऐसे ही दूसरा संदर्भ एक चिड़िया का है जो आग लगने पर अपनी छोटी सी चोंच से लगातार पानी लगा लगा कर आग बुझाने का प्रयास करती है और उसे देखकर उत्साहित अन्य लोग भी बाल्टी भर भर कर पानी डालते हैं। अंतत आग बुझ जाती है। कौआ चिड़िया से पूछता है जब तुझे पता था कि तेरी प्रयासों से आग बुझने वाली नहीं तो भी तूने कोशिश क्यों नहीं छोड़ी, चिड़िया का जबाब याद रखने योग्य है जब जब इस घटना का जिक्र होगा मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बुझाने वालों में लिया जाएगा।
तो जो सत्कार्य में प्राणपण से लग जाते हैं, अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं, कार्य से बचने के बहाने नहीं तलाशते, वे गौरवशाली कहे जाते हैं। आप किसी भी कार्यक्षेत्र और जीवन के किसी भी अनुशासन में क्यों न हों, अपने कार्य को पूरी निष्ठा और लगन से कर सकते हैं। छोटे छोटे निजी स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोचिए तो सही, किसी का भला कीजिए तो सही, सच मानिए आप कभी भी घाटे में नहीं रहेंगे। गुरू नानक का सच्चा सौदा तो याद होगा ही और उनका ये संदेश भी भूले नहीं होंगे कि अच्छे लोगों को सब जगह बिखरना और दुष्ट लोगों को एक सीमित जगह में सिमट जाना चाहिए। दुष्टों के साथ कुतर्क और बहस में अपना कीमती समय जाया कीजिए। न तो उनसे राग रखें न द्वेष पालें न उपेक्षा करें न लाड लडाबें, बस उदासीन हो जाएं। जिस भी क्षेत्र में उनकी प्रतिभा हो, क्षमता हो, योग्यता हो वैसा ही दायित्व प्रभार दे दें, खाली छोड़ना तो अपने लिए मुसीबत मोल लेना है। जानते हो न खाली दिमाग शैतान का घर है, खेत में यदि कुछ भी बोआ न जाए तो खर पतवार स्वत उग आती है।
कहना और करना एक हो जाएं, कथनी कहनी का अन्तर मिट जाबे, आदर्श यथार्थ का भेद न रहे तो सोचो दुनियां कितनी सुखद होगी। सब अपने से लगने लगे, कोई किसी से घृणा न करे, किसी के प्रति राग द्वेष न रखें, सब आपस में स्नेह सौहार्द से मिल कर र, तो वसुधा कुटुम्ब न हो जाए हें पर ये सब तो केवल विचारों में अच्छा लगता है, बहुत हुआ तो किताब में लिख दिया जाएगा, पाठ्यक्रम में लगा दिया जाएगा, उसे पढ़ पढा कर परीक्षा में लिख दिया जाएगा, झोली भर अंक ले लिए जाएंगे, चार पांच अंकों की सेलरी मिल जाएगी पर ये सब व्यवहार का अंग तो फिर भी नहीं बन सकेगा। तो कहना आसान है और जो आगे बढ़कर इस सबको कहेगा उससे ही करने की आशा जोड़ ली जाएगी। तो कहो भी तभी जब करने की हिम्मत हो। अच्छी अच्छी बात कर लेना, सुवाक्य, सूक्तियों का संचयन और प्रस्तुति एक बीबीबात है और उसका दशांश भी व्यवहार में ले आना दूसरी। तो जो बोलो सोच समझ के बोलो। जो बोलेगा उससे ही कुंडा खोलने की उम्मीद लग जाएगी।