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Wednesday, August 17, 2022

जो बोले सो कुंडा खोले

 सफर जारी है....1015

04.08.2022

जो बोले सो कुंडा खोले.....

प्राथमिक कक्षा में हिंदी की पुस्तक में एक कविता थी जिसका लब्बोलुआब यह था कि बिल्ली के दबे पांव चुपचाप आने से चूहों को कुछ पता नहीं चलता और वे बिल्ली का भोजन बन जाते हैं। इस पर  चूहों की सभा बैठती है, बुजुर्ग चूहा सभी चूहों से सुझाव मांगता है । एक उत्साही चूहा बिल्ली के गले में घंटी बांधने का प्रस्ताव देता है। सभी ताली बजाकर इसका समर्थन करते हैं लेकिन जैसे ही बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा पूछा जाता है, सभी चूहे एक एक कर दुम दबा कर भाग जाते हैं। सच भी है सुझाव देना एक बात है और उस सुझाव को अमल करने के लिए अपने को प्रस्तुत करना, उसे क्रियान्वित करना और अभिव्यक्ति के सारे खतरों को उठाते हुए पहले से तैयार गढ़ मठ को तोड़ नए प्रतिमान स्थापित करना बिलकुल दूसरी। हालांकि इतिहास वही रच पाते हैं जो इनिशियेटिव लेने का साहस रख पाते हैं और केवल आगे ही नहीं आते, प्रस्ताव और सुझाव ही प्रस्तुत नहीं करते बल्कि उसे अमली जामा पहनाना भी जानते हैं। वे कहते ही नहीं, उसे करते भी हैं।

     अब करने का अर्थ सारी पोटली सारा वजन स्वयं के मूड पर लादना ही नहीं होता, उसकी योजना बना सहयोगियों के साथ मिल बांटना भी होता है। ये तो सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर समुद्र मंथन के समय छोटी और कमजोर सी गिलहरी के द्वारा बार बार समुद  तट की बालू में लेटकर और फिर जल में जा उस बालू को वहां छोड़ते जैसे कार्य से प्रेरणा तो ली जा सकती है। किसी के पूछने पर गिलहरी द्वारा दिया गया उत्तर भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि जब जब समुद्र मंथन का संदर्भ आएगा कम से कम मुझे कामचोर की श्रेणी में तो नहीं रखा जायेगा। और हुआ भी यही गिलहरी के शरीर पर तीन रेखाएं राम के दुलार के चिह्न के रूप में सदा सदा के लिए अंकित हो गई। ऐसे ही दूसरा संदर्भ एक चिड़िया का है जो आग लगने पर अपनी छोटी सी चोंच से लगातार पानी लगा लगा कर आग बुझाने का प्रयास करती है और उसे देखकर उत्साहित अन्य लोग भी बाल्टी भर भर कर पानी डालते हैं। अंतत आग बुझ जाती है। कौआ चिड़िया से पूछता है जब तुझे पता था कि तेरी प्रयासों से आग बुझने वाली नहीं तो भी तूने कोशिश क्यों नहीं छोड़ी, चिड़िया का जबाब याद रखने योग्य है जब जब इस घटना का जिक्र होगा मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बुझाने वालों में लिया जाएगा।

     तो जो सत्कार्य में प्राणपण से लग जाते हैं, अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं, कार्य से बचने के बहाने नहीं तलाशते, वे गौरवशाली कहे जाते हैं। आप किसी भी कार्यक्षेत्र और जीवन के किसी भी अनुशासन में क्यों न हों,  अपने कार्य को पूरी निष्ठा और लगन से कर सकते हैं। छोटे छोटे निजी स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोचिए तो सही, किसी का भला कीजिए तो सही, सच मानिए आप कभी भी घाटे में नहीं रहेंगे। गुरू नानक का सच्चा सौदा तो याद होगा ही और उनका ये संदेश भी भूले नहीं होंगे कि अच्छे लोगों को सब जगह बिखरना और दुष्ट लोगों को एक सीमित जगह में सिमट जाना चाहिए। दुष्टों के साथ कुतर्क और बहस में अपना कीमती समय जाया कीजिए। न तो उनसे राग रखें न द्वेष पालें न उपेक्षा करें न लाड लडाबें, बस उदासीन हो जाएं। जिस भी क्षेत्र में उनकी प्रतिभा हो, क्षमता हो, योग्यता हो वैसा ही दायित्व प्रभार दे दें, खाली छोड़ना तो अपने लिए मुसीबत मोल लेना है। जानते हो न खाली दिमाग शैतान का घर है, खेत में यदि कुछ भी बोआ न जाए तो खर पतवार स्वत उग आती है।

     कहना और करना एक हो जाएं, कथनी कहनी का अन्तर मिट जाबे, आदर्श यथार्थ का भेद न रहे तो सोचो दुनियां कितनी सुखद होगी। सब अपने से लगने लगे, कोई किसी से घृणा न करे, किसी के प्रति राग द्वेष न रखें, सब आपस में स्नेह सौहार्द से मिल कर र, तो वसुधा कुटुम्ब न हो जाए हें पर ये सब तो केवल विचारों में अच्छा लगता है, बहुत हुआ तो किताब में लिख दिया जाएगा, पाठ्यक्रम में लगा दिया जाएगा, उसे पढ़ पढा कर परीक्षा में लिख दिया जाएगा, झोली भर अंक ले लिए जाएंगे, चार पांच अंकों की सेलरी मिल जाएगी पर ये सब व्यवहार का अंग तो फिर भी नहीं बन सकेगा। तो कहना आसान है और जो आगे बढ़कर इस सबको कहेगा उससे ही करने की आशा जोड़ ली जाएगी। तो कहो भी तभी जब करने की हिम्मत हो। अच्छी अच्छी बात कर लेना, सुवाक्य, सूक्तियों का संचयन और प्रस्तुति एक बीबीबात है और उसका दशांश भी व्यवहार में ले आना दूसरी। तो जो बोलो सोच समझ के बोलो। जो बोलेगा उससे ही कुंडा खोलने की उम्मीद लग जाएगी।

जो बोले सो कुंडा खोले

 सफर जारी है....1015

04.08.2022

जो बोले सो कुंडा खोले.....

प्राथमिक कक्षा में हिंदी की पुस्तक में एक कविता थी जिसका लब्बोलुआब यह था कि बिल्ली के दबे पांव चुपचाप आने से चूहों को कुछ पता नहीं चलता और वे बिल्ली का भोजन बन जाते हैं। इस पर  चूहों की सभा बैठती है, बुजुर्ग चूहा सभी चूहों से सुझाव मांगता है । एक उत्साही चूहा बिल्ली के गले में घंटी बांधने का प्रस्ताव देता है। सभी ताली बजाकर इसका समर्थन करते हैं लेकिन जैसे ही बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा पूछा जाता है, सभी चूहे एक एक कर दुम दबा कर भाग जाते हैं। सच भी है सुझाव देना एक बात है और उस सुझाव को अमल करने के लिए अपने को प्रस्तुत करना, उसे क्रियान्वित करना और अभिव्यक्ति के सारे खतरों को उठाते हुए पहले से तैयार गढ़ मठ को तोड़ नए प्रतिमान स्थापित करना बिलकुल दूसरी। हालांकि इतिहास वही रच पाते हैं जो इनिशियेटिव लेने का साहस रख पाते हैं और केवल आगे ही नहीं आते, प्रस्ताव और सुझाव ही प्रस्तुत नहीं करते बल्कि उसे अमली जामा पहनाना भी जानते हैं। वे कहते ही नहीं, उसे करते भी हैं।

     अब करने का अर्थ सारी पोटली सारा वजन स्वयं के मूड पर लादना ही नहीं होता, उसकी योजना बना सहयोगियों के साथ मिल बांटना भी होता है। ये तो सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर समुद्र मंथन के समय छोटी और कमजोर सी गिलहरी के द्वारा बार बार समुद  तट की बालू में लेटकर और फिर जल में जा उस बालू को वहां छोड़ते जैसे कार्य से प्रेरणा तो ली जा सकती है। किसी के पूछने पर गिलहरी द्वारा दिया गया उत्तर भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि जब जब समुद्र मंथन का संदर्भ आएगा कम से कम मुझे कामचोर की श्रेणी में तो नहीं रखा जायेगा। और हुआ भी यही गिलहरी के शरीर पर तीन रेखाएं राम के दुलार के चिह्न के रूप में सदा सदा के लिए अंकित हो गई। ऐसे ही दूसरा संदर्भ एक चिड़िया का है जो आग लगने पर अपनी छोटी सी चोंच से लगातार पानी लगा लगा कर आग बुझाने का प्रयास करती है और उसे देखकर उत्साहित अन्य लोग भी बाल्टी भर भर कर पानी डालते हैं। अंतत आग बुझ जाती है। कौआ चिड़िया से पूछता है जब तुझे पता था कि तेरी प्रयासों से आग बुझने वाली नहीं तो भी तूने कोशिश क्यों नहीं छोड़ी, चिड़िया का जबाब याद रखने योग्य है जब जब इस घटना का जिक्र होगा मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बुझाने वालों में लिया जाएगा।

     तो जो सत्कार्य में प्राणपण से लग जाते हैं, अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं, कार्य से बचने के बहाने नहीं तलाशते, वे गौरवशाली कहे जाते हैं। आप किसी भी कार्यक्षेत्र और जीवन के किसी भी अनुशासन में क्यों न हों,  अपने कार्य को पूरी निष्ठा और लगन से कर सकते हैं। छोटे छोटे निजी स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोचिए तो सही, किसी का भला कीजिए तो सही, सच मानिए आप कभी भी घाटे में नहीं रहेंगे। गुरू नानक का सच्चा सौदा तो याद होगा ही और उनका ये संदेश भी भूले नहीं होंगे कि अच्छे लोगों को सब जगह बिखरना और दुष्ट लोगों को एक सीमित जगह में सिमट जाना चाहिए। दुष्टों के साथ कुतर्क और बहस में अपना कीमती समय जाया कीजिए। न तो उनसे राग रखें न द्वेष पालें न उपेक्षा करें न लाड लडाबें, बस उदासीन हो जाएं। जिस भी क्षेत्र में उनकी प्रतिभा हो, क्षमता हो, योग्यता हो वैसा ही दायित्व प्रभार दे दें, खाली छोड़ना तो अपने लिए मुसीबत मोल लेना है। जानते हो न खाली दिमाग शैतान का घर है, खेत में यदि कुछ भी बोआ न जाए तो खर पतवार स्वत उग आती है।

     कहना और करना एक हो जाएं, कथनी कहनी का अन्तर मिट जाबे, आदर्श यथार्थ का भेद न रहे तो सोचो दुनियां कितनी सुखद होगी। सब अपने से लगने लगे, कोई किसी से घृणा न करे, किसी के प्रति राग द्वेष न रखें, सब आपस में स्नेह सौहार्द से मिल कर र, तो वसुधा कुटुम्ब न हो जाए हें पर ये सब तो केवल विचारों में अच्छा लगता है, बहुत हुआ तो किताब में लिख दिया जाएगा, पाठ्यक्रम में लगा दिया जाएगा, उसे पढ़ पढा कर परीक्षा में लिख दिया जाएगा, झोली भर अंक ले लिए जाएंगे, चार पांच अंकों की सेलरी मिल जाएगी पर ये सब व्यवहार का अंग तो फिर भी नहीं बन सकेगा। तो कहना आसान है और जो आगे बढ़कर इस सबको कहेगा उससे ही करने की आशा जोड़ ली जाएगी। तो कहो भी तभी जब करने की हिम्मत हो। अच्छी अच्छी बात कर लेना, सुवाक्य, सूक्तियों का संचयन और प्रस्तुति एक बीबीबात है और उसका दशांश भी व्यवहार में ले आना दूसरी। तो जो बोलो सोच समझ के बोलो। जो बोलेगा उससे ही कुंडा खोलने की उम्मीद लग जाएगी।

Wednesday, April 27, 2022

जो बोले सो कुंडा खोले

 सफर जारी है...840

07.02.2022

 सब ने चूहे बिल्ली की कहानी अवश्य सुनी होगी कि बिल्ली से परेशान चूहे ये फैसला तो ले लेते हैं कि यदि बिल्ली के गले में घण्टी बांध दी जाए तो बिल्ली के आने पर टनटन की आवाज सुनकर सब चूहे सतर्क हो जाएंगे और भाग जाएंगे, सुरक्षित जगह छिप जाएंगे जिससे वे बिल्ली के हमले से बच सकेंगे ।बात सबको समझ भी आ गई पर एक बड़ा प्रश्न फिर सामने आ गया कि इस घण्टी को आखिर बांधे कौन, अब बेचारे चूहे तो चूहे हैं और जिन बुजुर्ग चूहे महाशय ने ये सुझाव दिया था वे तो अपनी अवस्था का बहाना कर कोने में छिप गये और छोटे बारे भी दुम दबाकर भाग खड़े हुए।तो समस्या का हल सबको चाहिये पर बताने मात्र से कार्य नहीं चला करता। उसे व्यावहारिक धरातल पर लाया जाना भी जरूरी होता  है।यदि सब उससे बचते रहे तो फिर समाधान खोजने से भी क्या होने वाला है। जानते तो सब है कि बिल्ली के गले में घण्टी बांध जान बचाई जा सकती है पर बांधे कौन।जब आग लगी हो तब मात्र सुझाव देने कि अरे पानी लाओ, इमारत पर डालो, कोई भागकर अंदर आग में फंसे सदस्यो को बाहर निकालो ,ऐसा कहने भर से ,शोर मचाने मात्र से काम नहीं चला करता, आग नहीं बुझ जाती ।किसी को आगे आना पड़ता है ,साहस जुटाना पड़ता है ,बिल्ली के गले में घण्टी बांधने का दुस्साहस करना पड़ता है फिर भले ही बिल्ली पंजे से खूब खोंसा मारे, सारा दूध लुढ़का झपट्टा दर झपट्टा मारती रहे। ये सब उसे करना ही चाहिए , ये उसकी त्वरित प्रतिक्रियाएं होंगी।

 आखिर आपने उसकी डाइट चूहा पर रोक लगाई है, उसकी सुचारू रूप से चलने वाली गतिविधियों पर विराम लगाने की जहमत उठाई है, उसके चक्क मलाई वाले दूध पर रोक लगा दी  है और फिर आप चाहते हैं कि वह रायता भी न फैलाये, आपको खोंसे भी नहीं, दूध भी न लुढ़काये और शांति से बैठी रहे। ये तो वही बात हुई कि ढींगरा मारे और रोबन भी न दे।यानी आप पहले मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालेंगे और फिर ये कोशिश भी करेंगे कि अगला सूमसाम बैठा रहे।ओखली में सिर दिया तो ओखल से डर कैसा।फिर तो झेलो, प्रतिक्रिया तो छोटी मोटी बात है अभी तो आरोप प्रत्यारोप लगाए जाएंगे, खोज खोज कर सबूत इकठ्ठे किये जायेंगे, पूरी कोशिश होगी कि सत्य सामने न आये इसलिए दबाब की परिस्थितियों पैदा की जाएंगी, तनाव और निराशा के गर्त में डालने की कोशिश भरपूर होगी देखना यह है सत्य कितने दबाब झेल पाता है, कितने कुहरे ,बादल और अंधकारों को झेल पाता है, रीढ़ की हड्डी सीधी रख पाता है,सत्य सदा से परेशान होता है पर अडिगता उसे बादलों के बीच से निकाल लाती है, वह घोर अंधेरे को चीर प्रखरता से बाहर भी आता है और अपनी चमक से सबकी आंखें चुंधिया भी देता है पर सत्य की लड़ाई लंबी चला करती है, अर्जुन को दूर ले जाकर अभिमन्यु को सात द्वार के चक्रव्यूह में फांस लिया जाता है और निहत्थे पर महारथी हमला कर उसे मार ही देते है।अभिमन्यु की बलिदान व्यर्थ नहीं जाता और अंततः महाभारत का युद्ध जीत लिया जाता है, सत्य की जय होती है और असत्य को घुटने टेकने पड़ते है।पर जितनी जनहानि होती है उसका क्या।

              तो सत्य जीतता तो अवश्य है फिर भले ही देर सबेर क्यों न हो, लाख क्षडयन्त्र क्यों न रचे जाएं,कुटिल चालें क्यों न चली जाएं, अनचाहे दबाब क्यों न बनाये जाएं,वातावरण में मनहूसियत क्यों न घोल दी जाए ।कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि हो तो सब जाता है, स्थिति से निपट भी लिया जाता है पर सामने कोई नहीँ आना चाहता, आगे कौन पड़े।बस सब पहले आप पहले आप करते हैं अपना समय जस तस पूरा कर लेते हैं ।झेलना तो उसे पड़ता है जो फ्रंट पर आता है, समस्याओं के समाधान चाहता है और अपनी जान जोखिम में डाल देता है, नदी के तेज प्रवाह में छलांग लगा देता है ,तैरना न जानते भी पूरी शक्ति से हाथ पैर मारता है और अक्सर विवर से बाहर भी आ जाता है।ईश्वर उसके सहायक होते हैं।पर बात वही है कि जो बोले सो कुंडा खोले।तो आपके सामने हमेशा दो विकल्प होते हैं जैसा चल रहा है वैसा चलने दें और आपको लगता है गलत है तो दखल दें ,सही करने की कोशिश तो करें।परिणाम आपके हाथ हो न हो पर अपनी सी मेहनत करना तो आपके हाथ है, उसे अवश्य कीजिये, बाकी राम जी पर छोड़ दीजिए।होना तो वही है जो ऊपर वाले को मंजूर हो पर कोई न कोई आगे आने की हिम्मत तो जुटाता ही है और अपनी भूमिका का निर्वाह अवश्य करते हैं,फिर उसकी नैया पार जरूर लगती है।ईश्वर किसी भी रूप में अपनी सहायता जरूर भेजता है।तो राम को भजते रहिये , बोलते रहिये और कुंडा खोलते रहिये।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...