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Sunday, June 16, 2024

क्या मिलिए ऐसे लोगों से

 सफर जारी है....1533

17.06.2024

क्या मिलिए ऐसे लोगों से....

रहते इस दुनिया में हैं तो दुनियादारी तो निभाई जानी जरुरी है.भांति भांति के लोग हैं .परस्पर व्यवहार से ही पता लगता है कि कौन कितने पानी में है.किसके कितने चेहरे हैं,कितने दलबदलू हैं,हां हां सब हो जायेगा कहते कहते कब भितरघात पर उतर आते हैं पता ही नहीं चलता.आस्तीन का सांप होते हैं और आप हैं कि उन्हें पहचान ही नहीं पाते.बस बैठे बैठे सांपों को दूध पिलाते रहते हैं.आप लाख मर्जी दूध पिलाते रहिये पर वे डंसने से बाज नहीं आया करते.क्या करें स्वभाव है उनका और स्वभाव जल्दी ही थोडे छूटता है .अब ऐसों से तो वैर और प्रीति दोनों ही खतरनाक है .काटे चाटे स्वान के दुहुं भांति विपरीत .तो बचे रहिये ऐसों से ,इसी में भलाई है.उदासीन हो जाइये बस.रहिमन ओछे नरन से वैर भली न प्रीत.उन्हें छेडना समझाना ,उपदेश देना आफत मोल लेना है .सीख न दीजे वानरा बया का घर जाये.मालूम चला निकले थे किसी का भला करने और अपना घर ही उजाड बैठे.

      हाईस्कूल इंटर पास करते जो बीजगणित रेखागणित और साइन कोस थीटा सीखा उसका तो पता नहीं ,पर कबीर रहीम सूर तुलसी पंचतंत्र और नीतिकथाएं बहुत काम आई.कभी कभी तो लगता है पैसा कमाने के लिए वह सब पढाई भले जरुरी हो पर जीवन जीने के लिए तो साहित्य ही काम आता है.जीवन के संध्या काल में वापिसी कहानी कैसी स्मृति में उतर आती है.सच.ही ये सब अंक पाने  भर के लिए पढा  भी नहीं जाता.ये जीवन की वह सच्चाई  है जो समय आने पर ही समझ आती है.जिन विषयों को कम महत्वपूर्ण मान कर हल्के फुल्के  ढंग से ले  लिया जाता है ,कम स्कोरिंग स्कोरिंग समझ कर छोड दिया जाता है और सारी की सारी शक्ति अंक बटोरने और उच्च प्रतिशत लाने में लगा दी जाती है उससे बैंक वेलेंस के शून्य भले बढ जाते हों ,घर आधुनिक सुख सविधा संपन्न हो जाते हों पर जीने का सलीका तो कम से कम नहीं ही आता.जीवन भर कमियों का रोना रोते रहते हैं.जो पास है प्राप्य है उस पर कभी दृष्टि जाती नहीं.बस और और का राग अलापते रहते हैं.

औपचारिक शिक्षा लेते कितने कितने महापुरुषों की जीवनी पढी होंगी,पर उनके जीवन से कुछ भी सीख  न लेने की जैसे कसम सी खा रखी थी,बस पढो रटो, परीक्षा की कापी में टीप आओ ,जैसे तैसे पास हो जाओ और सब भूल भुला दो.कक्षा पास तो उस कक्षा की बात बिसरा दो.बस यही सब करते करते पन्द्रह सोलह साल बीत जाते हैं,स्नातक स्नातकोत्तर की उपाधि मिल जाती है.और ऊंची नौकरी करनी हो तो रिसर्च में दोतीन साल और लगा दो.बस जी अब पढाई पूरी हो गई, क्या जिंदगी भर पढते ही रहेंगे.न जी पढ़ाई सढ़ाई तो पूरी हुई. अब पढाई को गुनने का समय है,उसे व्यवहार में लाने का समय है. नौकरी व्यापार करते आप प्राप्त ज्ञान को प्रयोग में ही तो लाते हो.तो बस जिंदगी।  जीते भी नैतिक और सामाजिक   संदर्भों को याद कर लिया करो कि किसके साथ कैसा व्यवहार करना है.जिंदगी को तरीके से जीना आना चाहिये न कि हर समय रोते झींकते  शिकायती स्वर ही बनाए रखो.दुष्टों से फासला बनाए रखिये और सज्जनों से मित्रता कीजिये.उनके साथ उठिये बैठिये,उनसे बातें कीजिये.भाषा की तमीज सीखिये कुशल संप्रेषण के दो चार गुण  सीख लीजिये.उनकी संगत में लाभ ही लाभ है.रुठ जायें तो मना भी लीजिये.रहिमन फिर फिर पोईए टूटे मुक्ताहार. बस ऐसे लोगों से दूरी बनाये रखिये जो गिरगिट सा रंग बदलते हैंऔर अनेक चेहरे रखते हैं.क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छिपी रहे,नकली चेहरा सामने आये,असली चेहरा छिपा रहे.दोहरे चेहरे वाले बडे फितरती होते हैं जनाब.

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...