सफर जारी है....960
11.06.2022
बड़े न बोले बोल
अक्सर हम व्यक्ति को उसकी पढ़ाई लिखाई, उसके पद ओहदे, उसके मान सम्मान, उसकी धनसंपदा से तौलते हैं।उसके गुणों पर हमारी दृष्टि कम ही जाती है।जबकि गिरधर की कुण्डलिया कहती है गुन के गाहक सहस नर बिन गुन लहै न कोय।गुणों को कहना नहीं पड़ता, वह तो आपके व्यवहार, स्वभाव और व्यक्तित्व से स्वयम ही परिलक्षित हो जाते हैं।जो वास्तव में बड़े होते हैं, वे बड़े बड़े काम चुपचाप कर जाते हैं, उसका ढिंढोरा नहीं पीटते।आत्म प्रचार और प्रदर्शन में उनकी रुचि नहीं होती।वे जैसे हैं उसी रूप में उपस्थित हो जाते हैं।छद्म नहीं ओढ़ते।उनकी सादगी, सरलता, तरलता आपको ऐसे बांध लेती है कि बस आप उसके स्नेह के मुरीद हो जाते हैं।
सद्गृहस्थ होना सबसे बड़ा गुण है।वह अपने दायित्वों से दूर नहीं भागता,बल्कि निष्ठा से उनका पालन करता है।स्वयम उपार्जित धन से सभी आश्रितों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।उसकी निष्ठा केवल पारिवारिक सदस्यो तक ही सीमित नहीं हुआ करती, बल्कि अडोस पड़ोस के साथ पशु पक्षी आगन्तुक सभी उसकी पारिवारिक परिधि में आते हैं।वह सभी के लिए स्नेहिल होता है।भोजन को भाव से पकाता है और उसे मिल बांटकर खाता है।गाय ,कुत्ते, पक्षी, भिक्षुक, अभ्यागत का अंश प्रतिदिन निकाला ही जाता है।भोजन और भजन में भाव बहुत प्रभावी है।जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन में भोजन की गुणवत्ता से अधिक प्रभावी भाव है।भोजन जिस भाव से पकाया और परोस कर खिलाया जाता है, खाने में वैसा ही आनन्द आता है।और यदि भोजन प्रभु को अर्पित कर उसे प्रसादी समझ कर ग्रहण किया जाय तो उसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।
जीवन की भाग दौड में सबसे जरूरी भोजन ही उपेक्षित हो रहा है।उसे इतनी भगदड़ में खाया जाता है कि जैसे सारी देरी इसी के कारण हो रही हो।हम सारी ऊर्जा जिस धन के अर्जन में लगा देते हैं, उस ऊर्जा के पुनः संचयन के लिए भोजन बहुत जरूरी है, पौष्टिक भोजन जरूरी है और उसे तरीके से ग्रहण किया जाना भी।आप कितने भी अधिक व्यस्त हों, आपको घरेलू कामकाज निबटाने का समय नहीं मिलता हो, तो उसके लिए आप सहायक की खूब मदद लेते रहिये लेकिन भोजन जिस भाव से आप बनाते और परोस कर खिलाते हो, उस भाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता।क्यों बार बार मां के हाथ के खाने के स्वाद को याद करते हम उसका विकल्प नहीं खोज पाते ,रेस्तरां आपको घर जैसा खाने का प्रलोभन देते हैं जिससे आप उस के प्रति आकर्षित हो खिंचे चले जाते हो।कहां से आता है भोजन में स्वाद, क्या केवल तेल मसाले और मंहगे उत्पाद उसे स्वादिष्ट बना पाते हैं। ये उसके आवश्यक घटक भले ही से हो, पर भोजन में स्वाद तो भाव का प्रधान होता है।और कहीं वह भोजन प्रभु का भोग हो, उसे प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाए तो और सोने में सुहागा।
जीवन में सद्गुणी व्यक्तियों से मिलना आपको बहुत सम्पन्न बना देता है।आप बड़भागी होते हैं जब ऐसे संत स्वभावी लोगों से आप मिल सके, उनके सान्निध्य में कुछ समय बिता सकें, उनकी सकारात्मक ऊर्जा से अपने को चार्ज कर सकें और जीवन जीने के कुछ टिप्स ले सकें।कुछ सीख सकें कि काम शांति और सहजता से ज्यादा आसानी से निपटाये जा सकते हैं, धैर्य बनाये रखना जरूरी होता है, बात को दृढ़ता और विनम्रता से भी रखा जा सकता है।कोई जरूरी नहीं कि आप हमेशा सप्तम स्वर में चिड़चिड़ाहट और कड़वाहट के साथ ही बोलें।उच्च ओहदे के साथ साथ आपके व्यवहार की समरसता, आपका सौहार्द ,आपकी विनम्रता सामने वाले को सहज रखती है।मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरे परिकर में मेरे इष्ट मित्रों में ऐसे व्यक्तित्वों चरित्रों की संख्या अच्छी खासी हैं जिनसे मिलकर मन प्रसन्न हो जाता हैं, मैं स्वयम को ऊर्जस्वित और चार्ज अनुभव करती हूँ।ऐसों से कुछ क्षणों की मुलाकात रास्ते की थकान को उड़नछू कर देती है ।ऐसे सत्पुरुष तो बिना दिए ही बहुत कुछ दे देते हैं और कहीं आपको उनके हाथों प्रसाद पाने का सौभाग्य और मिल जाए तो अपने को बड़भागी मानना तो बनता है।हम आप जब किसी के प्रति बहुत दयार्द्र होते होंगे तो अधिकतम अपनी जेब ढीली कर बाजार से कुछ खरीद लेते होंगे पर अगले को भोजन समय होने पर घर से बना कर लाया भोजन प्रेमभाव से खिलाना तो हम सबके बूते का नहीं ही हुआ करता।ऐसे सज्जनों से मुलाकातें हमें बहुत कुछ सिखाती हैं बशर्ते सीखने का मानस तो हो।बने रहें ये प्रकाश स्तम्भ जिंदगी में, इनके प्रकाश से हम भी दिपपदिपाते रहेंगे।रहीम बहुत याद आते हैं... बड़े बड़ाई न करें बड़े न बोलें बोल, रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल।