सफर जारी है....1002
22.07.2022
ही और भी की महिमा.......
लम्बे समय से अनुभव कर रही हूं कि यदि आप सभा गोष्ठियों में लोगों से मिलते जुलते खुद अपना परिचय देने में संकोची हैं , इस बात में विश्वास रखते है कि अरे अपने विषय में क्या बताना, अगला उचित समझेगा तो आप ही बता देगा और नहीं भी बताएगा तो कौन कद कम हुआ जाता है, रहेगें तो वही न, जो हैं। न कद बदलेगा और न नाम बदलेगा और न काम धाम । तो काहे चिन्ता की जाय। ओढ़ के रजाई खूब खर्राटे मारकर नींद पूरी की जाए। अरे इतना ही होगा न अमुक ही होगा और आप भी की श्रेणी में पहुंच जाएंगे।
ये ही और भी की कहानी भी अजब गजब है एक को सिंहासन पर बिठा देते हैं तो अगले की सत्ता पर खतरा मंडराने की स्थिति आहूत कर देते हैं। सच ही है हाथ आई बाजी भला छोड़ी भी क्यों जाए, फिर मौका मिले न मिले तो आज ही अच्छे से कस के निचोड़ लो। बड़े होना और बड़प्पन बनाए रखना दो अलग अलग बाते हैं। कितनी कितनी बार तो सुना सुनाया होगा बड़े बड़ाई न करें बड़े न बोले बोल, रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल। अब इस नीति पर चलें तो बैठे रहो कम्बल ओढ़ के, कोई पूछने नहीं आ रहा। किसी को कया पड़ी है जो आपकी आरती उतारे, आपके विषय में गूगल पर सर्च करें। अरे अगला ये सब तब करता है जब उसका कोई काम अटका पड़ा हो, आपके बिना निठ ही नहीं रही हो। तो आप पहले ये डिसाइड करो कि आप ही की कोटि में रहना चाहते हो या भी में भी खुश हो। भी कभी मूल नहीं होता, उसकी कोई वव्यक्तिगत सत्ता भी नहीं होती, वह पलोथन जैसा होता है जो है तो ज़रुरी पर उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है। बस साथ में पिछलग्गू सा लगा रहता है और ही हमेशा उसे अपने से एक केटेगरी नीचे ही रखता है। बराबरी पर नहीं रखता।
परिचय देते कहता है आई एम सो एंड सो, अपनी पूरी उपलब्धि विस्तार से बताता है और बाद में एक टैग सा उछाल देता है हां ये भी हैं। अरे तो क्या हम दुम छुल्ले हैं। बताते तो पूरी बात बताओ नहीं तो चुप लगा जाओ। अगले को जरूरत होगी तो बता देगा अपनी जन्म कुंडली नहीं तो मुंह में दही जमा के बैठ जाएगा। पर भी की केटेगरी में तो बिलकुल भी शामिल नहीं होगा। और क्यों हो भला, अरे जैसा भी है जो भी है उसकी अपनी सत्ता है, उसका अपनाआभा मंडल है, उसका अपना व्यक्तित्व है, उसका अपना नाम है काम है छोटा बड़ा जैसा भी हो।
सो बनो तो ही ही बनो, मैं ही हूं,पूरी तरह हूं और जब तक दम में दम है ही ही बने रहेंगे। क्यों बने भी, भी से तो लगता ही ऐसे है जैसे हमारी कोई आवश्यकता ही नहीं थी, हम तो सब्जी के साथ धनिया बन तुल गए या गेहूं के संग बथुए को भी पानी लग गया। न जी न, हमें नाय बननो बथुआ, हम तो गेंहू ही भले।