सफर जारी है.....९८७
०८.०७.२०२२
पढ़े और बड़े लोग.......
हां हां, वे बहुत बड़े हैं, बहुत पढ़े लिखे हैं, जो भी उपाधि होती हैं उन्होने सब ले रखी हैं, एम ए बी ए सब कर रखा है पीएच डी और डी लिट भी कर रखा है, बहुत सारे इनाम और मेडल भी जीत रखे हैं , इनके ड्राइंग रूम में बहुत से प्रशस्ति पत्र , शील्ड भी सजी हुई है। घर में एक विशाल पुस्तकालय है जिसमें दुनिया भर के बड़े बड़े ग्रंथ हैं, कोश हैं, इनसाइकलोपीडिया है, सूक्ति, मुहावरे कोश हैं। उनके यहां बुद्धिजीवियों का हमेशा जमावड़ा लगा रहता है। वे बड़े बड़े कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि और अध्यक्ष होते हैं, उनके गले मालाओं से लदे रहते हैं, ढेरो ऑटोग्राफ देते वे जनसमूह में बहुत प्रशंसनीय और बहुचर्चित हैं।
तो ऐसे पढ़े लिखे महानुभाव से कल भेंट का अवसर मिला, मन बल्लियों उछल रहा था कि आज तो बिल्ली के भाग से छींका फूट गया, हमें भी इतने बड़े और बहुपठित महापुरुष से मिलने का सौभाग्य मिल रहा है, कल को हम भी बहुत ठसके से सब को बता पाएंगे कि हम भी अमुक अमुक से फलाने ढिकाने से मिल चुके हैं, उनके मिलने वालों की सूची में हमारा नाम भी दर्ज होने जा रहा है। खैर हम वहां पहुंचे, बाहर आगंतुकों के लिए बने कक्ष में बिठा दिए गए, लम्बे इंतजार के बाद एक व्यक्ति ने सभी के एपोयंटमेंट चेक किए और सबके विजिटिंग कार्ड मांगें। हम भौंचक्के से देख रहे थे कि एक पढ़े लिखे को दूसरे पढ़े लिखे से मिलने के लिए पूर्व में समय लेना पड़ता है। रही विजिटिंग कार्ड की बात तो वह तो हमने कभी छपवाया ही नहीं था, सोचा था जब साक्षात जा ही रहे हैं तो चेहरा वे देख लेंगे और नाम हम बता देंगे पर नियम तो नियम है, उससे तो छूट मिलने से रही। सो एक पर्ची पर हमने अपना नाम लिख दिया, फिर कहा गया आप कहां से है, क्या करते हैं, अपना पद नाम भी लिख दें। यानी यदि हम कहीं काम नहीं करते, हमारा कोई पद नहीं है तो हम बड़े लोगों से मिलने के योग्य ही नहीं ठहरते। मरता क्या न करता।अंत में उस पर्ची पर प्राथमिक शिक्षक पदनाम लिख दिया और पर्ची उन्हें थमा दी।
सब के नम्बर आ गए, लोग जाएं और घंटे घंटे भर बाद बाहर निकलें। हमारा नंबर जब दोपहर तक नहीं आया तो बड़ी कोफ़्त हुई कि हम क्या ऐसे गए बीते हैं कि सुबह से आये बैठे हैं और अगले ने अभी तक कोई नोटिस ही नहीं लिया, अरे ऐसे काहे के बड़े हैं जो अगले के समय का ध्यान ही नहीं रखे। आखिरी कोशिश और कर लेते हैं सोच कर उनके निजी सचिव से फिर पूछा कि क्या मैं अंदर जा सकता हूं। मैं बस मिलने चला आया, मुझे कोई विशेष काम नहीं है। सचिव के जबाब की प्रतीक्षा किए बिना ही अंदर चले आये। बड़े साहब पढ़े लिखे महानुभाव अपने मित्रों के साथ गपशप में मशगूल थे। हा हा ठी ठी का माहौल था। हमें देखकर चौंके आपका परिचय, वे कुछ बोलें उससे पहले ही हम शुरू हो गए कि मैं प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाता हूं ,बस आप की बहुत चर्चा सुनी तो मिलने चला आया। इतना कहते ही पासे पलट गए, वे क्रोध में आ गए और अपने निजी सचिव को बुलाकर कहने लगे क्या इन्होंने मिलने का समय लिया था, सचिव की घिग्घी बंध गई , वह कुछ कहते,इससे पहले ही हमने कमान संभाल ली। जी, मुझे काफी देर हो गई तो मैं स्वयं चला आया। देखना चाहता था बहुत अधिक पढ़े लिखे कैसे होते हैं, मेरा कद तो बहुत छोटा है आपके सामने। इतनी मोटी मोटी पुस्तकें ग्रंथालय में हैं निश्चित ही आपने इनका अध्ययन अवश्य किया होगा। क्या आपने समय की महत्ता के विषय में नहीं पढ़ा। एक व्यक्ति कोसों दूर से आपके पास केवल मिलने चला आता है और आप उसे पहले से समय न लेने के कारण, विजिटिंग कार्ड न होने के कारण अंदर नहीं बुलाते। उसके समय की कीमत आप नहीं समझेंगे क्योंकि आपने पढ़ा भले ही हो पर आप गुने बिलकुल भी नहीं हैं। पढ़े लिखे और बड़े व्यक्ति की पहली पहचान यह होती है कि वह सामने वाले का सम्मान करता है, उसके समय की कीमत समझता है। वह थोथी बातों में समय नहीं लगाता, व्यवहार कुशल होता है, आगंतुक से धा पा के मिलता है। व्यक्ति किताबें रखने से बडा नहीं होता, आचरण की शुचिता से बडा होता है। माफ कीजिएगा श्रीमान जी, आज मेरा भ्रम टूट गया कि पढ़े लिखे होना ही बड़प्पन की पहचान है। पुस्तक स्थित विद्या यदि समय पर काम नहीं आती तो वह काहे की विद्या। विद्या तो व्यक्ति को विवेकशील बनाती है, विनयी बनाती है, शिष्टाचारी बनाती है, व्यवहार कुशल बनाती है। सबको समान समझने का निर्देश देती है। धिक है आपकी विद्या पर , आपके पढ़े लिखे होने पर।
तो पढ़ो कम गुनो ज्यादा, रहो सादा करो वादा, बनो शिष्टाचारी तो कहलाओगे सदाचारी और व्यवहारी।