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Saturday, August 20, 2022

एक बालक प्यासा था

 सफ़र जारी है....1032

22.08.2022

एक  बालक प्यासा था...

प्यासा कौआ की कहानी तो सबने बचपन में पड़ी ही होगी। सबको याद भी होगी। कविता में कहें तो एक कौआ प्यासा था, घड़े में थोडा पानी था, कौए ने देखे कंकड़, घड़े में डाले कंकड़, पानी आया ऊपर, कौए ने पीया पानी, प्यास की मर गई नानी। कौए की प्यास की नानी तो मर गई यानि उसकी प्यास तो बुझ गई पर इसी तर्ज पर जब एक छोटे बच्चे ने बहुत प्यास लगने और प्यास के मारे गला सूखने पर साफ पानी से लबालब भरी एक साफ सुथरी गगरी /मटकी से एक गिलास पानी क्या पी लिया, तूफान मच गया। गगरी निकली  हेडमास्टर की, जिसे बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं था कि कोई उनकी पानी की गगरी को हाथ भी लगाए और यहां तो गगरी को छूने वाला एक निम्न जाति का था। कहां तो मटकी छूना ही अपराध था और बालक की हिम्मत तो देखो उसने जाति और पद से उच्च मास्टर जी हेड मास्टर जी की मटकी से पानी पी लिया। राम राम राम, बेचारे मास्टरजी जी का तो धर्म ही भ्रष्ट हो गया। उन्हें क्रोध आना स्वाभाविक था। कक्षा में समानता का पाठ पढ़ाना अलग बात है और उसे व्यवहार और आचरण में लाना बिल्कुल दूसरी। 

अब सब तो कैलाश सत्यार्थी नहीं होते न कि दलित महिलाओं द्वारा बनाए गए भोजन को स्वयं खा ले, फिर भले ही उन्हें जाति से बहिष्कृत किया जाय,शुद्धि के लिए हरिद्वार भेजा जाए या एक कमरे में अलग अछूत की तरह रख दिया जाए। कैलाश जी को यह सब स्वीकार नहीं था तो उन्होंने प्रण ले लिया कि तुम मुझे जाति से क्या बहिष्कृत करोगे, मैं ही जाति छोड़ देता हूं और शर्मा सरनेम छोड़ कर सत्यार्थी बन गये। पर हेडमास्टर जी का विजन उतना बडा नहीं था। उन्हें क्रोध आया, बालक को कनपटी पर डेढ़ सीना दो तमाचे लगाएं और अपना हिसाब बराबर कर लिया। बालक वह चोट और अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाया और भगवान को प्यारा हो गया। कुछ दिन तक यह खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, लोगों के ध्यान का विषय बनी, कुछ चर्चाएं गरम हुई और फिर सब समतल हो गया। बात आई गई हो गई।लोग भूलभाल गए।अभी श्रावस्ती में आठ अगस्त को २५०रुपए फीस बकाया जमा न करने पर छात्र को इतनी बुरी तरह पीटा गया कि उसकी जान ही चली गई।

        हम इतने असंवेदनशील क्यों हो गए हैं कि ये घटनाएं हम शिक्षकों को तनिक भी प्रभावित नहीं करती। किस शिक्षा नीति में लिखा है कि अध्यापक और विद्यार्थी के संबंध इतने असहिष्णु होते हैं कि विद्यार्थी को दंडित करने के नाम पर उसकी जान ही ले लें। बालक को सुधारने के साम दाम दण्ड भेद नीति जरूर बताई गई पर केवल दंड की ही प्रधानता नहीं रही और शारीरिक दण्ड को तो बिल्कुल ही प्रतिबंधित कर दिया गया फिर ये सब कैसे घटित हो गया। लिखा तो बहुत कुछ नियमों उपनियमों में भी रहता है पर उस सबके पालन न करने पर कौन सा विधान सक्रिय होता है। दरअसल हम सब इतने आक्रोश में भरे रहते हैं कि जरा मन का सा नहीं हुआ कि मुख से गालियों की बौछार निकलती है, सात पुश्ते कोसी जाती हैं, जो हाथ पड़ गया उसी से धुन और कूट दिया जाता है और कोई अस्त्र शस्त्र न मिले तो थप्पड़ तमाचे घूंसे लात को आजमा लिया जाता है। ये सब उतना सामान्य हो गया है कि पीड़ित इसके लिए कानूनी कार्यवाही तो छोड़ो, सगे संबंधियों को भी नहीं बताता। और बता भी दे तो कौन निपटारा हो जाता है। जब न्यायाधीश ही इसमें ये फैसला दे देता है कि दांपत्य संबंधों के बिखराव पर बेड रूम के अंदर तो पुलिस नहीं बिठा सकता तो व्यक्ति या तो सहता है और जो पानी सिर से ऊपर हो जाए तो मुक्ति पा लेता है । और कभी कभी ये मुक्ति जीवन मुक्ति में बदल जाती है।

        और जो हो सो हो पर जो बच्चे बड़ी आस से पढ़ने के लिए, अपने शिक्षित जीवन की शुरुआत के लिए विद्यालय आते हैं, उनके साथ हम मास्टर मास्टरनियो का ये क्रूर तम व्यवहार बिल्कुल निंदनीय और दंडनीय है। प्रेमचंद की कहानी ठाकुर का कुआं और सियाराम शरण गुप्त की कविता  देवी के प्रसाद का फूल पढ़ते लगता था कि ये सब रचनाकार की कल्पना होती होगी पर आज जब हम इक्कीसवीं सदी में हैं और बाल अधिकारों के बड़े बड़े नारे लगाते हैं, ऐसे समय घटती ये घटनाएं दिल को दहला देती हैं, सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दोषी की नौकरी से निकाल देना फौरी समाधान भले ही हो पर ये इसका स्थाई हल तो कम से कम नहीं है। ऐसे रक्तबीज अध्यापकों की बढ़ती फौज की जड़ में मठा डाल देना ज़रूरी है। ऐसों की नियुक्ति जिस स्तर से भी होती हो, वहां कुछ गंभीर चूक अवश्य है। उसे समय रहते सुधारना जरुरी है। एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का हाथ तक तब तक नहीं थमाया जाता जक तक कि उसकी पूरी जन्म कुंडली न पता कर ली जावे तो ऐसे अध्यापकों के हाथों बच्चो का भविष्य कैसे सौंपा जा सकता है जिनमें मानवियता ही शेष न हो। इन घटनाओं के संदर्भ तलाशे जाने बहुत जरुरी हैं। जो अपना घर नहीं संभाल पाते उन्हें संस्था की जिम्मेदारी भला कैसे दी जा सकती है। तो समय रहते चेतना जरुरी है नहीं तो बच्चों के सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं दी जा सकती।

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