सफर जारी है....842
08.02.2022
लगता है कलाई कलाई भर चूड़ी पहनने,उनके खनकने, पायल के छनकने के दिन लद गये।अब फैशन बदल गया है जो शृंगार पहले सुहाग चिह्नों में रखा गया था मसलन बिंदिया, चूड़ी,बिछुए,अनवट ,पायल,सेंदुर,मांग टीका, नथ, करधनी, गुच्छा, बाजूबन्द,मंगलसूत्र ,वह सब आउटडेटेड हो गया या उनका ब्याह से कोई लेना देना नहीं रह गया।अब बिछुए विवाह की अनिवार्यता नहीं रही।कुछ दिनों पूर्व एक नवयौवना को एक बिछुआ और एक पैर में पायल पहने देखा तो उत्सुकता वश पूछ बैठी बेटा एक पायल कहां गिर गई तो पता चला कि ये तो फैशन है और बिछुए वह तो अंगूठी की तरह पैर में भी पहना जा सकता है।इसमें क्या बुराई है। सोलह श्रंगार अर्थात नख से सिख तक आभूषण से लदे हुए।आज ये सब फैशन की सीमा में आता है।
मनिहारिन का पेशा खतरे में चला गया, अब कौन चूड़ी पहनता है और पहनता भी है तो अपने आप पहन लेता है।न गलियों में रंग बिरंगी चूड़ियों की डलिया लेकर कोई बेचने आता है और न पहनाने वाले जिससे आशीष की दो चूड़ी मांग के पहन ली जाती है।कांच की रंगबिरंगी चूड़ियाँ जिनका कोई मोल भले ही न होता हो पर बड़ी अनमोल होती हैं ये चूड़ियां।ये चटकती हैं ,टूटती हैं पर इसे मौल जाना कहा जाता है ठीक वैसे ही जैसे दीपक बुझता नहीं बढ़ाया जाता हैं दुकान बंद नहीं की जाती,बढाई जाती है।टूटना बुझना अशुभ के प्रतीक हैं।उन्हें मुंह से उचारा तक नहीं जाता।विवाहिता चूड़िया मुहूर्त से पहनती हैं, नई कोरी चूड़िया पहनने से पूर्व किसी कन्या के हाथों में डाल उसका मुंह झुठार तब पहनती है। चूड़िया जब मर्जी उतारी और चढ़ाई नहीं जाती।उन्हें सौभाग्य सूचक माना जाता है इसलिए पहनते अवसर का विशेष ध्यान रखा जाता है,जब मर्जी चाहे उन्हें उतारा नहीं जातानहीं जाती, उन्हें बढाया जाता है।घर में मंगल अवसर पर घर भर की महिलाओं को चूड़ी पहनाने का रिवाज है।बड़े बूढों के पैर छूटे आशीर्वाद मिलता है सदा सुहागिन रहो, तेरे चूड़ी बिछिया सलामत रहें।जब साथी से बिछोह होता है तो सबसे पहले यही चूड़ी बिछुए उतार कर उसके शव पर रखे जाते हैं कि जब सुहाग ही नहीं रहा तब ये सुहाग चिह्न किस काम के।
तो चूड़ियां केवल आभूषण मात्र नहीं हैं, इनकी खनकती ध्वनि में आप का उल्लास है, किसी का साथ है, चूड़िया खनकती हैं माथे की बिंदिया दमकती है पैरों की पायल छनकती है कानों में झुमके लटकते हैं गर्दन मंगल सूत्र से सज जाती हैं, नथुनी अलग शोभा बढाती है, बिछुए आपका बन्धन नहीं साहस बनते हैं, करधनी और गुच्छा आपको जिम्मेदार बनाता है, मांग भरी सिंदूरी आभा आपके चेहरे पर अलग सुकून लाती हैं, अधरों की लालिमा, हथेली की मेंहदी और पांवों का आलता महावर आपके सौंदर्य की श्री वृद्धि करता है।ये सुहाग चिह्न केवल और केवल आभूषण और सजावट मात्र नहीं है।इनके सन्दर्भ बहुत गहरे हैं।आप किसी के साथ से भरी पूरी होती हैं।
नखसिख सौंदर्य का वर्णन कवि जब करता है तो पूरी कायनात चमत्कृत हो जाती है।आप माने न माने, इससे भला क्या फर्क पड़ता है।ये तो गृहस्थ ही जानता है कि चूड़ियों की खनखनाहट क्या क्या कह जाती है, उसकी झनकार सारा दुख हर लेती है।ये रंग बिरंगी चूड़िया, लाल हरी पीली नीली मैरून चूड़ियां केवल कांच के बोल घेरे भर नहीं है,ये रंग जिजीविषा के प्रतीक है।ब्याह पर लड़की और उसकी मां हरी चूड़ी ही पहनती है।लाल चूड़ियों के साथ आगे पीछे हरी चूड़ी का बन्द आपके हाथ को शोभा से भर देता है।कंगन भले ही सब की हैसियत में न आते हों पर ये अनमोल चूड़ियां तो greeb के हाथ भी सज जाती हैं।कृष्ण स्वयम मनिहार बन जाते हैं राधा से मिलने को,श्याम चूड़ी बेचने आया,मनिहारी का रूप बनाया, चूड़ी हरी नहीं पहनूं चूड़ी लाल नहीं पहनूं मोहे श्याम रंग ही भाया, मनिहारिन का भेष बनाया।राधा से मिलने को कृष्ण कभी मनिहार बनते हैं तो कभी लिल्हार।आ गये कृष्ण चन्द्र लिल्हार कि लीला गुदवा लो प्यारी।इन्हीं चूड़ियों के लिए राधा रानी सेठ को स्वप्न में उलाहना दे देती हैं कि हमने तो जानी कि रोज बेटी बेटी कहते हो तो इसी ब्याज से हमने भी बहुओं के साथ हाथ भर चूड़ी क्या पहन ली कि तुम उसका मोल भी नहीं चुका सके, अपनी लाडली जू को भूल गएऔर बेचारे सेठ को बड़ा पश्चाताप होता है कि वे कैसे अपनी लाडली जू राधा रानी को भूल गए।
फिल्मी गानों में तो पहले बिंदियाँ चमकती थी चूड़िया खनकती थी, अगले की नींद उड़े तो भले ही से उड़ जाए बिंदिया चमकेगी चूड़ी खनकेंगी तेरी नींद उड़े तो उड़ जाए कि गजरा महकेगा।या खनन खनन चूड़िया छनक गई हाथ में।पर अब किसको कहाँ फुर्सत रही इन चूड़ियों और बिछुओं में उलझने की।ये तो नए दौर ने सब दरकिनार कर दिये।अब लट उलझी सुलझा दो का जमाना नहीं रहा।झुल्फों के साये में तो तब डूबते जब घनी जुल्फें होती आज तो बाय कट का जमाना है।सब बीती बातें हैं,सुहाग चिह्नों की परिभाषा बदल गई है, सब नौकरी पेशा जो हो गये, अब किसके पास टाइम बचा है इन बेबकूफी भरी बातों के लिए।हां फैशन के नाम पर जो मर्जी करा लो, अब मांग ही कहाँ बची जो सिंदूर से दमके अब तो माथे पर लाल लकीर ही उसका अवशेष है, आंखों के काजल के साथ लाज शर्म सब आउटडेटेड हो गई है।अब तो इन बातों को करना बेमानी है पर दिल तो नहीं मानता न, मुहावरे तो अभी जस के तस हैं, चूड़ी बिछिया अमर होने का आशीष ही मिलता है न, सुहागन हो तो सुहाग चिह्न तुम्हारी पहचान हैं इनके धारण करने से आप पिछड़े कैसे हो सकते हैं पर साब जी अब तो ये ही सत्य है कि चूड़ियों की खनक और बिंदिया की दमक में पहले से बात नहीं रही।