सफर जारी है....943
25.05.2022
शिक्षा के अभिकरण पढ़ते जाना कि परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला और मां पहली गुरु है।विद्यालय, समाज की आदि इसके बाद शुरू होती है।अनौपचारिक शिक्षा का श्रीगणेश यहीं होता है और संस्कारों की पृष्ठभूमि भी यहीं तैयार होती है बल्कि कहें तो परिवार जिन मूल्यों को रोपित कर देता है, आगे के संसाधन उसे ही विकसित और पल्लवित करते हैं।सबसे जुड़ने का भाव, बड़ों को आदर और मान देने का भाव तो बालक यहीं से ग्रहण करता है।भजन भोजन भाषा और भाव की पीठ परिवार में रखी जाती है कि क्या खाना है कैसे खाना है और खाना ज्यों जरूरी है, अपने बड़ों को इष्ट के आगे हाथ जोड़ते पूजा करते देख वह भी यही सब दोहराता है, भाषा का संस्कार तो वह परिवार से ही पाता है कि बड़ों से कैसे विनम्रता से बोला जाता है या कैसे ध्यान पूर्वक उनकी बात सुनी जाती है, उनसे जबान नहीं लड़ाई जाती, उन्हें पलट कर जबाब नहीं दिया जाता, गलत बात की जिद करो तो आप पहले प्यार से समझाए बुझाये जाते हो और अगर जरूरी हो तो ठोके कूटे पीटे भी जाते हो।अब वे परिवारी जन हैं तो तुम्हें सही रास्ते पर लाने के लिए साम दाम दण्ड भेद अपनाएंगे ही,आप उनके बेहद अपने हो तो आप को सुधारना उनका कर्तव्य है।वे यह कह कर नहीं छूट सकते कि हमने तो अपना सा किया अब नहीं माने तो क्या करें।
वे स्कूल के टीचर जी नहीं है कि उन्हें नियत पाठ्यक्रम ही पढाना है और उतना ही पढाना है जितनी तनख्वाह मिलती है।वे एक बार को अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ सकते हैं कि मैंने कक्षा के सारे बच्चों को सुधारने का ठेका थोड़े ही लिया है।वह पढा भर देता है फिर विद्यार्थी उसे ग्रहण करे न करे उसकी क्षमता और रुचि ओर निर्भर है पर माता पिता परिवारीजन यह कह कर अपने दायित्व से मुक्ति नहीं पा सकते।आप को तो उन्होंने ही रचा बुना है, आप उनकी प्रतिकृति हो तो वे तुम्हें अपने से कहीं आगे ले जाना चाहते हैं।जो जो उन्हें उपलब्ध नहीं हो सका वह सब अपने बालक की झोली में भर देना चाहते हैं।आखिर आप उनके अंश हो, उनके आत्मज हो, उनका रक्त आपकी धमनियों में दौड़ता है।आप को लेकर उन्होंने ढेरों आशाएं पाल ली है।वे चाहते हैं कि आप उनकी कसौटी पर खरे जरूर उतरोगे।
जीवन मूल्य तो परिवार से ही मिला करते हैं, स्वाभिमान की नींव वहीं रखी जाती है मर जाऊं मांगू नहीं अपने तन मन के काज, परमारथ के कारने मोहे न आबत लाज का सूत्र वाक्य तो परिवार में ही पोषित होता है।सम्बन्धों की नींव तो वहीं रखी जाती है।सहोदर के रिश्ते तो वहीं जन्म लेते हैं।बांट कर खाना तो वहीं सीखते हैं।कितनी भी परेशानी हो विपत्ति हो पर साथ निभाने की कला तो परिवार ही सिखाता है।घर में मां बहिन चाची ताई का आदर करते हो तभी तो दुनिया की स्त्री का सम्मान कर पाते हो, घर के बूजुर्ग दादाजी नानाजी को मान देते हो तभी घर से बाहर वृद्धजनों में बाबा दादा के चेहरे तलाश पाते हो।जैसे संस्कार पा जाते हो वही व्यवहार करते हो।
तो क्या अब परिवार की भूमिका बदल गई है क्या उनके दायित्व क्षेत्र सीमित हो गए हैं क्या सारा का सारा दायित्व उन्हें मंहगे स्कूलों में भेजने भर का रह गया है।दो साल भी पूरे नहीं कर पाता तभी से उसके लिए प्ले ग्रुप खोजने शुरू हो जाते हैं कि कम से कम स्कूल जाना तो सीखेगा,चार बच्चों के बीच बैठना सीखेगा, साहचर्य का भाव विकसित होगा, जो पास है उसे बांटना सीखेगा।पर हम बिल्कुल भूल जाते हैं कि जो समय माता पिता और घर परिवार के साथ रहने का है, पारिवारिक सदस्यों से मजबूत बॉन्डिंग बनने का है, हम धीरे धीरे उससे दूर करते जा रहे हैं।बस उसे बड़ा और बड़ा बनाने की ऐसी धुन सवार है कि उसका बचपन छीनने पर तुल गए हैं।जो बालक अभी अपनी नेचुरल कॉल्स को तरीके से व्यक्त नहीं कर पाता उसे हमने विद्यालय भेजने की पूरी पूरी तैयारी कर ली है।जो समय जो उम्र उसमें मूल्यबोध जगाने और संस्कारित करने की है उस में हमने मोबाइल और टीवी में कार्टून देखने को अलॉट कर दिया है और बड़े इतराते से कहते हैं कि ये तो कार्टून देखे बिना रह ही नहीं सकता, बस मोबाइल देखते देखते कुछ खिला दो तो ठीक।बड़े गर्व के साथ बताते हैं कि मेरा बालक खुद से मोबाइल ऑपरेट कर लेता है।जो देना चाहिए उससे पहले उसे दूर रखते हैं और बाद में सिर धुन पछताते हैं किक्या करें, बहुत दिख करता है किसी की मानता ही नहीं।
परिवार धीरे धीरे विघटित होते जा रहे हैं, कमाने का इतना दबाब है कि घर के चार सदस्य हैं तो सब कमाई में लगे हैं, चौबीस घण्टे की व्यस्तता है, बहुत जरूरी सब छूटा जा रहा है पर उस ओर किसी का ध्यान नहीं।बस पैसा और भरपूर पैसा हो तो सब खरीदा जा सकता है, भौतिक वस्तुओं के साथ साथ शिक्षादीक्षा सब खरीद सकते हो,डिग्री प्रमाणपत्र सब अरेंज किये जा सकते हैं बस जेब भरी हो और बैंक बैलेंस फुल हो।सर्वे गुणकांचनम आश्रयन्ति।संस्कार किस चिड़िया का नाम है, नैतिक शिक्षा की बात करना बेमानी है, सत्य ईमानदारी गई तेल लेने, चारों ओर झूठ और बेईमानी का साम्राज्य है, सबको कम समय में ज्यादा से ज्यादा चाहिए, शॉर्टकट चाहिए।बस किसी तरह सब झोली में भरा जा सका, इसके लिए कोई भी जुगाड़ लगाई जा सकती है, किसी भी हद तक जाया जा सकता है, मूल्यों की अनदेखी की जा सकती है, संस्कारों को तोड़ा मरोड़ा जा सकता है, बस जैसे भी हो अपना काम हो जाना चाहिए।
बच्चे वही सीखते हैं जैसा देखते हैं।परिवार आज उनमें वे मूल्य विकसित नहीं कर पा रहा जिसकी दरकार है।सब एक दूसरे पर छोड़ रहे हैं, एक दूसरे कोआलोचित करने में लगे हैं, परिवार को लगता है ये स्कूल का काम है हम पैसा खर्च कर सकते हैं और स्कूल को लगता है जब तक घर परिवार का सहयोग नहीं तब तक अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा।समाज ने अपने हाथ अलग खड़े कर लिए है।कहीं सामंजस्य नहीं दिख रहा और इस सबके मध्य सबसे अधिक मिट्टी पलीद बालक की हो रही है।वह जो इस सबके मूल में था,वही उपेक्षित हो गया, उसने अपने रास्ते खोज लिए हैं वह परिवार और विद्यालय से मिलने वाले पाथेय को गूगल की शरण में खोज रहा है, दिन भर मोबाइल मेंआंखे गढ़ायेबैठा है कि शायद यहीं कोई रास्ता मिल जाये।अब भी समय है परिवार को अपनी भूमिका तय कर लेनी चाहिए कि वही बालक की प्रथम पाठशाला है और उसे जग में लाने वाली मां प्रथम गुरु है।