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Tuesday, July 19, 2022

यात्रा- एक छोटा ब्रेक

 सफर जारी है.........931

08.05.2022

जहां से आप चले थे, उस प्रस्थान बिंदु को तीन साढ़े तीन दशक बाद लौट कर देखना आपको प्रसन्नता से भर देता है।यादों की रीलें एक के बाद एक लगातार खुलती जाती हैं, ये यादें आपको विगत में ले जाती हैं, कभी आप प्रसन्नता से झूम उठते हैं तो कभी पैंतीस वर्ष बाद भी उन स्थानों और व्यक्तियों को वैसा ही देखने का सपना पाले रहते हैं जैसा आपने उन्हें छोड़ा था जबकि तब से न जाने कितना पानी बह गया होता है, चेहरे की लालिमा वक्त के थपेड़ों से झुर्रियों में बदल गई होती हैं,कितने इस जहां से ही जा चुके होते हैं।एक और केवल एक दिन की यात्रा ने झोली को खुशियों से भर दिया है।बहुत से लोगों से मिलना जुलना हुआ, कितनी कितनी बातों का आदान प्रदान हुआ।भले ही शहर में चार मीनार, बिरला मंदिर, हुसैन सागर न घूमा हो, भले ही यहां से भौतिक रूप में कुछ न खरीदा हो पर जितना स्नेह और आदर लेकर लौट रही हूँ, उसे किसी तराजू से नहीं तौला जा सकता।

हां, मैं बात कर रही हूँ अपने एक दिवसीय हैदराबाद प्रवास की, पहले दिन पहुंचना और रास्ते भर पैंतीस साल पहले उस शहर में नौकरी जॉइन करने की यादों में खोया रहना कि देखें कितना बदल गया होगा मेरा शहर, एयरपोर्ट पर साथियों का भावभीना स्वागत आश्वस्त कर गया कि शहर को मेरी प्रतीक्षा है, एयरपोर्ट से होटल तक के दो घण्टे के सड़क सफर में रास्ते भर तेलुगु में लिखे साइन बोर्डों को पढ़ पढ़ कर यह तय करती रही कि पिछला सब याद तो है।शहर पूरी तरह बदल गया है, अब ठेठ प्रादेशिक पोशाक हाफ साड़ी के स्थान पर मॉडर्न पोशाक आधिपत्य जमा चुकी है।शहर को तो बदलना ही था ।अब वह एक आई टी हब में जो बदल चुका है।हुसैन सागर में बुद्ध की विशाल प्रतिमा को देख ऐसा लगा मानो वह मुझे बुला रही है कि इतने पास से होकर गुजर रही हो, तनिक रुको, बैठो बतराओ पर समय के अभाव ने मन मसोस कर जाने के लिए विवश कर दिया।होटल में रात बड़ी कसमसाहट में बीती कि कैसे सुबह हो और अपनी कर्मस्थली केंद्र को फिर से निगाहों में भर लूँ।

                   नौ बजे सरकारी जीप केंद्र पर पहुंच चुकी थी, सद्य निर्मित नये भवन में स्थान्तरित हुआ केंद्र सजा बना खूब इतरा रहा था और मैं बाबरी वहां पुराने भवन के चीकू के पेड़ को खोज रही थी।उत्साही स्टाफ चंदन तिलक से स्वागत में लगा हुआ था।सेमिनार में प्रतिभाग करने विद्वान पधार चुके थे।किताबों के आदान प्रदान के साथ परिचय सत्र प्रारम्भ हुआ।आजादी के अमृत महोत्सव पर दक्षिण के लोक काव्यों में राष्ट्रीय चेतना केंद्रित विषय रखा गया था।विषय प्रवर्तन के साथ गोष्ठी प्रारम्भ हुई, सुघड़ सूत्र संचालिका ने अपने सधे हुए वक्तव्य से सभागार के हर व्यक्ति को प्रभावित किया।लोककाव्यों के संचयन और संरक्षण को रेखांकित किया गया, राष्ट्रीय चेतना के ब्याज से जोश जगाती रचनाओं ने हाल को ऊर्जा से भर दिया।भोजनावकाश के बाद बहुभाषी कवि गोष्ठी थी।तेलुगु, तमिल, मलयालम ,कन्नड़ ,हिंदी ,ब्रज में प्रस्तुत रचनाओं ने सबको वाह वाह करने पर मजबूर कर दिया।घड़ी की सुइयां तेजी से खिसक रही थी पर आज समय जैसे ठहर गया था।अंतिम पड़ाव के रूप में हिंदी की सेवा साधना में लगे साधकों के साथ विमर्श बैठक थी।जानना जरूरी था कि दक्षिण प्रांत में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कौन सी दिशाएं निर्धारित की जा सकती हैं, सरकारी और गैर सरकारी स्तर क्या क्या प्रयास किये जा सकते हैं।सबने अपने मनोगत व्यक्त किये।फिर से इस बात की पुष्टि हुई कि हिंदी की गति में बाधक रोड़े अपनो के द्वारा ही बिछाए गए हैं और मन बना लें तो उन्हें हटाया जा सकता है।

          हिंदी के कार्य में लगे शिक्षक बेहद उत्साही हैं, वे

 कार्य करना चाहते हैं, तय व्यवस्था के प्रति उनके मन में आक्रोश है पर वे अपने अपने स्तर भर खूब खूब कर रहे हैं।इसी क्रम में संस्थान के विद्यार्थी रहे नीरज हुडगे जो अब शोधार्थी हैं और सत्यनारायण जो अध्यापन कर रहे हैं से मिलना हुआ।दोनों बहुत दूर से दौड़े चले आये थे कि गुरुजी से मिलना होगा।सफर की पाठक मंजू शर्मा, मेरी सहयोगी अग्रजा शकुंतला जी और अनीताजी,प्रो सरराजु, प्रो एस एम इकबाल, डाक्टर ऋषभ, डा सुमन लता, अहिल्या मिश्रा,चारी जी,श्याम सुंदर, महेंद्र ठाकुर, सुरेश उरतृप्त सहित अनेक अनेक महत्वपूर्ण नामों की सूची है जिसे यहां उदधृत करना सम्भव नहीं हो पा रहा।सभी को ह्रदय की गहराइयों से नमन। सभी हिंदी विद्वान दिमाग के कम्प्यूटर में फीड हो गए हैं, विजिटिंग कार्ड और पते ले लिए गए हैं कि कौन जाने कब किससे कहां मुलाकात हो जाये।शीला वानोडे जी ने खूब रच पच कर सुस्वादु भोजन परोसा है, पूरनपोली की मिठास अभी तक मुंह में घुली हुई है।बस आज विद्यार्थी के परिवार से मिल दोपहर वापिसी है।कल से फिर वही दिनचर्या शुरू होगी।इस यात्रा ने मुझे अनुभव और स्नेह आदर की दृष्टि से बहुत बहुत समृद्ध किया है।तो आप भी करते रहिए छोटी छोटी यात्राएं और अपने को अनुभव सम्पन्न बनाते रहिये।ये छोटे छोटे ब्रेक जिंदगी की नीरसता एकरसता को तोड़ते हैं और आप फिर से गति पकड़ लेते हैं।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...