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Wednesday, August 17, 2022

खेल खेल में सीखो नेतृत्व

 सफर जारी है....1010

30.07.2022

खेल खेल में सीखो नेतृत्व....

हमारी पीढ़ी का बचपन कबड्डी, खो खो, नीली पीली साडी, पोसम्पा भई पोसम्पा, गुट्टे, रस्सी कूद, गुड़िया गुड्डे, गेंद तड़ी, सात टप्पे, स्टापू , लूडो, सांप सीढी, चक्खन पे , छूहा छाही, आइस पायस, कैरम, रस्सा कसी, घोड़ा जमाल खाई,विभिन्न प्रकार की कूद और दौड़ जैसे इसी प्रकार के विविध खेल खेल खेलते बीता है। जिन खेलो में दो दल होते , उन दोनों का अलग अलग मुडड यानी नेता यानी लीडर होता था। मुडड शायद मूड सिर से रचा गया होगा। लीडर आगे आगे और सब उसके पीछे उसकी कमर या फ्रॉक या कमीज कस कर पकडे रहते। एक और खेल होता जिसमें दोनों दलों के बीच बीच एक रेखा खींच दी जाती और दोनो दल एक दल को अपनी अपनी ओर खींचने की कोशिश करते। जिस दल के साथी मुखिया का साथ नहीं छोड़ते, उसे हिम्मत बंधाते, जोर लगा के हईसा करते, वे जीत जाते और प्रतिपक्षी दल की हिप हिप हुर्रे हो जाती। ये खेल खेलते सीखा कि मुखिया का रोल बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है और दल के प्रत्येक सदस्य को उसके निर्देशों का पालन करता होता है तब जाकर कहीं जीत होती है।

जब खेल जैसे छोटे कार्य में आठ दस साल के बच्चे की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है, कक्षा में मानीटर का दायित्व जिसे मिल जाता है, वह अपने को अति विशेष मानने लगता है, सबकी कपरे इकठ्ठी कर अध्यापक को देने, चाक रजिस्टर आदि ला देने और कक्षा को शांत रखने जैसे कार्यों को करने में अपनी शान समझता है जबकि उसे अन्य कक्षा सहपाठियों से अधिक काम करना पड़ता है तो जीवन के विविध अनुशासनों में नेतृव की भूमिका कितनी प्रभावी होती होगी। घर से ही इसकी शुरुआत हो जाती है जब माता पिता बच्चों को छोटे छोटे दायित्व सौंपना शुरू कर देते हैं। अभिभावक की अनुपस्थिति में बच्चे अपने दायित्व को कितनी संजीदगी से निभाते हैं, इस पर भविष्य की आधारशिला का निर्माण होता है। दरअसल नेतृत्व करने काअर्थ सब कुछ खुद करना होता भी नहीं, उसे सबको साथ लेकर चलना होता है, सबसे सबकी क्षमता के अनुसार लाभ लेना होता है, सबको बराबर दायित्व सौंपना होता है, सबकी निगरानी करनी होती है, काम कराने और उसका तय सीमा में निपटान करना होता है, सबको साथ लेकर चलना होता है।

पर इसाका यह अर्थ कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि वह हमेशा निर्देश देने के लिए बना है, उसे खुद कुछ नहीं करना है। बस बैठे बैठे सबके काम का जायजा लेना है, सबको भड़काना है, डांटना है,कुछ ही लोगों को दायित्व देना होता है और शेष को खुला और स्वतंत्र छोड़ देना है।

निश्चित ही उसे निर्धारित समय में कार्य निपटान के आदेश देने होते हैं, स्वयं सजग होकर निगरानी करनी होती है, जैसे भी हो कार्य संपन्न कराना होता है। ध्यान दीजिए सब जगह प्रेरणार्थक क्रिया का प्रयोग किया गया है अर्थात उसे सब काम में खुद नहीं लगना, दूसरों को लगाना है। लोगो से काम लेना भी विशेष योग्यता की मांग रखता है। स्वयं से आगे बढ़कर सब कुछ कुछ खुद  करने लग जाना नेतृत्व के दायरे में नहीं आता। करने और करवाने में बहुत अंतर है। नेतृत्व का अर्थ केवल निर्देश देना भर नहीं, कार्य को सही तरीके से करने, उसमें आने वाली व्यावहारिक परेशानियों को समझना और उसके निवारण और समाधान तलाशना भी है। बल्कि यही ज़्यादा जरूरी भी है। कई कई बार केवल निर्देश देने भर से , दबाब बनाए रखने, बात बात पर डांटने फटकारने, आलोचना करने, कमियां निकालने, अगले को हतोत्साहित करने से ही काम संपन्न नहीं हो जाते। उसे तरीके से डील भी करना होता है, समझाना बुझाना होता है, सही रास्ते दिखाने होते है।

और फिर सबकी नेतृत्व क्षमता एक समान नहीं हुआ करती। जिसे आगे आगे बढ़कर हर काम खुद निबटाने की आदत होती है, वे करना भले जानते हो पर दूसरों से करवाने और काम लेने में कच्चे होते हैं। सही नेतृत्व अधीनस्थों की कार्य दक्षता को भली भांति समझता है, उनसे कार्य लेना जानता है, साम दाम दण्ड भेद की नीति जानता है, सबको साथ लेकर चलना जानता है, सबका विश्वास जीतना जानता है। उसे मुखिया की परिभाषा कंठस्थ ही नहीं होती, बल्कि उसे जीना भी जानता है। मुखिया मुख सो चहिए खान पान को एक , पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। विवेक को रेखांकित किया जाना आवश्यक है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में विवेक से काम लेना होता है ,चाहा अनचाहा बहुत कुछ जज्ब कर आगे बढ़ जाता है।

सो नेतृत्व की डोर सदैव ऐसे हाथों में सौंपी जानी चाहिए जो दायित्वशील हों, कार्य को नियत समय पर करने वाले से अधिक करवाने वाले हों, सबका कंट्रोल पैनल अपने हाथ  रखते हों। जो ज्यादा ही संवेदन शील हों उन्हें कार्य में साधन की भूमिका निभाने का निर्वाह करना चाहिए। किसी भी संस्था का नेतृत्व भावुकता, दयालुता, सबका ध्यान रखने की वृत्ति से नहीं चला करता, उसके लिए कठोर,स्टर्न और दृढ़ होने की जरूरत होती है, कठोर से कठोर दंड देने में वे हिचकिचाते नहीं, दूसरों के प्रति हद से अधिक संवेदनशील होना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना कहा जाता है, इसके लिए पुरस्कृत नहीं किया जाता। सो नेतृत्व के गुण विकसित करो, उनमें रचो पचो, प्रभाव बनाना सीखो, बात बात पर हड़काना सीखो और जो ये सब नहीं कर पाओ तो  आम जनता में शमिल हो जाओ , साधन बने रहो और चैन से सो ओ।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...