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Wednesday, August 17, 2022

रहिमन चुप हे बैठिए

 सफर जारी है...976

27.06.2022

रहिमन चुप हे बैठिए......

समय समय की बात है कि जो कभी फाखते उड़ाया करते थे, वे आज मुंह बन्द किए बैठे हैं और जो मरे पड़े थे, उनके आंगन में बहार ही बहार है। जिस छलनी में छप्पन छेद है वह भी चार बात कह कर चलती है और जो सबको लीड करते थे, वे कम्बल में मुंह छिपाए पड़े हैं। सब समय की बलिहार है। रहीम तो सब जाने माने है तभी लिख देते हैं रहिमन पक्ष श्राद्ध में कागा हंसा होय। जिन कौओ को कोई टका सेर नहीं पूछता, जिनकी कांव कांव से सब परेशान हो जाते हैं, कौए जैसी वृत्ति वालों की आलोचना करते हैं ,वही कौए श्राद्ध पक्ष में आदर के साथ बुलाकर खीर पूड़ी से जिमाए जाते हैं। काम सरे कछु और है काम परे कछु और का दौर है। मौर जो वर के सिर पर धरी जाती है, फेरे होने के बाद नदी में सिरा दी जाती है इससे माैर की उपयोगिता कम तो नहीं हो जाती।

आजकल जो घट रहा है , फिल्मी गीतों में तो बहुत पहले ही प्रतिध्वनित हो गया था ...रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना दुम का कौआ मोती खाएगा। तो ठीक है कौए को मोती खाने देते है पर सवाल ये है कि क्या कौए को मोती रास आयेंगे, जिंदगी भर तो विष्ठा खाता रहा, कीची कीची कौआ और दूध मलाई लला खाता रहा, अब एकदम से मोती से पकवान खाके कौए को कहीं अपच न हो जाए, पेट न फूल जाए, स्वाद स्वाद में कहीं ज्यादा खा गया तो लेने के देने न पड जाए। तो भाई इस काक प्रजाति को समझाना जरुरी है। बारह बरस बाद तो घूरे के दिन भी फिर जाते हैं फिर सत्य क्यो नहीं जीतेगा। अभी कंस, रावण और कौरवों का समय चल रहा है तो शांत बैठे रहिए। रहीम बार बार समझा कर हार गए कि रहिमन चुप हे बैठिए देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आइए बनत न लागे देर। 

कितने कितने संदर्भ है जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि समय बड़ा बलवान है। पुरुष बली नहीं होत है समय बड़ो बलवान,भीलन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बाण। अर्जुन के पास तो कृष्ण का बल था और जब कृष्ण ने अपनी लीला का संवरण कर लिया तो उनके साथ ही अर्जुन का बल भी चला गया। अर्जुन और उनके वाण तो वही थे पर फिर भी धनुर्धारी अर्जुन का कुछ बस न चला और भीलो ने गोपिकाओ को लूट लिया।तो हम कितने भी समझदार और बलशाली क्यों न हों, समय पर किसी का बस नहीं चलता। समय की बलिहार है कि राजा को रंक और रंक को राजा बना दे। फिर हम तो मानुष हैं जब लीलाधारी भी समय के प्रभाव से नहीं बच सकें तो हम कौन खेत की मूली हैं। 

       राम जैसे बलशाली और मर्यादा पुरुषोत्तम की पत्नी को लंका का राजा बहरूपिया का वेश बना कर हर ले गया, राम वन में  सीते सीते पुकारते रहे, वन के जीव जंतुओं से उनका पता पूछते रहे हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनयनी। वो तो भला हो जो हनुमान जी मिल गए और समुद्र लांघ कर सीता का पता लगा लाए। और देखो दशरथ के ठोठा होकर भी चौदह वर्ष तक वन में भटकना पड़ा। दूसरे कृष्ण जी जो पैदा नहीं हुए उससे पहले ही शत्रु पैदा हो गए, साल भर के नहीं हुए तब तक तो कितने कितने राक्षस वेश बदल कर उन्हें मारने पहुंच गए। अब बताओ जन्मते ही उन्होंने कौन से दुष्कर्म कर दिए कि किसी की गगरी फोड़ दी। पांडवों ने कौरवों का क्या बिगाड़ा था कि वे युद्ध के बिना सुई की नोंक के बराबर जमीन देने को तैयार नहीं हुए, पांच गांव की कौन कहे। और देखो पांच पांच पति होते सोते द्रोपदी का चीर हरण होता रहा और पांचों पांडव सिर झुकाए बेबस से बैठे रहै। बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास किसी गलती के कारण थोड़े ही मिला था, बस समय खराब था, सूधे दिन नहीं चल रहे थे। और सुनो राजा नल पर विपदा आई, बुरे दिन आए तो खूंटी हार निगल गई, पक्षी उड़ गए, मछली पानी में चली गई और जब समय ने पलटा खाया तो खूंटी हार उगलने लगी, तीतर उड़ उड़ के आ गए, मछली पानी से बाहर आने को उतावली हो गईं।

 तो भैया रे, सब समय समय की बात है। जब दिना उल्टे आते हैं तो अपने भी पराए हो जाते हैं, सगे साथ छोड़ जाते हैं, अड़ोसी पडौसी बगले झांकते है और कोई सीधे मुंह बात नहीं करता। तो उस समय को उका जाओ, चुप्पी साध लो, चुप लगा जाओ, ये बुरे दिन खराब समय हमेशा रहने वाला नहीं है। बस बीत ही जाएगा। जब अच्छे दिन नहीं रहे तो भला बुरे दिन ही क्यों टिकेंगे। तो हम जैसे तो रहीम को याद कर सबर कर लेते हैं फिर नीके दिन आयेंगे बनत न लागे देर।

इत्ते उलायती हू मत बनो

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