सफर जारी है..... ९७०
२२.०६.२०२२
करो योग रहो निरोग......
योग कर्मसु कौशलम अर्थात कर्मों में कुशलता योग कही जाती हैं, इस आधार पर तो जो भी छोटा बड़ा काम हाथ में लिया जाए, उसे लगन और निष्ठा पूर्वक संपन्न करना भी योग ही हुआ। पर काम को चुनना और फिर उसे समय से पूरा करना चुनौती पूर्ण होता है। बिना सोचे समझे उत्साह उत्साह में बहुत से कामो को हाथ में ले तो लिया जाता हैं लेकिन कुछ समय बाद ये उत्साह ठंडा पड़ जाता हैं, काम से विरक्ति होने लगती हैं, काम बोझ लगने लगता है। फिर उस काम को बीच मैं छोड़ एक और काम को हाथ में लेते हैं और कुछ समय बाद उस काम का हश्र भी पहले जैसा हो जाता है। ऐसे लोग शायद याद नहीं रख पाते कि आधी छोड़ पूरी को धाबे, पूरी गहै न आधी पाबे। जिनकी स्थिर मति नहीं होती, चित्त बैचेन रहता हैं, पल में तोला पल मैं माशा हो जाते हैं, वे किसी भी काम के साथ न्याय नहीं कर पाते।
योग कुछ शारीरिक व्यायाम भर नहीं है, योग केवल प्राणायाम भी नहीं है। योग एक जीवन पद्धति है। समत्वम योगम उच्चयते, जीवन में समत्व योग कहलाता है। कैसे आता है जीवन में समत्व और संतुलन, कौन होता है योगी। जो जागते हुए सोता है वह है योगी। अब सोते हुए तो सोया ही जा सकता है पर योगी हर पल सजग रहता है, वह कर्मयोग में निरत रहता है, निरंतर चिंतन करता है सोते जागते उठते बैठते बस अपने को लक्ष्य में केंद्रित रखता है। जब कभी ऐसे कर्मयोगियों से मिलना होता है, मन बहुत प्रसन्न हो जाता है, लगता है जब ये कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते। फिर मन कठिनाइयां गिनाने लगता है अरे इतना तो काम होता है, समय की बड़ी किल्लत है, जो हाथ में है, वही पूरा नहीं हो पा रहा तो नया क्या ओढ़े। तो हम तो ऐसे ही ठीक है, बस हम से तो इतना ही हो जाए, उसी मैं भर पाएंगे। बस एक यही सोच आगे बढ़ने से रोक देता है। वहीं के वहीं जड़ हो जाते है।
योग को मात्र पढ़ना और रटना नहीं होता, उसे करना होता है, व्यवहार में लाना होता है, स्थिर मति होना होता है, चंचल चित्त को वश में करना होता है, अपने को साधना होता है, शरीर को स्वस्थ रखना होता है पर हम हैं कि पतंजलि के योग सूत्र को रटे जा रहे हैं, गीता के अध्याय पर अध्याय पढ़े जा रहे हैं पर अंदर कुछ नहीं उतर रहा, पानी में रह कर भी मीन की तरह प्यासे हैं क्योंकि हम चिकने घड़े जो हो गए हैं, खाल मोटी काली भैंस की तरह कड़ी हो गई है, कोई असर ही नहीं पड़ता। बस जीवन भर इधर से उधर दौड़ते रहते हैं बिना किसी लक्ष्य को निर्धारित किए, हमें सब चाहिए तो पर प्रयास आधे भी नहीं कर पाते और जो थोड़े बहुत किए भी जाते हैं, वे भी आधे अधूरे मन से, तो जल के बीच खड़े भी सूखे के सूखे रह जाते हैं। योग करने के लिए ठठकरम तो खूब करवा लो, मेट्स आ जाएगी, टीवी लग जाएगी, योजना बना लेंगे, दुनिया भर का ढिंढोरा पीट लेंगे पर करने की बारी आई तो जमाने भर का आलस आ जाएगा, बहाने खोज लिए जाएंगे, न करने का सारा दोष आंगन पर मढ़ दिया जाएगा, व्यवस्था को कोसा और आलोचित किया जाएगा लेकिन फली के दो टूक करेंगे नहीं, बस गाते रोते रहेंगे, बकर बकर करते रहेंगे।
योग करने से होता है, कहने से नहीं। योग जीवन शैली है। वह आपके हर कार्य में झलकता है। उसे कहना नहीं होता, बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि हम योग करते हैं। वह तो आपके दिन प्रतिदिन के आचरण में झलकता है, बात करने के तरीके से प्रदर्शित होता है, आप हमेशा हड़बड़ी में नहीं रहते, धैर्य पूर्वक दमदार आवाज में अपनी बात रखते हैं, आपको बेवजह चीखना चिल्लाना नहीं होता। विनम्रता पूर्वक भी सच रखा जा सकता है, उसके लिए उदंड और असभ्य होने की जरूरत नहीं होती। शांत चित्त होकर और धैर्य बनाए रखते हुए आप अधिक मजबूत हों जाते हैं।
तो करते रहिए योग,योगा नहीं। मनाए चाहे मत मनाए योग दिवस के आयोजन को पर मन से उसे करते रहिए। योग के लिए बहुत शोशेबाजी कि जरूरत नहीं होती, बस उसे करना होता है नियमित। तो करते रहिए योग और बने रहें निरोग।