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Wednesday, August 24, 2022

सूधे का सदा भलो

 सफर जारी है...1036

26.08.2022

सूधे का सदा भलो........

कहन तो यही है कि जो मन के निर्मल होते हैं, जिनमें कोई छल कपट नहीं होता, जो सबके कार्य के लिए सामर्थ्य अनुसार प्रस्तुत रहते हैं, उन्हें दुनियां में भले से धोखा मिले, उनकी नामबरी न हो, उन्हें लोग बेवकूफ और अव्यावहारिक भले मानते रहें, उनकी खिल्ली खोचड़ी उड़ाते रहें, उन्हें लप्पू झंझन बताते रहें, उन्हे हलके में लें, उन्हे मूर्ख बना मन ही मन खुश हो लें, उनके किसी आदेश को गंभीरता से न लें, उन्हें बेमतलब आरोपित करते रहें पर ऐसों की रक्षा सदैव ईश्वर करता है, हर पल उनके साथ होता है। बड़े बूढ़े अक्सर दोहराते हैं सूधे को सदा भलो।

सीधा सादा होना ,मन का साफ होना, छल छंद से दूर होना यदि पाप होता तो तुलसी क्यो लिख जाते निर्मल मन जन सो मोहि पाबा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। जब ईश्वर को ऐसे बंदे पसंद हैं तो हमें सात्विक भाव से ही पोषित होना चाहिए। उसे ही सच्चे मन से भजना चाहिए, उसी की उपासना करनी चाहिए, उसे ही साक्षी मानकर सारे काम करने चाहिए और सारे कामों को उसी को अर्पित कर देना चाहिए। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा। सच में हमारा है भी क्या, जन्म उसके हाथ, जीवन उसके हाथ, मरण उसके हाथ। हम तो उस परम पिता के हाथो की कठपुतली मात्र हैं। जैसे नचाता है नाच लेते हैं। सबहिं नचावत राम गुसाईं। सुख दुःख, मान अपमान, यश अपयश सब उसी के आधीन है। वह ही तो हमें प्रेरणा देता है। हम किसी मनुष्य के गुलाम हों न हों पर राम जी के चाकर तो हैं हीं। जैसे नचाओगे, नाच लेंगे। सुख दोगे, उसे  सिर माथे लगा लेंगे और जो दुःख दोगे तो उसे भी सहना तो होगा, राजी राजी नहीं गैर राजी। आपके पास उससे बचने का कोई उपाय तो भी नहीं।

       सीधे होने के अपने नुकसान और तिर्यक होने के बहुत से लाभ भले से हों पर व्यक्ति अपनी वृत्ति तो नहीं बदल पाता। सबके लिए सहज रुप से उपलब्धता यदि अवगुण की श्रेणी में आती हो तो भले से आती रहे, पर मन में कम से कम ये बोझा तो नहीं रहता कि हमने कुछ गलत किया। जो बन पड़ा जितना बन पड़ा, सम्बाई भर खुब किया। अब अगले की आंख तर नहीं आता तो न आये करे, यहाँ कौन परवाह करता है। अरे रानी रूठेगी तो अपना सुहाग ले लेगी, इससे अधिक भला और क्या होगा। और जो होगा, उसमें निश्चित प्रभु की मरजी होगी। उसकी मरजी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता। सारे बानक वैसे ही बनते जाते हैं। उन पर आपका कोई बस नहीं रहता।

       तो जो मिलना है मिले, जो छिनना हो छिन जाए। भाग्य के हेठे ही पैदा हुए तो क्या किया जा सकता है। फिर तुलसी ही ढाढस बंधाते हैं हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ। तो काहे सोच सोच के हलकान हों, जो होगा सो देखा जाएगा। वैसे सोच सोच के ही कौन से काम बने जा रहे हैं। अव्यावहारिक हैं तो हैं, राजनीति कूटनीति तो बिल्कुल नहीं आती, अब लोग ठगते रहें तो ठगते रहें। हम यहीं कह कर तसल्ली कर लेंगे कि कबीरा आप ठगाइए। दूसरों को ठगने से तो स्वयं ठगा जाना ज्यादा श्रेष्ठ है। कम से कम किसी के काम में रोड़ा तो नहीं अटकाते न। आज भले ही उनकी समझ में न भरे, किसी तीसरे के प्रभाव में आकर उल्टी सीधी हरकतें करें पर जब बोध जागेगा, बड़े पछताएंगे, उन्हें पछताना ही पड़ेगा क्योंकि उन्होंने बगल में छुरी उनके घोंपी है जो उनके शुभचिंतक और शुभेच्छु थे।

       बीतने देते हैं समय को, देखते हैं बाजी पलटती है या नहीं। जो सूधे को सदा भला इस वाक्य को पकड़ कर चले चलते हैं, उनका भला होता है या नहीं। देखते हैं ईश्वर की लीला कि वह अपने प्रण का निर्वाह करते या नहीं , उसे ढाढस बंधाते हैं या नहीं। सिखाया तो उन्होंने ही था जो रामनाम का सहारा लेते हैं, उनका  बालबांका भी नहीं होता। बस बना रहे ये विश्वास, बने रहें हम सहज और सरल, दुनियादारी सीखें न सीखें पर प्रभु में लगन लगी रहे। सब नैया ठिकाने लग जायेगी।

इत्ते उलायती हू मत बनो

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