सफर जारी है.....945
26.05.2022
इस चौपाई को पढ़ते अनुसुइया और सीता का प्रसंग याद आता है कि माता पुत्री को उपदेश दे रही है कि धीरज ,धर्म, मित्र अरु नारी, आपत काल परखिये चारी।अर्थात आपत्ति काल में ही इन चार साथियों की परख होती है ,उनकी विश्वसनीयता सिद्ध होती है कि वे विपत में पड़े व्यक्ति का साथ देते हैं या उन्हें मुसीबत में छोड़कर पतली गली से निकल जाते हैं और अगला रोता कलपता गाता रहता है 'सुख के सब साथी दुख में न कोय',कबीर भी याद दिलाते हैं जब व्यक्ति ईश्वर तक को केवल सुख में ही याद करता है ,दुख में भुला देता है तो बेचारे मानुस को क्या पड़ी है कि वह एक साधारण से मनुष्य का विपत काल में साथ दे और अपने को आफत में डाले।हालांकि उसे धर्मानुसार नियमानुसार ऐसा करना चाहिए पर कौन मानता है नियमों को।
धीरज ,धर्म ,मित्र और नारी की परख विपदा के समय होती है, यह सार्वकालिक और सार्वभौमिक सच है ।पर जब बिना सन्दर्भ के इस चौपाई को अकेले उदधृत किया जाता है तो बार -बार ध्यान प्रथम अर्धाली के अंतिम पद नारी पर चला जाता है।पहले तीन तक तो शत प्रतिशत सहमति बनती है पर नारी के स्थान पर लगता है कि जीवन साथी होना चाहिए था।ये ठीक वैसा ही मसला है जैसे आदि काल से दिए जा रहे आशीर्वाद 'पुत्रवती भव 'को 'संतति वान भव' में बदलने की मुहिम हो। सौभाग्य तो दोनों का होता है भले ही स्त्री के संदर्भ में यह सौभाग्यवती भव ,सदा सुहागन रहो या सौभाग्यकांक्षिणी के रूप में हो।सौभाग्य की आकांक्षा क्या केवल स्त्री को ही होती है ,अगला सौभागशाली होने में कोई रुचि नहीं रखता क्या, उसे इसमें गौरव की अनुभूति नहीं होती क्या '।फिर इस आशीर्वाद में ये पक्षपात क्यों।वे आयुष्मान और चिरंजीवी हैं तो ये भी आयुष्मती विशेषण से युक्त हैं, वे आत्मज हैं तो ये आत्मजा हैं ।वे वृषभानुजा हैं तो ये हलधर के वीर हैं,दोनों की जोड़ी तभी तो जमती है।चिरजीवो जोरी जुरै क्यों न स्नेह गम्भीर ऐसे ही थोड़े रच दिया होगा।फिर आपत काल तो दोनों में से किसी पर भी आ सकता है, वह लिंग भेद देखकर थोड़े ही आएगा।आपात काल किसी एक वर्ग के लिए आरक्षित तो नहीं होता न।फिर ऐसे कष्टकारी समय में ये परीक्षा अकेली आधी आबादी की ही क्यो निर्धारित हुई होगी। इसके दायित्व से शेष पचास प्रतिशत को क्यों और कैसे मुक्त रखा गया होगा।
ये बात आसानी से पचती नहीं है कि जब गृहस्थी की गाड़ी के दोनों पहिये हैं तो एक पहिये के पंचर होने ,कमजोर पड़ जाने पर ,कम पढ़े लिखे होने पर ,जड़ बुद्धि होने पर, अधिक होशियार न होने पर दूसरे को समर्थ होना ही चाहिए, इसमें कोई दो मत नहीं है।फिर इसमें लिंग भेद की बात कहां से घुस आई नारी ही को रेखांकित क्यों किया गया।चौपाई तो यूं भी हो सकती थी धीरज, धरम ,मित्र और नर नारी, आपत काल परखिये चारी।दोनों एक दूसरे के प्रति पूर्णतः समर्पित हो, घर तो तभी चलता है।एक को बिल्कुल मुक्त छोड़ दो और दूसरे के कंधे पर भारी जुआ रख दो तो ये तो बेइंसाफी हो जाएगी न।एक जल्दी थकेगा और दूसरा आराम तलब होकर केवल आदेश ही देता रहेगा तब तो चल गई गृहस्थी।पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि अधिकांश परिवार ऐसे ही एक पहिये पर दौड़ रहे हैं।जो जितना स्किल्ड है जिसे अपने कंधों पर सारा बोझ लादने की पुरानी आदत है ,लद्दू घोड़ा बना रहता है और अगला तिक तिक चाबुक चलाता रहता है।वह सारा वजन लादे हुए चलता तो है पर बीच बीच में कभी चिढ़ चिढ़ा जाता है,भड़कता है, कह कबा कर रिलीज होता है , फिर बैल की तरह बोझा उठा के चल देता है कि आखिर करना तो उसे ही है।पता नहीं वह ये क्यों माने बैठा है कि आसमान उसके कंधों पर ही टिका है।जैसे ही वह सांस लेने के लिए रुका, आसमान नीचे गिर पड़ेगा।जो जितना स्किल्ड है जितना कार्य कुशल है ,उतना ही अधिक कार्य में व्यस्त है क्योंकि उसे काम से बचना नहीं आता।और जो इस सब जंजाल से मुक्त है कि हमें तो करना आता ही नहीं, दरअसल कभी किया ही नहीं, ऐसे ही निठ गई।अब तीसरे पन में क्या खाक मुसलमा होंगे।ऐसे कौन से तीस चालीस बरस शेष हैं, बहुत जीयेंगे तो दस बरस और, अब इतनी कट गई तो ये भी निभ ही जाएगी।कौन आफत मोल ले।। कह तो सच ही रहे हैं कि जब तुलसी बाबा ने लिख दई तो उसे ही प्रमाण मानो, काहे को अपनी अक्कल लगा रहे हो।
बस अगले के ऊपर ही जिम्मा डाले रहो और खुद पतली गली से निकल जाओ,अपने ऊपर आंच की छोड़ो लपट तक मत आने दो, साफ बच जाओ ।
रही बात धीरज/धैर्य की, विपत्ति आने पर सबसे पहले धैर्य ही जबाब देता है कि अब कैसे होयगी।मुसीबत है पहाड़ सी और उससे निपटने को साधन है राई से, न जन शक्ति है न धन शक्ति,और मुसीबत आने पर बुद्धि वैसे ही ठस्स हो जाती है।तो मुसीबत में कठिनाई में विपत्ति में धैर्य बना रहे तो आधी समस्या दूर हो जाती है।धर्म तो अच्छे अच्छों का छूट जाता है, उसके दस लक्षणों में से एक भी याद नहीं रहता जबकि धर्म का पहला लक्षण धैर्य ही है।याद तो होगा ही धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रिय निग्रह, धी विद्या सत्यम अक्रोध दशकम धर्मम लक्षणम।रही बात मित्र की तो सच्चा मित्र आपत्ति काले न जहाति, गुह्यं गुह्यति गुणान प्रकटी करोति के सिद्धांत पर अडिग रहता है।कृष्ण सुदामा सी मित्रता रखता है।देता इस तरह है कि सीधे हाथ से दे तो बाएं को भी खबर न हो।तो धैर्य ,धर्म ,मित्र के साथ जीवन सहचर का जोड़ लगा दें तो बात अच्छे से हजम हो जाएगी।