Sunday, June 16, 2024

पहले तपो तो सही...

सफर जारी है...1527

29.05.2024 

पहले तपो तो सही...

जिन्हें आराम की जिदगी रास आ जाती है वे तपना नहीं जानते.बस पशु जैसी वृत्ति अपना कर अजगर से मस्त पडे रहते हैं.ज्यादा ही गुनगुनाने का मन  हुआ तो मलूक दास  को दोहरा लेते हैं  अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम .काम धाम तो सब होता रहेगा.पहले आराम जरूरी है. काम तो कोई न कोई कर ही देगा .काम भला कब पडा रहता है और  एक किसी के न करने पर रुकता भी नहीं .जिन्हें घोडे बेचकर सोना हो,  शौक से सोते रहें.बस ये ध्यान बराबर बना रहे कि सफलता उन्हीं के कदम चूमती है जो हाड तोड परिश्रम करते हैं.एक छोटे शहर की नैन्सी  त्यागी अपनी मेहनत के बल पर कान फेस्टिवल  जा पहुंचती है और रेड कारपेट पर स्वयम का डिजाइन किया और सिला हुआ गाउन पहन कर  चलती है .लोगों के संज्ञान में आती है और सिलेब्रिटीज की श्रेणी में गिनी जाने लगती है.कल उसके कुछ  साक्षात्कार देखते पुन:यह धारणा दृढ हुई कि बडे बनने के लिए बडे सपने देखने होते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए एडी चोटी का जोर लगाना होता है.निरंतर काम करना होता है.विपत्तियों और कठिनाईयों से घबरा कर बैठ जाना नहीं होता बल्कि उसी के बीच रास्ते निकालने होते हैं.थक हार कर बैठ जाना नहीं होता,हाथ पैर नहीं छोड देने होते .अपनी कमजोरियों और विशेषताओं को समझना होता है.कमजोरियों को दूर करना होता है और विशेषताओं हथियार बना कर जीवन संघर्ष में सफल होना होता है. जो कोशिश करते हैं उन्हें सफलता भी मिलती ही है भले पहले प्रयास में न मिले और कई कई   प्रयास क्यों  न  करने पडें.

      गर्मी के बाद बरसात और फिर जाडे की रुत आती है.जेठ मास के नौतपा खूब तपते हैं तब जाकर कहीं मानसून  की आहट होती है .अब बैशाख जेठ न तपे तो सावन भादों की झडी कैसे लगेगी.आदमी का क्या उसे तो गरमी में गरमी, सर्दी में सरदी लगेगी  ही और बारिश में चाय पकौडे की तलब लगेगी .उसकी तो आदत में है  कि तापमान घटते बढते  स्वर  शिकायती बनाये रखो. अपने लिए कैसे भी सुख के साधन जुटा लो.अपने घर की गरमी को यंत्र लगाकर बाहर फैंको.पर पेड लगाने का यत्न मत करो.अब पेड ऐसे ही थोडे लग जाते हैं .उनकी बच्चों सी नीठ करनी होती है.समय समय पर खाद पानी देना होता है .धूप ताप से बचाना होता है .उनकी प्रकृति देखकर कभी छये में तो कभी प्रकाश में रखना होता है.पिता के हाथों रोपे पीपल सरिस  की विशालता उसकी ठंडी छांव का आनंद तो खूब लिया जी भर सावन के झूलों का आनंद लिया पर एक पौधा भी ऐसा नहीं रोप पाये जो आगे की पीढी को विशाल वट सी शीतल छांव दे पाता.

      फ्लैट कल्चर के चलते अब पेड का स्थान कमरे में  रखे सजे गमलों के सजावटी पौधों और बोनसाई ने ले लिया है.उसी में सब अगन मगन हैं.करें भी क्या.पेड तो पेड ,अब तो आदमी की फसल भी बोनसाई होती जा रही है.कहां रही विशालता मनों में .बस अपना अपना देख लें वही बहुत है.बिजली का जितना मर्जी संकट हो पर सबको अपने अलग अलग अलग कमरे पूरी सुख सुविधा के सक चाहिए ही चाहिए. पर्सनल स्पेस जैसी भी कोई चीज होती है.शेयर करने की वृत्ति का सर्वथा ह्रास होता जा रहा है.अब वे दिन  हवा हुए जब कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ.जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ लिखा जाता था.जेठ की तपती दुपहरी को देख पंक्तियां याद आ रही हैं देख दुपहरी जेठ की छांह चाहत छांह.अब जेठ तो जेठ हैं बडे हैं आखिर तो जीवन सहचर  के बडे भाई ठहरे.तो कितने भी फैशनेबल हो जाओ धूप ताप से बचने को सिर और चेहरा दोनों  ढके रहते हो.

ये तपने का समय है तपोगे तो बारिश का भी आनंद लोगे और सरसोगे भी. सूरज देवता अब नौतपा में प्रखर नहीं होंगे तो कब होंगे. तो सूरज देवता तुमहु तपो और सबन ने खूब तपाओ.तप कआ अर्थ ही कष्ट सहना है जो सह जाता है वह बन जाता है.तपोगे तो सरसोगे भी और खूब बरसोगे भी.

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