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Wednesday, August 17, 2022

तीज सलूने

 हम लोगसफर जारी है....1023

13.08.2022

तीज सलूने......

सावन की पूर्णिमा श्रावणी है। बहनें अपने वीरन  की कलाई में  कच्चे सूत का पक्का बंधन  बांधती है, यह सूत्र रक्षा सूत्र कहलाता है। भाई के माथे पर चंदन रोली से मंगल तिलक सजाती हैं। उसके आयुष्य की कामना करती है, उसका मुंह मीठा कराती है।भाई बहिन को रक्षा का वचन देता है। उसे दक्षिणा के रुप में धन वस्त्र मिठाई  देता है। भाई बहिन के इस स्नेह पर्व को लेकर बहुत सी कथा कहानी कही सुनी जाती है फिर चाहे हुमायूं कर्मवती का प्रसंग हो या पुरोहित के द्वारा अपने यजमान को रक्षा सूत्र बांधने का ।

मुख्य बात है कि ये पर्व त्यौहार मां के कोख जाये भाई बहिन को एक दूसरे से जोड़े रहते हैं। एक दूसरे का शुभ चाहते हैं, एक दूसरे की रक्षा को तत्पर रहते हैं। अपने अपने परिवार बसाते इन संबंधों के प्रति स्नेह भाव बना रहता है। बाबुल के जिस आंगन से चिरकली गाती रोती विदा होती है कि काहे को ब्याही विदेश रे सुन बाबुल मोरे, हम तो बबुल तेरे अंगना की चिड़िया चुगत चुगत उड़ जाएं रे, सुन बाबुल मोरे, इस घर को बार बार पलट पलट कर मुड़ मुड़ कर गीली आंखों से देखती रहती हैं कि शायद अब कोई उन्हें रोक लें पर द्वार तक विदा कर सब लौट जाते हैं और उसके सुखी जीवन की कामना करते हैं।मैया बाबुल तो हमेशा नहीं बने रहते, पर भाई मैके नैहर की यादों को सुरक्षित रखे रहता है। भाई पितृवत और भावज मैया तुल्य होती जाती है। भतीजे भतीजी बुआ का स्पेस सुरक्षित रखे रहते हैं। बुआ यानी पिता की स्नेहिल बहिन। सारा लाड एक शब्द में सिमट आता है। कौन धेले पैसे, कपड़े जेवर के लिए बहनें भाई का मुख जोहती हैं। बस तीज त्योहारों के बहाने बचपन की धमा चौकड़ी फिर ताजा हो जाती है। बहिनों के अपने संपन्न घर परिवार होते हैं पर भाई का सिर सहलाता स्नेहिल हाथ मन को टनों भर देता है। कैसी मीठी मीठी यादें दिमाग में पिक्चर की रील सी रिवाइंड हो जाती है। वो मां का पटरे पर भईया को पूरब दिशा में बिठाना, सिर पर रूमाल, तौलिया या अंगोछा रख देना, हम बहिनों को मंत्रोच्चार येन बद्धो बलि राजा के साथ राखी बांधने की सिखावन देना, मस्तक पर तिलक और अक्षत लगा, आरता कर घेवर से मुंह जुठारना, अधिकार भाव से हमारा भईया से पैसे मांगना, दिन भर कुछ कुछ खाते पीते रहना, सांझ होते गूंगे सिराना, कुछ घास बड़ों के कान में लगाना और फिर दस पांच पैसे की उगाही। रात होते झूले पर जा बैठना और सावन की मल्हार गाना। हर साल राखी पर कमोबेश यही रूटीन रहता। जब सासरे के हो गए तो कभी राखी डाक से भेज दी जाती और कभी मेहमान भाई के आग्रह पर  बूरा खाने पधार जाते।

     अब तो बच्चे भी बाल गोपालों वाले हुए और हम दादी नानी की केटेगरी के साथ सीनियर सिटीजन में गिने जाने लगे। बालो में चांदी छा गईं और हाथों में सोने की मूठ की छड़ी आ गई पर राखी आते मन तो अभी तक वैसा ही बल्लियों उछलता है कि अपने भईया ए राखी बांधने जाना है, उनकी कुशलता की कामना करनी है। जब अपने बड़ों के बीच होते हैं तो बालपन तो वैसे ही हावी हो जाता है। बने रहें हम बहनों के भईया भतीजे, उनके घर भंडार भरे रहें, राखी दौज पर हम आते जाते रहें। दुनिया के सभी भईया बहिन के मध्य स्नेह की ज्योति दिपदिपाती रहें, बस यही मंगल कामना है।

इत्ते उलायती हू मत बनो

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