Showing posts with label सबेरे जाना है. Show all posts
Showing posts with label सबेरे जाना है. Show all posts

Thursday, April 28, 2022

सबेरे जाना है

 सफर जारी है....853

20.02.2022

जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना।सच सब आज की बात ही कर सकते हैं ,कल भला किसने देखा है।पर आज के काम को कल पर छोड़ अवश्य देते हैं कि कल देखा जाएगा।कल भला कब आता है, आता होता तो कबीर को क्या पड़ी थी लिखने की कि काल्हि करे सो आज कर आज करे सो अब्ब, पल में परलै होयगी बहुरि करैगो कब्ब।कहते रहें कबीर, दुनिया भर के उदाहरण खोज खोज के सामने रखते रहें, पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय, अब के बिछड़े कब मिलें दूर पड़ेंगे जाय या चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय या जग है सराय एक आये एक जाए ।खूब सुनते सुनाते रहें पर इसका असर कितनी देर रहता है भला।ये संसार काठ की बाड़ी आग लगे जल जाना है।पानी के बुलबुले सी है जिंदगी, सेमल के फूल सी है, कोई भरोसा नहीं कौन सा पल आखिरी होगा, अभी बैठे हैं और मालूम चले दस मिनट में ही प्राण पखेरू उड़ गए, बस अभी जिंदा थे और अभी खबर बन गए,फोटो पर माला चढ़ गई, शोक संदेश आने लगे, कुछ दिन बीते, सब भूल भाल अपने अपने काम में लग गये ।

हां,ऐसे ही तो चले जाते हैं सब, जीते जी जिनसे मिलने जाने में झूठा अहम, जिद,व्यस्तता सब आड़े आ जाती थी ,आज जाना रवायत हो जाती है।कहाँ से तो समय निकल आता है और कैसे आंसू ढुलकाते इतनी जल्दी चले गए, हम तो मिल भी नहीं सके, जैसे संवाद सरलता से बयान हो जाते हैं।फिर जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया से जाने वाले जैसे गीत की पंक्तियाँ जुबान पर आ जाती हैं।जाने क्या बात है कि सब जानते बूझते भी हम सब ऐसा करते हैं।जब तक अगले का जीवन था, सांसे थी,अकड़ में तने रहे कि हम क्यों जाएं, हम किसी से कम हैं क्या, अपने आगे किसी को कुछ न  समझने की जिद जो पाले बैठे थे, अहम जो सातवें आसमान पर कुदक रहा था, जिसके  चलते सच को जानते भी उसे स्वीकारने में नानी मर रही थी ,अरे मान लेते तो छोटे नहीं हो जाते और छोटा होना हमें बिल्कुल मंजूर नहीं,हमारे सिर पर कलगी कैसे बंधती,हम आम जन नहीं हो जाते फिर हम विशेष की श्रेणी में कैसे फिट होते। कितना कितना पढ़ते हैं, कितनी कितनी बार पढ़ते हैं कि अगले पल का कोई भरोसा नहीं पर इस विषय से बचे रहते हैं, इस पर कोई चर्चा नहीं करते,सूम से मौन साध लेते हैं।बड़ी बेफिक्री से कह देते हैं जब मरेंगे तब मरेंगे, अभी से क्यों सोच सोच के अपना दिमाग क्यों खराब करें।यावत जीवेत ऋणम कृत्वा घृतं पिबैत, चार्वाक दर्शन के अनुयायी बन जाते हैं।दो दिन का मेला अकेले जाना है जैसा सब जानते तो हैं पर सबसे मिल कर कहां रह पाते हैं।अपने पराये से बाहर निकलें तो कुछ सोचा जावे।उपदेश तो दुनिया भर के दिलवा लो कि वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नैनम छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनम दहति पावक, न चैनम क्लेदयन्ति आपो न शोषयति मारुत: पर जब व्यवहार में लाना हो तो सब भूल भुला दिया जाता है।इन छह दशकों  में कितनों कितनों को मरते देखा,आत्मीयों के साथ श्मशान भी हो आये, सब खुली आँखों से देखा कि सब जल जाता है बस एक मुट्ठी राख शेष बचती है जिसे भी गंगा में बहा दिया जाता है, सब अतीत बन जाते हैं, कोई लौट कर नहीं आता, बस यादों में शेष रह जाते हैं।सब जानते समझते भी  चिपक तो नहीं छूटती न।दुहराते भले ही दस बार रहें कि रहो संसार में ऐसे कमल रहता है पानी में।पर कहां रह पाते हैं कमल की तरह निर्लिप्त।नाक तक इसी संसार में माया मोह में धंसे रहते हैं अपने परायों की गिनती करते रहते हैं, अंधों की तरह अपनों को अपने वालों को चुन चुन के रेवड़ी बांटते रहते हैं।क्या करें मन ही नहीं मानता।अब मन की सुनें या दार्शनिक की तरह पढ़े लिखे को गुनने में समय बर्बाद करें।

दो दिन का है मेला, सवेरे जाना है भजन जब जब सुना जाता है बड़ा वैराग्य जगता है।बड़े बड़े विचार आते हैं जब कुछ साथ लेके जाना नहीं यहीं रह जाना है तो इतनी उठा पटक किसलिए।शांति से भी तो जीया जा सकता है।जो काम अपने हिस्से का है उसे हंस के करो या रोके, करना तो तुम्हें ही पड़ेगा।फिर खीझते क्यों हो।प्रसन्नता के साथ कर लो।और जो हंसी खुशी करोगे तो काम भी जल्दी निबटेगा और खुद भी प्रसन्न रहोगे।प्रसन्नता जो जीवन की कुंजी है उसी का टोटा सब ओर है।सब निराश से अप्रसन्न से झुनझुनाते हुए ,एक दूसरे की शिकायत लिए चले आते हैं।वे खुद करें न करें पर दूसरों पर गिद्ध दृष्टि अवश्य लगाए  रहते हैं कि उसने किया या नहीं।ये आपका काम नहीं, जिसकी ड्यूटी है वह देखेगा।हजार आंख वाला चुपचाप सब देखता रहता है, सी सी टी वी से भी तेज निगाहें है उसकी, स्टोर क्षमता भी बहुत है, कुछ भी डिलीट नहीं होता।सारे कर्मों का हिसाब यहीं चुकता हो जाता है।इस हाथ ले उस हाथ दे की नीति है उस ऊपर वाले की।कुछ भी पेंडिंग नहीं रहता उसके खाते में।खैर ये सब समझ तो तब आये जब अक्कल दाढ़ तो निकले पहले।

सो भैय्या, अपन राम तो सोते सबको राम राम कर लेते हैं पता नहीं कौन सी सुबह जाना पड़ जाए, बरसों रात रात जग तैयारी की है हर यात्रा की पर इस यात्रा के विषय में सोचते तक नहीं कि जग है सराय एक आये एक जाये पता नहीं अपना नम्बर कब लग जाये तो रोज की रोज राम राम कर लेते हैं, पल का क्या भरोसा भला।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...